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May 2019 Blog Posts

स्वप्न के सीवान में----------गीत

स्वप्न के सीवान में ज़ुल्फ़ों के बादल छा गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

चूम कर नज़रों से नज़रें, गुदगुदा कर मन गई

रूपसी जादू भरी थी मन की अभिहर* बन गई                      

तन सुरभि का यूँ असर खुद को भुला कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल गँवा कर आ गए।।

मन्द सी मुस्कान उसके होठों पर जैसे खिली

इस हृदय की बन्द साँकल खुद अचानक से खुली

हम मनस में रूप उसका लो सजा कर आ गए

चाँद क्या आया नज़र हम दिल…

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Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 10, 2019 at 9:00am — 4 Comments

माँ और मैं (चोका)

माँ बहुरूपी

मौजूद इर्द-गिर्द

पहचाना मैं!

ममता बरसाती

नि:स्वार्थ वामा

प्रकृति महायोगी

रोगी-भोगी मैं!

है त्यागी, चिकित्सक

सहनशील

सामंजस्य-शिक्षिका

शिष्य, लोभी मैं!

व्यक्तित्व बहुमुखी

चरित्रवान

परोक्ष-अपरोक्ष

लाभान्वित मैं!

विवादित-शोषित

कोमलांगिनी

अग्निपथ गमन

स्वाभिमानी माँ

यामिनी या दामिनी

अभियुक्त मैं!

बहुजन सुखाय

आत्म-दुखाय

उर्वीजा देवी तुल्य

है पूज्यनीय

पाता माता में…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 10, 2019 at 3:00am — 1 Comment

सार छंद -

1~

भवन और सड़कें पुल-पुलियाँ,मजदूरों की माया।

ईंटे पत्थर ढोते-ढोते, सिकुड़ी इनकी काया।।

श्रम के कौशल से भारत में, ताजमहल बन पाया।

लेकिन मजदूरों के हिस्से, हाथ कटाना आया।।

2~

भूख मिटाने की खातिर ही, श्रम करतीं महिलाएँ।

यदाकदा मजदूरी करते, बाल श्रमिक भी पाएँ।।

शिक्षा से वंचित रह जातीं, इनकीं ही संतानें।

मगर नीति निर्धारक शिक्षा, सौ प्रतिशत ही मानें।।

3~

सबकी खातिर महल अटारीं, जो मजदूर बनाते।

भूमिहीन होकर बेचारे, बेघर ही रह…

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Added by Hariom Shrivastava on May 9, 2019 at 9:28pm — 2 Comments

मित्र पर चंद दोहे :

मित्र पर चंद दोहे :

अपने मन को जानिए, अपना सच्चा मित्र।

दिखलाता हर कर्म का, श्वेत श्याम हर चित्र।।

किसको अपना हम कहें, किसको जानें ग़ैर।

मृदु शब्दों की आड़ में, मित्र निकालें बैर।।

सुख में हर जन साथ है, दुख में दीनानाथ।

दुःख में जब सब छोड़ दें, नाथ थामते हाथ।।

जग में सच्चे मित्र की, नहीं रही पहचान ।

कदम कदम विश्वास का ,हो जाता अवसान।।

मन को रोगी कर दिया, मित्र दे गया घात।

थामो मेरा हाथ…

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Added by Sushil Sarna on May 9, 2019 at 6:00pm — 2 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
आखिर क्यों ?

आख़िर क्यों पूछे तू ऐसे प्रश्न
नियति, जिनके उत्तर
ख़ुद तुझको ही स्वीकार नहीं ??
चाहे दुर्गम हों राहें पर सुन-
कर्मठता लिखे हमेशा जीत…
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Added by Dr.Prachi Singh on May 9, 2019 at 6:00pm — 1 Comment

साँसों की बैसाखी :

साँसों की बैसाखी :

जोड़ता है

अनजाने रिश्ते

तोड़ता है

पहचाने रिश्ते

जाने और अनजाने में

जान से कीमती

मोबाइल

साँसों का पर्याय है

जीवन का अध्याय है

किसी की जीत है

किसी की मात है

न उदय का भान है

न अस्त का ज्ञान है

हाथों में जहान है

स्वयं से अनजान है

इंसान को चलाता

एक और इंसान है

मोबाइल

चुपके से हंसाता है

चुपके से रुलाता है

सन्देश आता है

सन्देश जाता है…

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Added by Sushil Sarna on May 9, 2019 at 12:55pm — 1 Comment

तोटक छंद "विरह"

तोटक छंद "विरह"

