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मुसल्सल ग़ज़ल (नसीहत प्यार की)

2122 - 2122 - 212

करते हो  इतनी जो  ये तकरार  तुम

कैसे  दिलबर  के  बनोगे   यार  तुम 

तौलते   हो   प्यार   भी   मीज़ान  में 

प्यार को समझे हो क्या व्यापार तुम 

इश्क़ में जब तक  न  होगी हाँ में हाँ 

हो  नहीं  सकते  कभी  दिलदार तुम 

हम-ज़बाँ हों इश्क़ में - पहला सबक़ 

सीख कर  करना  वफ़ा इज़हार तुम

जानेमन जज़्बात  को  समझे  बिना  

पा नहीं सकते किसी का  प्यार तुम

दिल के…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 7, 2021 at 5:59pm — 13 Comments

निर्भरता(लघुकथा)

मलाई की मिठाई बेचते बेचते मंगनी हलवाई का नाम चल निकला था।वह दूधवालों से खास मौकों पर दूध लेता।मिठाई बनाता।बेचता। बानगी के तौर थोड़ा थोड़ा दूध देनेवालों को चखने भर दे देता। वाह वाह होती।क्या खूब मिठाई बनाता है अपुन का मंगनी,ऐसा सब कहते फिरते।मंगनी की शोहरत बढ़ती।मिठाई की मांग में इजाफा होता।वह मालामाल होता।

आज फिर उसने दूधवालों से दूध पहुंचाने की अपील कर डाली।शर्तें हैं कि हर दूधवाला खुद उसके यहां दूध पहुंचाए।पेठवना नहीं चलेगा। और हां,अब जो मिठाई बनेगी उसे दूध…

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Added by Manan Kumar singh on September 6, 2021 at 3:00pm — 4 Comments

गुरवै: नमों नमः

अनेकानेक देशो की संस्कृति में शिक्षकों क़े सम्मान में पूरी दुनिया झुकती हैं। भारतीय संस्कृति में जहाँ शिष्य अपने गुरु के पैर धोते हैं वही दक्षिण कोरिया में शिष्यों के पैर शिक्षक घुटने के बल बैठकर धोते हैं। शिक्षक ज़िंदगी की पाठशाला में सबक पढ़ाने- सिखाने और व्यवहारिक जीवन में उतारने वाले,हर अक्षर को शब्द मूल्यो में सार्थक कर कामयाबी की सीढ़ी पार कराते…

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Added by babitagupta on September 6, 2021 at 1:30pm — 1 Comment

जो कही नहीं तुमसे

जो कही नहीं तुमसे, मैं वो ही बात कहता हूँ

चलो मैं भी तुम्हारे संग कदम दो चार चलता हूँ

चाहत थी यही मेरी तू भी साथ चल मेरे

न बंदिश हो ना दूरी हो रहूँ जब साथ मैं तेरे

लूटा दूँ ये जवानी मैं बस इस दो पल की यादों में 

छुपा लूँ आखँ में अपने न बहने दूँ मैं पानी में 

दिखाता हूँ जो नज़रों से, जुबा से कह ना पाऊँगा

हूँ रहता साथ मैं हरदम पर तेरा हो ना पाऊँगा

हक़ीक़त है यही मेरी मैं तुझसे प्यार करता हूँ

तू वाकिफ है मेरे सच से मैं कितना तुझपे मरता…

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Added by AMAN SINHA on September 6, 2021 at 12:28pm — 4 Comments

मुस्कुराहटें

कहते हैं सब यही ,बस मुस्कुराते रहिए 

लेकिन जनाब बड़ी शातिर होती है ये मुस्कुराहट 

दिल का सुकून होती है,किसी की मुस्कुराहट 

तो चैन छीन लेती दिलों का ,कोई मुस्कुराहट 

प्यार का दरिया बहाती बच्चे की मासूम मुस्कुराहट 

और विचलित कर जाती मन को,व्यंग भरी मुस्कुराहट 

ना जाने क्यों लोग बेवजह भी मुस्कुराते हैं 

ना जाने कौन सा ग़म उस हंसी में छुपाते हैं 

कभी ख़ुशी से खिलखिलाते चेहरे

नमी आँखों की बन आंसू ले आते हैं 

तो दोस्तों ये…

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Added by Veena Gupta on September 5, 2021 at 12:41am — 2 Comments

