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जीवन का कर्फ्यू

जीवन का कर्फ्यू

रोजमर्रा की तरह टहलते हुये रामलाल उद्यान में गोपाल से मिला तो उसके चेहरे की झाईयां से झलकती खुशी कुछ और ही बयां कर रही थी।इससे पहले मैं कुछ पूछता कि उसने कहा, 'यार,कल जैसा दिन गुजारे जमाना हो गया।'

'पर यार कल तो कर्फ्यू लगा था।न किसी से मिलना-जुलना हुआ।कितना बोरियत भरा दिन था?'

'तेरे लिए था।पर इसने मेरी जिन्दगी के कर्फ्यू को हटा दिया।'

'कुछ समझा नही?'प्रश्न भरी निगाह से रामलाल ने गोपाल की तरफ देखकर कहा।

गोपाल ने पास पङी बेंच पर उससे बैठने का इशारा…

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Added by babitagupta on March 22, 2020 at 11:33pm — 2 Comments

ग़ज़ल -:- ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

ख़ुद ही ख़ुद को निहारते हैं हम

आरती ख़ुद उतारते हैं हम

फिर भी वैसे के वैसे रहते हैं

ख़ुद को कितना सँवारते हैं हम

दूसरों का मजाक करते हैं

ख़ुद की शेखी बघारते हैं हम

सिर्फ़ अपनी किसी जरूरत में

दूसरों को पुकारते हैं हम

डाल कर दूसरों में अपनी कमी

दूसरों को विचारते हैं हम

जीतने से ज़ियादा आये मज़ा

जब महब्बत में हारते हैं हम

इस खुशी…

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Added by सूबे सिंह सुजान on March 22, 2020 at 2:02pm — 6 Comments

बाहर के डर से लड़ लेंगे भीतर का डर कैसे भागे |(७३ )

 एक गीत

-----------

बाहर के डर से लड़ लेंगे

भीतर का डर कैसे भागे |

**

बचपन से देखा है हमने

अक्सर खूब डराया जाता |

दुःख यही है अपनों द्वारा

ऐसा क़दम उठाया जाता |

छोटी छोटी गलती पर भी

बंद किया जाता कमरे में,

फिर शाला में अध्यापक का

डण्डा हमें दिखाया जाता |

एक बात है समता का यह

लागू रहता नियम सभी पर,

निर्धन या धनवान सभी के

बच्चे रहते सदा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 21, 2020 at 11:30am — 4 Comments

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

एक अवसर सा मानो हाथ आया जबरन

 
बहुत दिन बाद
इतिहास के पन्नों पर दर्ज़ होंगे
ये आजकल के दिन
ये जबरन बंद के दिन
 
जब पूरा परिवार
एक पूरे परिवार की तरह
पूरा -पूरा दिन साथ -साथ बैठ…
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Added by amita tiwari on March 20, 2020 at 7:00pm — 1 Comment

ख़ुदा ख़ैर करे (ग़ज़ल)

रमल मुसम्मन सालिम मख़्बून महज़ूफ़ / महज़ूफ़ मुसक्किन

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़इलुन/फ़ेलुन

2122 1122 1122 112 / 22

ये सफ़र है बड़ा दुश्वार ख़ुदा ख़ैर करे

राह लगने लगी दीवार ख़ुदा ख़ैर करे [1]

इस किनारे तो सराबों के सिवा कुछ भी नहीं

देखिए क्या मिले उस पार ख़ुदा ख़ैर करे [2]

लोग खाते थे क़सम जिसकी वही ईमाँ अब

बिक रहा है सर-ए-बाज़ार ख़ुदा ख़ैर करे [3]

ये बग़ावत पे उतर आएँगे जो उठ बैठे

सो रहें हाशिया-बरदार ख़ुदा ख़ैर करे…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 20, 2020 at 7:00pm — 16 Comments

बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए (७२ )

(221 2121 1221 212 )

