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रिक्तता :.....

बहुत धीरे धीरे जलती है
अग्नि चूल्हे की
पहले धुआँ
फिर अग्नि का चरम
फिर ढलान का धुआँ
फिर अंत
फिर नहीं जलती
कभी बुझकर
राख से अग्नि
साकार
शून्य हो जाता है
शून्य अदृश्य हो जाता है
बस रह जाती है
रिक्तता
जो कभी पूर्ण थी
धुआँ होने से पहले

सुशील सरना

मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 53

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Comment by Sushil Sarna yesterday

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रजजी सृजन में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna yesterday

आदरणीय  TEJ VEER SINGH जी सृजन में निहित भावों को मान देने का दिल से आभार।

Comment by Sushil Sarna yesterday

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब , सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का दिल से आभार।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Saturday

क्या कहने..बहुत ही शानदार कविता...

Comment by Samar kabeer on Friday

जनाब सुशील सरना जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on Friday

हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी। बेहतरीन प्रस्तुति।

Comment by Sushil Sarna on Thursday

आदरणीय विजय निकोर जी सृजन पर आपकी मन मुदित करती प्रंशात्मक प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by vijay nikore on Thursday

बहुत ही खूबसूरत रचना है। भावों का बहाव पढ़ते बनता है। हार्दिक बधाई , मित्र सुशील जी।

कृपया ध्यान दे...

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