पर्व गुरुओं का मनाते आज हम -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२



पर्व गुरुओं  का  मनाते आज हम

और मन के पास आते आज हम।१।

*

पुष्प भावों के  चढ़ाते आज हम 

शीष श्रद्धा से झुकाते आज हम।२।

*

है मिला हर ज्ञान उन से ही हमें

मान उनको दे जताते आज हम।३।

*

सीख उनकी आचरण में ढालकर

कर्ज किंचित यूँ चुकाते आज हम।४।

*

आब भर कर है सितारों सा किया

हर चमक उन से, बताते आज हम।५।

*

ज्ञान दाता  बढ़  बिधाता  से हैं तो

यश उन्हीं…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 4, 2021 at 1:35pm — 13 Comments

कुछ अनकही सी

अंजाना सफर तनहाई का डेरा

उदासी का दिल मे था उसके बसेरा

साँवली सी आंखो पर पालको का घेरा

भुला नहीं मैं वो चमकता सा चेहरा

आंखे भरी थी और लब सील चुके थे

दगा उसके सीने मे घर कर चुके थे

था कहना बहूत कुछ उसको भी लेकिन

धोखे के डर से वो लफ्ज जम चुके थे

हाले दिल चेहरे पर दिखता था यू हीं

के ग़म को छुपाने की कोशिश नहीं थी

दिल चाहता तो था संग उसके चलना

मगर साथ चलने की कोशिश नहीं थी

कहा कुछ नहीं पर समझा दिया सब

ना बाकी रहा…

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Added by AMAN SINHA on September 4, 2021 at 11:55am — 2 Comments

चाँद - चाँदनी पर दोहावली ......

चाँद -चाँदनी पर दोहावली ......

देख रहा है चाँदनी , आसमान से चाँद ।

मिलने आया झील में , नीले नभ को फाँद।1।

देख चाँद को चाँदनी ,करे झील पर रक्स ।

सिमट गया है चाँद का, उजियारी में अक्स ।2।

चाँद फलक का ख़्वाब तो, धवल चाँदनी नूर ।

वीचि -वीचि क्रीड़ा करे, सोम प्रीत में चूर ।3।

विभा चाँद की  देखती, तारों वाली रात ।

नील झील से कौमुदी, करे चाँद से बात ।4।

छुप-छुप देखे चंद्रिका, अपने विधु का रूप ।

बिम्ब चाँद…

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Added by Sushil Sarna on September 3, 2021 at 3:55pm — 5 Comments

ग़ज़ल-मिलती दुआ है

1222/122

1

 हुआ वो ही ख़फ़ा है

किया जिसका भला है

2

ज़माने को पता है

तू मेरा आश्ना है

3…

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Added by Rachna Bhatia on September 3, 2021 at 11:04am — 6 Comments

अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

2122   2122    2122    212

बिन मेरे जब दिल तुम्हारा जीने के काबिल हुआ।

देख ले मझधार ही मेरे लिए साहिल हुआ।

जो नहीं है पास अपने उसकी बेचैनी के साथ,

उसको जाया कर दिया है जो हमें हासिल हुआ।

सामने आकर खड़ी हो जाती हैं सूरत कईं,

खुद में खुद को खोजना मेरे लिए मुश्किल हुआ।

कह नहीं पाया मैं अपने दिल की सारी बात पर,

तू मेरी ग़ज़लों में लगभग हर दफा शामिल हुआ।

वेदनाओं के सफर में साथ है तू हर घड़ी,

और तेरा…

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Added by मनोज अहसास on September 2, 2021 at 11:51pm — 3 Comments

दोहे

सांसारिक कर्मों संग, याद रहे प्रभु नाम। 

ईश कृपा बनी रहे, बन जाएँ सब काम॥

2.

