For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

मृग-बादल (तोटक छंद)

छंद - तोटक

(सलगा सलगा सलगा सलगा = 12 वर्ण)

नभ बादल बादल आज यहाँ,

चमकार करे सुन वीज यहाँ,

नभ काजल काजल मेश हुआ,

दिलका दव ठार तु यही दुआ|

मृग-बादल आज महेर दया,

दिलसे बरसो अब छोड़ हया,

गजराज जरा गरजे नभमें,

वनराज फिरे फिरसे वनमें|

टपके जलबुंद हजार कहीं,

झमकार सुनो जलधार यही,

जल-चुंबन अंबर से बरसे,

पल ये पल को धरती तरसे|

मधु सोडम जो प्रसरी भुवने,

तन वो मन हाश भरे सुखमें,…

Continue

Added by Mukulkumar Limbad on August 24, 2020 at 11:30pm — 5 Comments

गीत (रोला छंद पर आधारित )

मेरा सीमित प्यार तुम्हे आयाम चाहिए

सीता बनना कठिन पर तुम्हे राम चाहिए
बाबुल का घर छोड़
आत्म अनुमति से आई
नर के दृढ भुजपाश
में सदा तृप्ति समाई
अब गंगोदक छोड़ तुम्हे क्यों जाम चाहिये …
Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 24, 2020 at 2:55pm — 4 Comments

रोक लेते तुम अगर..

अपनी माटी गांव छोड़,हम

माया नगरी आए थे..

अम्मा बाबू और बच्चों के

सपने संग में लाए थे।



हाँफ रहे बेजान शहर मे

जीवन हमने डाला था..

अपने श्रम सीकर से इसको

हरा भरा कर डाला था।

टैम्पो रिक्शा खींचा हमने

उद्योगों के पहिये घुमाए थे

रहे सदा झोपड़ी मे हम

पर कितने महल बनाए थे।

समय का पहिया ऐसे घूमा

सारे पहिए जाम हुए...

तुम अपने थे,फिर यों कैसे

निष्ठुर बन अनजान हुए।

एक बार तो कहते हमसे

रूको यहाँ मत जाओ…

Continue

Added by Sheela Sharma on August 24, 2020 at 10:00am — 3 Comments

सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

पन्द्रह अगस्त फिर आया है

हमको यह याद दिलाने को,

स्वतंत्रता की खुशी मनाएं

पर ना भूलें बलिदानों को।

ये धरती, येअम्बर अब भी

साक्षी है उन दीवानों की,

सर्वस्व लुटाकर अमर हुए

आजादी के परवानों की।

ना सहन कर सके जो थे

भारत माता का बन्धन,

निज शीश चढ़ा आहुति में

करते थे राष्ट्र यज्ञ, वन्दन।

हम भूलें नहीं कभी भी

आजादी का वह नारा,

हम मिटें भले, लेकिन यह

लहराए तिरंगा प्यारा।

हम बंटे नहीं टुकड़ों में

यह शपथ हमें लेना है,

उन वीरों की यह…

Continue

Added by Sheela Sharma on August 24, 2020 at 9:30am — 2 Comments

आत्मबोध

खालीपन का भारीपन

नहीं मालूम, नहीं मालूम मुझको

मेरा यह अनुभव केवल मेरा ही है

या है यह हर किसी का

कहीं कुछ खो देने की पीड़ा से निवर्त होने  का

अनवरत  प्रारम्भिक  प्रयास…

Continue

Added by vijay nikore on August 24, 2020 at 7:30am — 4 Comments

कुछ क्षणिकाएँ :

कुछ क्षणिकाएँ :

1.

बहुत कुछ कह जाती हैं

कुछ

कहने से पहले

ये

ख़ामोश सी आँखें

............................

2.

गुंजित कर गईं

कितनी ही चुप सी दस्तकें

एक

जुगनू सी याद

.................................

3.