सब ओर छटा मनभावन है।

अति मौसम आज सुहावन है।।

चहुँ ओर नये सब रंग सजे।

दृग देख उन्हें सकुचाय लजे।।

सखि आज पिया मन माँहि बसे।

सब आतुर होयहु अंग लसे।।

कछु सोच उपाय करो सखिया।

पिय से किस भी विध हो बतिया।।

मन मोर बड़ा अकुलाय रहा।

विरहा अब और न जाय सहा।।

तन निश्चल सा बस श्वांस चले।

किस भी विध ये अब ना बहले।।

जलती यह शीत बयार लगे।

मचले मचले कुछ भाव जगे।।

बदली नभ की न जरा…

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Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on May 8, 2019 at 2:21pm — 6 Comments

मदलेखा छंद -

  1. (मगण,सगण व गुरु एवं दो-दो चरणों में सम तुकांतता)

    -----------------------------------------------------------------

    1-

    नेताजी   कल   आए, बैठे   थे   बतियाए।

    बोले वोट दिलाओ, आओ हाथ मिलाओ।।

    2-

    नेताजी  जब आए, नारे  खूब  लगाए।

    घण्टों वो रिरियाए, पैसे भी दिखलाए।।

    3-

    मेरी  नाक  बचाओ, कोई  स्वाँग  रचाओ।

    जो चाहो तुम बोलो, मेरी किस्मत खोलो।।

    4-

    जो नेतागण आते, दूजे को गरियाते।

    घोटाले  करवाते, बातों में भरमाते।।

    5-

    कुर्सी…
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Added by Hariom Shrivastava on May 8, 2019 at 10:30am — 2 Comments

१. फुल स्टॉप .... ३ क्षणिकाएं

१. फुल स्टॉप .... ३ क्षणिकाएं

फुल स्टॉप

अर्थात

अंतिम बिंदु

अर्थात

जीवन रेखा का

जीवन बिंदु में विलय

अर्थात

समाहित हो गई

सूक्षम में

श्वास की लय

.......................

२. नो मोर ...

नो मोर

वन्स मोर

अंतिम छोर

उड़ गया पंछी

हर बंधन

पिंजरे के तोड़

.......................

३. रेखाएँ ....

रेखाएँ

हथेलियों की

मृत देह पर

जीवित देह सी रहीं

बस…

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Added by Sushil Sarna on May 7, 2019 at 7:41pm — 8 Comments

विकास - लघुकथा -

विकास - लघुकथा -

"शक़ूर भाई, चलो भी अब, चार बज गये। नेताजी के आने का समय हो गया।"

"मुन्ना जी, हमारे देश के नेता कभी समय से आते हैं क्या? अगर ये लोग इतने ही समय के पाबंद होते तो आज देश की ये हालत नहीं होती।"

"वह सब तो ठीक है पर अपने को इन सब बातों से क्या लेना देना।अपने को तो अपनी दिहाड़ी से मतलब|"

"अरे यार मुझे तो इसका भाषण भी सुनने को मन नहीं करता। अपने ऑटोवालों की यूनियन लीडर से भी घटिया भाषा प्रयोग करता है।"

"भाई जी, हम उसके संस्कार तो बदल नहीं सकते। वैसे…

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Added by TEJ VEER SINGH on May 7, 2019 at 10:15am — 12 Comments

ग़ज़ल

2122 2122 212

जब लबों पर वह तराना आ गया ।

याद फिर गुजरा ज़माना आ गया ।।

शब के आने की हुई जैसे खबर ।

जुगनुओं को जगमगाना आ गया ।।

मैकदे को शुक्रिया कुछ तो कहो।

अब तुम्हें पीना पिलाना आ गया ।।

वस्ल की इक रात जो मांगी यहां ।

फिर तेरा लहजा पुराना आ गया ।।

छोड़ जाता मैं तेरी महफ़िल मगर ।

बीच मे ये दोस्ताना आ गया ।।

जब भी गुज़रे हैं गली से वो मेरे ।

फिर तो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 5, 2019 at 11:43pm — 3 Comments

हास-परिहास (कविता)

टेढ़ा-मेढ़ा हास्य-रस
बड़बोलापन, बस!
सुबुद्धि हुई कुबुद्धि
धन-सिद्धि हो, बस!

तेरा-मेरा हास्य-रस
जीवन जस का तस
बुद्धियांँ हो रहीं ठस!
बच्चे-युवा हैं बेबस!

भोंडा-ओछा हास्य-रस
टीवी टीआरपी तेजस!
हास्यास्पद लगती बहस
सेल्फ़ी रहस्य दे बरबस!

स्वच्छ, स्वस्थ हास्य-रस
स्वाभाविक बरसता बस!
बाल-बुज़ुर्ग-मुख के वश
या फ़िर दे कार्टून, सर्कस!