जैसा जैसा समय हो, वैसे होते काम।

चिंता काहे हम करें, मदद करें श्री राम॥ 

3.

कोमल तन कटि क्षीण सी, सुंदर मोहक रूप।

वेणी नागिन सी बनी, चंचल नयन अनूप ॥

4.

कर्म कमाई आपकी, बदले सब संस्कार।

अनुचित अर्जित संपदा, हो दुख का आधार॥ 

5.

दुर्योधन ने कब  किया,…

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Added by Om Parkash Sharma on September 2, 2021 at 2:30pm — 3 Comments

आखिर क्यों?

हमें पाकर भी उन्हें क्या मिलेगा

पल भर की खुशी फिर रोज़ हीं जलेगा

चाहे कहे या ना कहे वो होठों से मगर

ये सिलसिला तो अब रोज़ हीं चलेगा

 

नही पता उसने ऐसा क्यों किया

हमें जानकर भी अपना दिल क्यों दिया

ज़ख़्म उसे सुकून देते हैं शायद

तभी उसने दर्द से अपना दामन भर लिया

 

मेरी लाख लानतों के बाद भी

क्यों वो हर रोज़ चला आता है

लगता है उसे…

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Added by AMAN SINHA on September 2, 2021 at 11:00am — 6 Comments

कहो सूरमा! जीत लिए जग?

कहो सूरमा! जीत लिए जग? 

तुम्हें पता है जीत हार का? 

केवल बारूदों के दम पर 

फूँक रहे हो धरती सारी 

नफरत की लपटों में तुमने 

धधकाई करुणा की क्यारी 

कितना आतंकित है…

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Added by आशीष यादव on September 2, 2021 at 1:00am — 5 Comments

कीमत

 आज जब सुबह मैं सैर कर रहा था , तब इक आवाज़ मेरे कानों से टकराई ,साहिब जी नमस्कार ।

मैंने खुद को रोका और उस पर नज़र डाली, आज उसने बहुत सुंदर लाल कमीज़,काली ऐनक और सिर पे टोपी पहनी हुई थी ।

धीरे से उस ने अपनी ट्राई साइकिल मेरे पास लाते हुए कहा,"साहिब जी, आज भोले नाथ का जन्मदिन है ,आज कुछ हो जाए,ये मुझे समझ आ गया था ।"क्योंकि वह जब भी मुझे मिलता, उस को उम्मीद होती कि मैं उसे कुछ पैसे दूं।"

"नहीं भाई, आज शिव रात्रि नहीं, भाई आज तो जन्माष्टमी है ।"

"मैंने उस की ट्राईविलर के…

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Added by मोहन बेगोवाल on September 1, 2021 at 5:00pm — 2 Comments

एक दोहा गज़ल - नज़रें

एक दोहा गज़ल - नज़रें -(प्रथम प्रयास )



नज़रें मंडी हो गईं, नज़र बनी बाज़ार ।

नज़र नज़र में बिक गया, एक जिस्म सौ बार।

*

नजरों को झूठी लगे, अब नजरों की प्रीत ,

हवस सुवासित अब लगे, नजरों की मनुहार ।

*

नजरों से छुपती नहीं , कभी नज़र की बात ,

नजरें करती हैं सदा, नजरों से व्यापार ।

*

भद्दा लगता है बड़ा ,काजल का शृंगार ,

लुट जाता है जब कभी ,नजरों का संसार ।

*

कह देती है हर नज़र , अन्तस की हर बात ,

कहीं नज़र की जीत है, कहीं नज़र की…

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Added by Sushil Sarna on August 31, 2021 at 11:12pm — 7 Comments

ग़ज़ल (ख़ून की जब तक ज़रूरत थी मेरे चाहा मुझे)