कब टूटा है

आसमान से चाँद

टूटते तो

तारे हैं

अतृप्त अभिलाषाओं के

आसमान से

दिल के

..............................

4.

करती रही बातें

बिस्तर पर

सोये सपनों से…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 23, 2020 at 9:50pm — 6 Comments

गजल(रात क्या क्या गुनगुनाती...)

2122  2122  212

रात क्या क्या गुनगुनाती रह गई

आपकी बस याद आती रह गई।1

सर्द मौसम हो गया कातिल बहुत

सांस अपनी सनसनाती रह गई।2

चांद में है दाग़,देखा आपने,

चांदनी यूं मुस्कुराती रह गई।3

सिलसिले सब याद में आते रहे

आरज़ू तो कुनमुनाती रह गई।4

गीत बनता लय पिरोकर,क्या कहूं?

बात दिल की ही लजाती रह गई।5

आंख हरदम जो बिछाती थी हवा,

इस दफा वह भाव खाती रह गई। 6

आशिया रौशन हुआ था बस…

Continue

Added by Manan Kumar singh on August 22, 2020 at 9:44pm — 6 Comments

गीत , चाँद हमारे अँगना

झाँका , झाँका , देखो झाँका

चाँद हमारे अँगना

आने वाला है कोई 

बाजे मेरा कँगना

हो, हो , हो , हो

झाँका, झाँका , देखो झाँका

सुहाना समां है

खुला आसमां है

करतीं ठिठोली

तारों की टोली

झूमे , झूमे , देखो झूमे

आज हमारे अँगना 

आने....

बहे पुरवइया

डोले मन की नैया

मौसम की घड़ियाँ

जादू की छड़ियाँ

फेरें , फेरें , जादू फेरें

आज हमारे…

Continue

Added by Usha Awasthi on August 21, 2020 at 11:35pm — 8 Comments

एकाकी मन........

21.8.20

एकाकी मन........ 

झूठ है

एकांत में

सिर्फ एकांत होता है

एकाकी मन

वहीं शांत होता है

थक जाता है ये एकाकी मन

ज़िंदगी के जालों को

सुलझाते सुलझाते

अनकहे अहसासों को

दबाते दबाते

भावनाओं की गठरी को

उठाते उठाते

अंधेरों की स्याह चादर में

अपने ही साये

एकाकीपन की देह को

नोचते नज़र आते हैं

सच तो ये है

एकांत में अनचाहे बवंडर

एकाकी मन के

एकाकीपन को लील जाते हैं

सुशील सरना…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 21, 2020 at 7:47pm — 8 Comments

हर सम्त अँधेरा है इसे दूर भगाओ...(ग़ज़ल-सालिक गणवीर)

221 1221 1221 122

हर सम्त अंँधेरा है इसे दूर भगाओ

है कोई मुनव्वर तो मिरे सामने आओ

क़ातिल हो तो क़ातिल की तरह पेश भी आओ

घायल हूँ मिरे ज़ख़्म पे मरहम न लगाओ

कोई न उठाएगा यहाँ बोझ तुम्हारा

शानों को ज़रा और भी मजबूत बनाओ

कश्ती को सँभालो न रहो चूर नशे में

गर डूबना है डूबो हमें तो न डुबाओ

काँटों की तो तासीर है वो चुभते रहेंगे

तुम फूल हो ख़ुशबू की तरह फैलते जाओ

ऐसे भी वो करता है सर-ए-आम…

Continue

Added by सालिक गणवीर on August 21, 2020 at 12:00pm — 14 Comments

गजल(शायरी अब क्या रूठेगी...)

