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उठाओ नजर रहगुज़र देख लो ।

यहाँ जिन्दगी का सफ़र देख लो ।

 

नियम कायदे तो बने हैं कई

मगर भंग हैं सब जिधर देख लो ।

 

न भय है न चिंता न है शर्म ही

बना है बशर जानवर देख लो ।

 

कहीं लूट है तो कहीं क़त्ल है

किसी भी नगर की ख़बर देख लो ।

 

गले मिल रहे दोस्त खंजर लिए

बदलते समय का असर देख लो ।

 

करें फ़िक्र उनकी जो हैं नापसंद

सियासत का है ये हुनर देख लो ।

 

बिछा हर तरफ सिर्फ कंक्रीट है

झुलसने लगे अब शजर देख लो ।

 

मौलिक/अप्रकाशित.

 

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Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 9:50am

वाह खूब ग़ज़ल कही है..बधाई

Comment by vijay nikore on October 8, 2019 at 1:46pm

बहुत ही खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई, मित्र अशोक कुमार जी।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 7, 2019 at 5:31pm

बहुत सारी शिकायतों का गज़ल में सुंदर समावेष किया है अशोक जी बधाई

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 6, 2019 at 10:55am

आदरणीय सुशील सरना साहब सादर नमस्कार, गज़ल पर हुए मेरे प्रयास को सराहने के लिए आपका हृदय से आभार ।सादर ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on October 6, 2019 at 10:53am

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार ,  आपसे मिली दाद ने मेरे रचना कर्म को सार्थक किया है । हार्दिक आभार । सादर .

Comment by Sushil Sarna on October 4, 2019 at 2:00pm

बिछा हर तरफ सिर्फ कंक्रीट है

झुलसने लगे अब शजर देख लो ।
वाह आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी बहुत सुंदर और यथार्थ का चित्रण करती बेहतरीन ग़ज़ल। दिल से बधाई सर।

Comment by Samar kabeer on October 4, 2019 at 11:45am

जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,बहुत उम्द: ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

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