2122 - 2122 - 2122 - 212

ख़ून  की  जब  तक  ज़रूरत  थी  मेरे  चाहा  मुझे 

बा'द अज़ाँ  बस दूध  की मक्खी समझ फेंका मुझे 

उसने जब मंज़िल  की जानिब गामज़न पाया मुझे 

तंज़   से  मा'मूर  नफ़रत   की   नज़र   देखा  मुझे 

हक़-ब-जानिब  बढ़ गए  जब ये  क़दम रुकते नहीं 

मुश्किलों  ने  बढ़के  यूँ  तो  लाख  रोका  था  मुझे 

अपने अहसाँ के 'इवज़ वो कर गया ख़ूँ का हिसाब 

यारो …

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 31, 2021 at 10:55pm — 2 Comments

वक्त से आगे चलने वाली....अमृता प्रीतम

पंजाबी साहित्य की प्रथम कवयित्री, निबंधकार, उपन्यासकार, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त, 1919 गुजरांवाला, पंजाब में हुआ था। अपनी रचनाओं में विभिन्न रूपो मे नारी चित्रण करने वाली अमृता प्रीतम के साहित्य संसार की नारी अपनी स्वतंत्रता के प्रति सजग रह्ती हैं। 

सामाजिक परंपराओं के जाल को काटकर अपना अस्तित्व गढ़ती हैं। हिंदी भाषा में सरलता, सौंदर्यता से अंतर्मन की भावनाओं को पहुंचाने में कामयाब रहीं। गद्य-पद में समान रूप से ख्याति प्राप्त बहुमुखी प्रतिभा की धनी…

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Added by babitagupta on August 31, 2021 at 1:30pm — 1 Comment

ग़ज़ल- शिवाला लगा

122 122 122 12

1 तुझे जिसके लहज़े में ताना लगा

मुझे दिल से वो शख़्स सच्चा लगा

 2 ये मत पूछ क्या उसमें अच्छा लगा

 वो मासूम इक ज़िद्दी बच्चा लगा

3 तू सुन शोर पहले मेरे दिल का फिर

 बता क्यों तुझे मैं अकेला लगा

 4 बता वास्ता उससे रक्खूँ भी क्यों

 मुझे आदमी जब वो झूठा लगा

 5 थी कुछ बात या इश्क़ का था सरूर

हरिक चेहरा जो मुझको तेरा लगा

 6 मुहब्बत ही की है गुनह तो…

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Added by Rachna Bhatia on August 30, 2021 at 12:00pm — 7 Comments

कैसे सबका मोल चुकाऊँ?

सूरज किरणें देता जग को

नदिया देती निर्मल पानी।

पालन करती युगों-युगों से

धरती ओढ़ चुनरिया धानी।

शीतल छाया देता तरुवर

प्राणवायु यह पवन सुहानी।

फूल चमन को देते खुशबू

परम सार संतों की बानी।

उऋण हुए गुरु विद्या देकर

निर्धन को धन देकर दानी।

कैसे सबका मोल चुकाऊँ?

दीन अकिंचन मैं अज्ञानी।

हे चंडी! दे वर दे मुझको

रार अगर दुश्मन ने ठानी।

मातृ-भूमि के चरणों पर मैं

अर्पण कर दूँ शीश…

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Added by Dharmendra Kumar Yadav on August 29, 2021 at 2:38pm — 4 Comments

दोहा मुक्तक ......

दोहा मुक्तक :.....

1

मिथ्या मैं की डुगडुगी, मिथ्या मैं के ढोल ।

मिथ्या मैं का आवरण, मिथ्या मीठे बोल ।

मिथ्या जग के कहकहे, मिथ्या सब सम्बंध -

मिथ्या मौसम प्रीत के, मिथ्या प्रीत के कौल ।

............................................................

2

हर लकीर में जिन्दगी, जीती एक विधान ।

मरता है सौ बार तब , जीता है इन्सान ।

रख पाया है वक्त की, वश में कौन लगाम -

श्वास पृष्ठ पर है लिखा, आदि संग अवसान ।

सुशील सरना / 29-8-21

मौलिक…

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Added by Sushil Sarna on August 29, 2021 at 10:48am — 4 Comments

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