2122 2122 2122 212

शायरी अब क्या रूठेगी,सोचता हूं आजकल,

हो रही बुझती अंगीठी,सोचता हूं आजकल।1

शेर मुंहफट हो गए हैं,हर्फ लज्जित हो रहे,

शायरों की सांस फूली,सोचता हूं आजकल।2

मुंह चिढ़ातीं आज बहरें,खुल रहे हैं राज कुछ,

पिट रही कैसी मुनादी? सोचता हूं आजकल।3

राह अब अंधे दिखाते,झूठ ताना दे रहा,

हो रही सच की गवाही, सोचता हूं आजकल।4

शब्द सारे मौन लगते,अर्थ होता गौण है,

चल रही हैं गाली ' - ताली, सोचता हूं…

Continue

Added by Manan Kumar singh on August 21, 2020 at 9:30am — 12 Comments

काँटों से बिँध फूल को आते - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२२२/२२२२/२२२२/२२२



शीशे को भी  रखने  वाले  पत्थर लोगों नहीं रहे

‌यौवन के अब पहले  जैसे  तेवर  लोगों नहीं रहे।१।

**

ढूँढा करते  हैं  गुलदस्ते  तितली  भौंरे  आज यहाँ

‌काँटों से बिँध फूल को आते मधुकर लोगों नहीं रहे।२।

**

केवल आँच जला देती है सावन में भी देखो अब

ज्लाला से लड़ बचने वाले वो घर लोगों नहीं रहे।३।

**

एक तो पहले से मुश्किल थी ये कोरोना क्या आया

‌रोज कमा खाने के भी अब अवसर लोगों नहीं रहे।४।

**…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 21, 2020 at 9:00am — 10 Comments

ग़ज़ल (मौत की दस्तक है क्या...)

2122 / 2122 / 2122 / 212

हो रही है  दिल पे खट-खट मौत की दस्तक  है क्या 

जा रहे वापस या उसके क़दमों की ठक-ठक है क्या

फिर उठा  है  हर तरफ़  ये इक धुआँ सा आज क्यों

आग जिससे घर जला था बढ़ गई दिल तक है क्या

भूल   बैठा   है  मुझे   तू   सुन  के  या   अन्जान  है

मेरी आहों  की  रसाई  आज  भी  तुझ  तक  है क्या

गुम हुआ  हूँ जबसे  मैं  उसके  ख़याल-ओ-ख़्वाब में

बोलता हूँ जब भी कुछ ये सुनता हूंँ बक-बक है…

Continue

Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on August 20, 2020 at 6:06pm — 15 Comments

सारा हिन्दुस्तान

पढ़ी - लिखी जो गृहणियाँ

देखें निज परिवार

घर में बूढ़ी सास हैं

और श्वसुर लाचार

शिशु जिनके हैं पालने

सेवा की दरकार

आया पर छोड़ें नहीं

सहें स्वयं सब भार

गढ़ती हैं व्यक्तित्व वह

जिस विधि कोई कुम्हार

खोट सुधार सहन करें

चाहे विघ्न हजार

सदा करें निष्काम हो

सबके सुख की वृद्धि

प्रेम , हर्ष , ऐश्वर्य की

होती तभी समृद्धि

घर कुटुम्ब के हेतु जो

अपना सुख दे…

Continue

Added by Usha Awasthi on August 19, 2020 at 7:24pm — 8 Comments

किसी की आँख का काँटा - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



किसी की आँख  का  काँटा  न  तू होना गँवारा कर

किसी की आँख का तारा स्वयम् को हाँ बनाया कर।१।

**

ये जननी जन्म भूमि तो सभी को स्वर्ग से भी बढ़

गढ़ी हो नाल जिस भूमी उसे हर पल सँवारा कर।२।

**

उतर जाये तो जीवन ये रहे लायक न जीने के

उतरने दे न पानी निज न औरों का उतारा कर।३।

**

जो अपनी नींद सोता हो जो अपनी नींद जगता हो

उसी सा होने की जिद रख उसी को बस सराहा कर।४।

**

हँसी की बात  लगती  पर  हँसी  में मत उड़ा देना

अगर दाड़ी…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 19, 2020 at 4:01pm — 3 Comments

