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मैंने केसर-केसर मन से रची रंगोली,
मैंने रेशम-रेशम बंधनवार सजाए,
कुछ महके कुछ मीठे से पकवान बना लूँ-
तुम आओ तो उत्सव जैसा तुम्हे मना लूँ...

 

कंगूरों तक रुकी धूप से कर मनुहारें

हर कोना घर-आँगन का मैं रौशन कर लूँ,

माँग हवाओं से लाऊँ खुशबू के झौंके

सावन की आकुलता इन आँखों में भर लूँ,

 

नम कर लूँ मैं दिल का रूठा-रूठा बंजर-

बो कर कुछ ज़ज्बात नये फिर उन्हें सम्हालूँ

तुम आओ तो...

 

अनदेखे-अनसुने ख्वाब सोये हैं दिल में

आहट तेरी पाकर लेते हैं अँगड़ाई,

जन्मों की शापित चुप्पी टूटी हो जैसे

सभी दिशाओं में गूँजे हैं बोल अढाई,

 

मनचाही दस्तक पर खोलूँ बंद किवाड़े-

ऐसा लेख नियति का मैं आखिर क्यों टालूँ

तुम आओ तो...

 

सच तो है खुशियों के संग-संग इस दिल में

कुछ डर भी हैं कुछ सकुचाहट भी पलती है,

प्रश्नों के उत्तर पाने की जल्दी क्या है

सदा पहेली बाँध साथ में हल चलती है,

 

तुम मेरे साँचे में बस मुझ सा ढल जाना

मैं खुद को साँचे में आज तुम्हारे ढालूँ

तुम आओ तो...

 

 मौलिक और अप्रकाशित 

~प्राची

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 12, 2019 at 9:54am

बहुत ही सुन्दर वाह आदरणीया...

Comment by Sushil Sarna on October 8, 2019 at 12:13pm

वाह आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी बहुत ही सुंदर,भावपूर्ण गीत का सृजन हुआ है। दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by प्रदीप देवीशरण भट्ट on October 7, 2019 at 5:29pm

बहुत खूब प्राची जी सुंदर गीत रचना हुई बधाई।

Comment by Samar kabeer on October 7, 2019 at 8:07am

मुहतरमा प्राची सिंह साहिबा आदाब,बहुत सुंदर गीत हुआ है,पढ़ कर आनंद आ गया ,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

'बो कर कुछ ज़ज्बात नये फिर उन्हें सम्हालूँ'?

Comment by TEJ VEER SINGH on October 5, 2019 at 1:42pm

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ प्राची सिंह जी।लाज़वाब प्रस्तुति।

अनदेखे-अनसुने ख्वाब सोये हैं दिल में

आहट तेरी पाकर लेते हैं अँगड़ाई,

जन्मों की शापित चुप्पी टूटी हो जैसे

सभी दिशाओं में गूँजे हैं बोल अढाई,

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