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फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन

 

गुपचुप उसपर मन आया है

लगता है सावन आया है

 

महका है हर कोना-कोना

अम्बर से चन्दन आया है

 

देखो नभ पर छाये बादल

दूल्हा ज्यों बनठन आया है 

 

भीग रही है प्यासी धरती

ज्यों बीता यौवन आया है

 

रह-रह नाच रही हैं बूँदें

राधा का मोहन आया है

 

झूला झूल रही हैं सखियाँ

सज रक्षा बंधन आया है

 

कागज़ की नैया ले आओ

याद मुझे बचपन आया है

 

मौलिक/अप्रकाशित.

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Comment by PHOOL SINGH on December 11, 2018 at 5:13pm

सूंदर रचना

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 2, 2018 at 10:14am

आदरणीय दयाराम मैथानी साहब सादर, सृजन को मान देने के लिए आपका हृदयतल से आभार । सादर ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 2, 2018 at 10:12am

आदरणीय श्लेष चंद्राकर जी सादर , प्रस्तुत गजल को सराहने के लिए आपका बहुत- बहुत आभार । सादर । 

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 2, 2018 at 10:10am

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, मेरे प्रयास को सराहने के लिए आपका बहुत - बहुत आभार । सच है तनाफूर का मुझे ध्यान  नहीं रहा है । एक तो आपने संशोधित कर ही दिया है दूसरे को मैं संशोधित कर लेता हूँ । पुनः आपका हार्दिक आभार । सादर ।

Comment by Dayaram Methani on December 1, 2018 at 10:42pm

आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी, बहुत सुंदर सृजन। बधाई स्वीकार करें।

Comment by Shlesh Chandrakar on December 1, 2018 at 4:02pm

बहुत बढिया, अशोक जी

Comment by Samar kabeer on December 1, 2018 at 11:00am

जनाब अशोक कुमार रक्ताले जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

'  आसमान पर छाये बादल'

ये मिसरा मात्रा के हिसाब से ठीक लगता है,लेकिन फ़ेलुन के अरकान पर तक़ती'अ करने पर रुकावट आ रही है,आप चाहें तो मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'देखो नभ पर छाये बादल''

'  फिर रक्षा बंधन आया है'

इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखें ।

Comment by Ashok Kumar Raktale on December 1, 2018 at 10:39am

आदरणीय मोहम्मद आरिफ़ साहब सादर नमस्कार, प्रस्तुत प्रयास पर उत्साहवर्धन के लिए अतिशय आभार । सादर 

Comment by Mohammed Arif on November 30, 2018 at 1:08pm

आदरणीय अशोक रक्ताले जी आदाब,

  ..                         बहुत ही कठिन बह्र पर बहुत ही सरल-सरस शब्दों में लाजवाब ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ दिली मुबारकबाद स्वीकार करें ।

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