गीत-तस्वीर तुम्हारी

सभी पंक्तियाँ 16-16 मात्राभार के क्रम में

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

रोज सवेरे से सिर धुनते

शाम ढले तक याद संभाली

एक सिरा न हाथ में आया

टुकड़े टुकड़े रात खंगाली

आँगन ढूढ़ा कमरा ढूढ़ा

ढूढ़ लिए दालान अटारी

घर के किस कोने में रख के

भूल गया तस्वीर तुम्हारी

देख पपीहे की अकुलाहट

आसमान में बादल आये

बुलबुल छेड़े खूब तराना

भँवरे फूलों पे मंडराये

तू भी कोयल बड़ी…

Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2020 at 11:00pm — 6 Comments

माँ की मिली जो गोद तो जन्नत में आ गए.- गजल

बहर- 221, 2121, 1221, 212

घर से निकल के आज अदालत में आ गए,

नाज़ुक हमारे रिश्ते मुसीबत में आ गए. 

हमने जरा सा आइना उनको दिखा दिया,

अहसान भूल कर वो अदावत में आ गए.

कोने में पेड़ आम का चुपचाप है…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on August 18, 2020 at 9:00pm — 10 Comments

सावनी दोहे

सावनी दोहे

गुन -गुन गाएं धड़कनें, सावन में मल्हार ।

पलक झरोखों में दिखे, प्यासा -प्यासा प्यार ।।



अनुरोधों के ज्वार हैं, अधरों पर स्वीकार ।

प्रतिबन्धों की हो गई, मूक रैन में हार ।।



सावन में अक्सर बढे़, पिया मिलन की प्यास ।

हर गर्जन पर मेघ की, यादें करती रास । ।



बूंदों की अठखेलियां, नटखट से इंकार ।

बेसुध तन पर प्यार की, पड़ती रही फुहार…

Continue

Added by Sushil Sarna on August 18, 2020 at 8:14pm — 10 Comments

वक़्त लगता है

221 2121 1221 212

सुन इश्क जादू-टोने में कुछ वक़्त लगता है/1

ये प्यार-व्यार होने में कुछ वक़्त लगता है

मैं चाहती हूँ रोना बड़ी जोर से मगर/2

दिल खोल कर के रोने में कुछ वक़्त लगता है

ये सर्द रातें दर्द बयां करती है मेरा*

अंधेरे कमरें में मैंने पैकर का घर देखा/3

तन्हा अकेले सोने में कुछ वक़्त लगता है

पड़ जाएं हम किसी के यूं ही इश्क़ में कैसे/4

हमको किसी का होने में कुछ वक़्त लगता है

हम तो ज़मीं पे सोते हैं तारों की छांव में/5

समझो…

Continue

Added by Dimple Sharma on August 18, 2020 at 3:04pm — 7 Comments

दो चार रंग छाँव के हमने बचा लिए - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

टूटे जो डाल से वही पत्ते उठा लिए

दीवार घर की सूनी थी उस पर सजा लिए।१।

**

वैसे खिले थे फूल भी किस्मत से तो बहुत

हमने ही अपनी राह में काँटे बिछा लिए।२।

**

नश्तर थे सब के हाथ में आये कुरेदने

आया था कौन घाव की बोलो दवा लिए।३।

**

कहने को धूप राह में तीखी तो थी मगर

दो चार रंग छाँव के हमने बचा लिए।४।

**

जैसे फिरे थे आपकी गलियों में हम कभी

फिरता रहा है कौन यूँ अपना पता लिए।५।

**

ये कर्ज किससे यूँ भला यारो… Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 18, 2020 at 11:05am — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

sushil yadav posted blog posts
22 hours ago
Sushil posted blog posts
22 hours ago
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
22 hours ago
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"सभी को मिलकर ओबीओ को बचाने का सतत प्रयास करते रहना चाहिए।"
Sep 17
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post सांकल मन के द्वार पर
"आ.भाई विजय जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर रचना हुई है। हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Sep 17
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"atyant dukahd "
Sep 11

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service