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गजल(शायरी अब क्या रूठेगी...)

2122 2122 2122 212

शायरी अब क्या रूठेगी,सोचता हूं आजकल,

हो रही बुझती अंगीठी,सोचता हूं आजकल।1

शेर मुंहफट हो गए हैं,हर्फ लज्जित हो रहे,
शायरों की सांस फूली,सोचता हूं आजकल।2

मुंह चिढ़ातीं आज बहरें,खुल रहे हैं राज कुछ,
पिट रही कैसी मुनादी? सोचता हूं आजकल।3

राह अब अंधे दिखाते,झूठ ताना दे रहा,
हो रही सच की गवाही, सोचता हूं आजकल।4

शब्द सारे मौन लगते,अर्थ होता गौण है,
चल रही हैं गाली ' - ताली, सोचता हूं आजकल।5

बांटते फिरते नदी को,जो बहुत गुणवान हैं,
हो रहे नर पानी ' - पानी ,सोचता हूं आजकल।6
" मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manan Kumar singh on August 22, 2020 at 9:40pm

आपका आभार आदरणीय आशीष जी।

Comment by आशीष यादव on August 22, 2020 at 6:54pm

उम्दा बातें कह दी आपने। बेहतरीन ग़ज़ल पर बधाई स्वीकार कीजिए।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on August 22, 2020 at 9:57am

जनाब मनन कुमार जी आदाब, माज़रत चाहता हूँ मैं चूक गया। आप बजा फरमाते हैं। "शायरी क्या अब ये होगी, कैसा रहेगा। 

Comment by Manan Kumar singh on August 22, 2020 at 9:24am

लेकिन अमीर जी,वैसा करने पर काफिया बरकरार नहीं रहेगा न।

Comment by Manan Kumar singh on August 22, 2020 at 6:44am

आभार आदरणीय अमीर जी।आपकी सलाह सराहनीय है।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on August 21, 2020 at 10:56pm

आदरणीय मनन कुमार सिंह जी आदाब, उत्तम चिंतन-मनन के साथ अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ,

आदरणीय समर कबीर साहिब की बात से सहमत हूँ। "शायरी रूठेगीक्या अब,सोचता हूं आजकल," अब ये मिसरा बह्र में है। सादर। 

Comment by Manan Kumar singh on August 21, 2020 at 9:32pm

शुक्रिया आदरणीय समर जी।एक शेर याद आ रहा:

"चांद में है दाग़,देखा जा रहा,
चांदनी क्यूं मुस्कुराती रह गई?"

Comment by Samar kabeer on August 21, 2020 at 6:01pm

आपकी ख़्वाहिश है तो अपने टूटे फूटे विचार रख देता हूँ ।

'शायरी अब क्या रूठेगी,सोचता हूं आजकल'

इस मिसरे में 'रूठेगी' का वज़्न 222 है,इसलिए बह्र गड़बड़ हो रही है, देखियेगा ।

Comment by Manan Kumar singh on August 21, 2020 at 5:38pm

दिली आभार आदरणीय समर जी।गजल की बावत,आप अपने बहुमूल्य विचार न दे सके।

Comment by Manan Kumar singh on August 21, 2020 at 5:35pm

हार्दिक आभार आदरणीया डिंपल जी।

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