बैठे निग़ाहें किस लिए नीची किये हुए

क्या बात है बताइए क्यों लब सिले हुए

**

काकुल के पेच-ओ-ख़म के हैं अंदाज़ भी जुदा

सर से दुपट्टा जैसे बग़ावत किये हुए

**

मिज़गाँ के साहिलों पे टिकी आबजू-ए-अश्क

काजल बिखेरने की जूँ हसरत लिये हुए

**

क्यों हो गए हैं आपके रुख़्सार आतशीं

जैसे कनेर लाल ख़िज़ाँ में खिले हुए

**

शेरू को ख़ौफ़ इतना है बैठा दबा के दुम

मैना के सुर भी…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 20, 2020 at 11:30am — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
कोरोना के विरुद्ध पाँच दोहे (गणेश बाग़ी)

(1)

सुनी सुनाई बात पर, मत करना विश्वास ।

चक्कर में गौमूत्र के, थम ना जाए श्वास ।।

(2)

कोरोना से तेज अब, फैल रही अफ़वाह ।

सोच समझ कर पग रखो, कठिन बहुत है राह ।।

(3)

कोरोना के संग यदि, लड़ना है अब जंग ।

धरना-वरना बस करो, बंद करो सत्संग ।।

(4)

साफ सफाई स्वच्छता, सजग रहें दिन रात ।

दें साबुन से हाथ धो, कोरोना को मात ।

(5)

मुश्किल के इस दौर में, मत घबराओ यार ।

बस वैसा करते रहो, जो कहती सरकार ।।

(मौलिक एवं…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2020 at 10:00am — 4 Comments

नन्ही सी चीटी हाथी कि ले सकती जान है

नन्ही सी चीटी  हाथी की ले सकती जान है

कोरोना ने कराया हमें इसका भान है।

हाथों को जोड़ कहता सफाई की बात वो

पर तुमको गंदगी में दिखी अपनी शान है।

बातें अगर गलत हों तो वाजिव विरोध है

सच का भी जो विरोध करे बदजुबान है।

नक़्शे कदम पे तेरे क्यूँ सारा जहाँ चले

बातों में बस तुम्हारी ही क्या गीता ज्ञान है

कोरोना की ही शक्ल में नफरत है चीन की

जिसके लिए जमीन ही सारी जहान है

मालिक के दर पे सज्दा वजू करके  ही…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 19, 2020 at 12:30pm — 4 Comments

क्या टूट चुका दिल है जो वो दिल न रहेगा ?(७१)

(221 1221 1221 122 )

क्या टूट चुका दिल है जो वो दिल न रहेगा ?

जज़्बात बयाँ करने के क़ाबिल न रहेगा ?

**

तालीम अगर देना कोई छोड़ दे जो शख़्स

क्या आप की नज़रों में वो फ़ाज़िल* न रहेगा ?(*विद्वान )

**

फ़रज़न्द के बारे में भला कौन ये सोचे

दुख-दर्द में इक रोज़ वो शामिल न रहेगा

**

दो चार अगर झूठ पकड़ लें तो न सोचें

जो खू से है मजबूर वो बातिल* न रहेगा (*झूठा )

**

आया है सज़ा काट के जो क़त्ल की उसके

धुल जाएँगे क्या पाप वो क़ातिल न रहेगा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 19, 2020 at 12:00am — 8 Comments

किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर पाबन्दी -गजल

१२२२ /१२२२/ १२२२ /१२२२/

*

कभी कतरों में बँटकर  तो  कभी सारा गिरा कोई

मिला जो माँ का आँचल तो थका हारा गिरा कोई।१।

*

कि होगी कामना  पूरी किसी  की लोग कहते हैं

फलक से आज फिर टूटा हुआ तारा गिरा कोई।२।

*

गमों की मार से लाखों सँभल पाये नहीं  लेकिन

सुना हमने यहाँ  खुशियों  का भी मारा गिरा कोई।३।

*

किसी आजाद पन्छी को न थी मन्जूर…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 18, 2020 at 6:17am — 7 Comments

छुड़ाना है कभी मुमकिन बशर का ग़म से दामन क्या ? (७० )

(1222 1222 1222 1222 )

छुड़ाना है कभी मुमकिन बशर का ग़म से दामन क्या ?

ख़िज़ाँ के दौर से अब तक बचा है कोई गुलशन क्या ?

**

कभी आएगा वो दिन जब हमें मिलकर सिखाएंगे

मुहब्बत और बशरीयत यहाँ शैख़-ओ-बरहमन क्या ?

**

क़फ़स में हो अगर मैना तभी क़ीमत है कुछ उसकी

बिना इस रूह के आख़िर करेगा ख़ाना-ए-तन* क्या ?(*शरीर का भाग )

**

निग़ाह-ए-शौक़ का दीदार करने की तमन्ना है

उठेगी या रहेगी बंद ये आँखों की चिलमन क्या ?

**

अगर बेकार हैं तो काम ढूंढे या करें बेगार…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 18, 2020 at 12:00am — 6 Comments

बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

बाँधा जो साँसों ने साँसों से धागा

आँसू में, कुछ मुस्कानों में

मिलन की वेला के सुख में मिश्रित

बिछोह की घड़ी की व्यथा अपार

डरते-मुस्कुराते चेहरे पर पाईं हमने

ढुलक आई थीं बूँदें जो भीगी पलकों से

मिला था उनमें प्राणों को प्रीति का दान

ऐसे में हृदय ने सुनी हृदय की मधुर धड़कन

मधुमय मूक स्वर उस अद्वितीय आलिंगन में

आच्छादित हुए ऐसे में ज्यों भीगे गालों पर गाल

मुझको लगा उस पावन…

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Added by vijay nikore on March 16, 2020 at 2:00pm — 6 Comments

चार शेर ( फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन  )

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

(बह्र: रमल मुसम्मन महजूफ)

2122. 2122. 212.

ज़िन्दगी भर ये परेशानी रही

मेरे चारो सम्त वीरानी रही ।।

जिस के पीछे अब ज़माना है पढ़ा

वो कभी मेरी भी दीवानी रही ।।

शब मिलन की थी बहुत गहरी मगर

रात भर तारो की निगरानी रही।।

दोस्ती कर ली किताबों से मैं ने

भूलने में उसको आसानी रही ।।

- शेख़ ज़ुबैर अहमद

( मौलिक एवम अप्रकाशित )

Added by Shaikh Zubair on March 15, 2020 at 6:57pm — 2 Comments

किचन क्वीन(लघुकथा)



दुल्हन ने किचन की कमान संभाली। मितव्ययिता के आकांक्षी घरवाले बड़ी बड़ी उम्मीदें पाले हुए थे कि अब कुछ बचत होगी।बजट सुख दायक होगा। अन्य कार्यों के लिए कुछ धन बचाया जा सकेगा।......

फिर कुछ दिनों के बाद जब खाने का जायका मुंह चिढ़ा ने लग,तब सास ने एक दिन राशन के बरतन देखे। देखती ही रह गई।नमक - चीनी की पहचान मुश्किल थी।चावल - दाल ग ले मिलते दिखे। जो बरतन सामने थे,वे लगभग भरे थे, पीछे वाले रिक्तप्राय।वह किचन प्रबंधन का नवीन गुर समझ गई।खाने के स्वाद की माधुर्य मिली मिर्ची मुखर हो…

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Added by Manan Kumar singh on March 15, 2020 at 11:08am — 4 Comments

जो तेरी आरज़ू (ग़ज़ल)

बहरे हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

1 2 2 2 / 1 2 2 2 / 1 2 2

जो तेरी आरज़ू खोने लगा हूँ

जुदा ख़ुद से ही मैं होने लगा हूँ [1]

जो दबती जा रही हैं ख़्वाहिशें अब

सवेरे देर तक सोने लगा हूँ [2]

बड़ी ही अहम हो पिक फ़ेसबुक पर

मैं यूँ तय्यार अब होने लगा हूँ [3]

जो आती थी हँसी रोने पे मुझको

मैं हँसते हँसते अब रोने लगा हूँ [4]

बढ़ाता जा रहा हूँ उनसे क़ुरबत

मैं ग़म के बीज अब बोने लगा हूँ [5]

जो पुरखों की दिफ़ा…

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Added by रवि भसीन 'शाहिद' on March 15, 2020 at 1:00am — 11 Comments

मुक्तक -कोरोना

किसी की जां पे बन आई, किसी को खेल कोरोना

नहीं मुश्किल, बहुत आसान अपने 'हाथ ही धोना'


कि छोटी-छोटी बातों को रखो तुम ध्यान में अपने

रहेगा दूर फिर हमसे विदेशी रोग का रोना

चलो छोड़ो गले मिलना,'नमस्ते' ही को अपनाओ

बढ़ाओ अपनी क्षमता और 'शाकाहार' ही खाओ…

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Added by Poonam Matia on March 15, 2020 at 1:00am — 5 Comments

"मैं आ रही हूँ माँ....."

"मैं आ रही हूँ माँ..."

कितनी बार कहा था माँ ने "बेटा! बस एक बार तुम ग्रेजुएट हो जाओ फिर जहाँ भी किस्मत आजमाना चाहोगी तुम्हें रोकूँगी नही। ये पूरा का पूरा आकाश तुम्हारा हैं।" किंतु तब मैंने उनकी बातों को यूंही हवा में उड़ा दिया था।

संयुक्त परिवार में घर की सबसे खूबसूरत बेटी थी वह। बस! यही ज़रूर उसे ले डूबेगा कहाँ जानती थी। बारहवी के बाद ही अपनी रिश्तेदार के घर इस नगरी में आयी तो वापस लौटी ही नहीं कभी। माँ समझा-बुझाकर ले जाने आई थी उसे तब उन्हें…

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on March 14, 2020 at 4:00pm — 1 Comment

हुस्न का उसे ख़ुदा क्यों ग़ुरूर हो गया (६९ )

(212 1212 212 1212 )

हुस्न का उसे ख़ुदा क्यों ग़ुरूर हो गया

जो करीब दिल के था आज दूर हो गया

**

क्यों चुनी है ये डगर क्यों ख़फ़ा हुई नज़र

क्या गुनाह कर दिया क्या क़ुसूर हो गया

**

बेख़बर रहा जिसे मानता था हमसफ़र

बेवफ़ा बता के ख़ुद बेक़ुसूर हो गया

**

हो गई हुज़ूर की दीद मुझको जब कभी

यूँ लगा मुझे सनम अब ज़ुहूर  हो… Continue

Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 14, 2020 at 1:00am — 2 Comments

वृज की होली

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

वृज बीथिन्ह मँह , अजिर , अटारी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

अबिर , गुलाल मलैं गोपियन कै

लुकैं छिपैं वृज की सब नारी

ढूँढि - ढूँढि रंग - कुंकुम मारैं

घूमि - घूमि गोपी दैं गारी

श्याम सामने रोष दिखावहिं

पाछे मुसकावहिं सब ठाढ़ी

होरी खेलत कृष्ण मुरारी

चिहुँक - चिहुँक राधा पग धारहिं

श्याम पकरि चुनरी रंग डारहिं

विद्युत चाल चपल मनुहारी

लपक - झपक कीन्ही…

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Added by Usha Awasthi on March 13, 2020 at 1:30pm — 4 Comments

किसी भी रहरवाँ* को जुस्तजू होती है मंज़िल की (६८ )

(1222 1222 1222 1222 )

.

किसी भी रहरवाँ को जुस्तजू होती है मंज़िल की 

सफ़ीनों को मुसल्सल खोज रहती है जूँ साहिल की

**

न करना तोड़ने की कोशिश-ए-नाकाम इस दिल को

बड़ी मज़बूत दीवारें सनम हैं शीशा-ए-दिल की

**

किया तीर-ए-नज़र से वस्ल की शब में हमें बिस्मिल

नहीं मालूम क्या है आरज़ू इस बार क़ातिल की

**

सियाही पोतने से रोशनी का रंग नामुमकिन

बनाएगी तुम्हें बातिल ही संगत रोज़ बातिल*…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on March 11, 2020 at 4:00pm — 2 Comments

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