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 5, 2019 at 10:28pm — 2 Comments

महाभुजंगप्रयात छंद में मेरी चतुर्थ रचना

करे वोट से चोट जो हैं लुटेरे, खरे मानकों पे चुनें आप नेता

खड़ा सामने भ्रात हो या भतीजा, भले जो लगे आपको वो चहेता

नहीं वोट देना उसे ज़िन्दगी में, कभी आपको जो नहीं मान देता

सदा जो करे पूर्ण निःस्वार्थ सेवा, उसे ही यहाँ पे बनाएँ विजेता।1।

कहीं जाति की है लड़ाई बड़ी तो, कहीं सिर्फ है धर्म का बोलबाला

इसे मुल्क में भूल जाएं सभी तो, चुनावी लड़ाई बने यज्ञशाला

अकर्मी विधर्मी तथा भ्रष्ट जो है, वही देश का है निकाले दिवाला

चुनें वोट दे के उसी आदमी को, दिखे जो प्रतापी…

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Added by नाथ सोनांचली on May 4, 2019 at 9:41pm — 7 Comments

जिम्मेदारी-लघुकथा

यह तीसरी बार था जब वह व्यक्ति चिल्ला रहा था और उठ कर भागने का प्रयास कर रहा था "मुझे कुछ नहीं हुआ है, मुझे जाने दो". खून का बहना अभी तक रुका नहीं था और उसके चेहरे से लेकर कपड़ों तक फ़ैल गया था. दो कम्पाउंडरों ने उसे पकड़ कर वापस लिटा दिया और डॉक्टर फिर से उसके सर पर दवा लगाकर पट्टी बांधने की तैयारी कर रहा था.

बमुश्किल आधे घंटे पहले ही उसने सड़क के दूसरी तरफ इस एक्सीडेंट को होते हुए देखा था और रात के सन्नाटे में वह अपनी गाड़ी मोड़कर वापस आया. वहां मौजूद लोगों की मदद से उसने उसे इस हस्पताल में…

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Added by विनय कुमार on May 4, 2019 at 6:19pm — 6 Comments

द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व (लघुकथा)

बहुमुखी प्रतिभाओं के धनी तीन रंगमंचीय कलाकार थिएटर में फुरसत में मज़ाकिया मूड में बैठे हुए थे।



"तुम दोनों धृतराष्ट्र की तरह स्वयं को अंधा मानकर अपनी आंखों में ये चौड़ी और मोटी काली पट्टियां बांध लो!" उनमें से एक ने शेष दो साथियों से कहा, "पहला अंधा सुबुद्धि और दूसरा अंधा कुबुद्धि कहलायेगा! ... ठीक है!"



दोनों ने अपनी आंखों में पट्टियां सख़्ती से बंधवाने के बाद उससे पूछा, " ... और तुम क्या बनोगे, ऐं?"



"मैं! .. मैं बनूंगा तुम्हारी और आम लोगों की 'दृष्टि'!…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 4, 2019 at 3:30am — 2 Comments

नैन पर चंद दोहे :

नैन पर चंद दोहे :

नैन नैन में हो गई, अंतर्मन की बात।

नैन गाँव को मिल गयी, सपनों की सौग़ात।।

रीत निभा कर प्रीत ने, दिल पर खाई चोट।

आँस न स्रावित हो सकी, थी पलकों की ओट।।( आँस=वेदना )

नैन झुके तो शर्म है, नैन उठें बेशर्म।

नैन जानते नैन के, कैसे होते कर्म।।

नैन बड़े बेशर्म हैं ,नैनों का क्या धर्म।

प्रीत सयानी जानती, प्रीत नैन का मर्म।।

नैन नैन को भेजते,अंतस के सन्देश

बिना दरस के नैन को, लगता ज्योँ…

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Added by Sushil Sarna on May 3, 2019 at 1:20pm — 6 Comments

ग़ज़ल

221 1222 22 221 1222 22

गुज़री है मेरे दिल पर क्या क्या अब हिज्र का आलम पूछ रहे ।।

मालूम तुम्हें जब गम है मेरा क्यूँ आंखों का पुरनम पूछ रहे ।।1

इक आग लगी है जब दिल में चहरे पे अजब सी बेचैनी ।

इकरारे मुहब्बत क्या होगी ये बात वो पैहम पूछ रहे ।।2

कुछ फ़र्ज़ अता कर दे जानां कुछ खास सवालातों पर अब ।

होठों पे तबस्सुम साथ लिए जो वस्ल का आगम पूछ रहे ।।3

हालात मुनासिब कौन कहे जलती है जमीं जलता भी है…

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Added by Naveen Mani Tripathi on May 3, 2019 at 12:30am — 3 Comments

कुण्डलिया छंद-

1-

राह  बताते  और  को, स्वयं  लाँघते  भीत।

जग का यही विधान है,यही आज की रीत।।

यही  आज की  रीत, सभी को प्रवचन देते।

लेकिन  वही  प्रसंग, अमल में कभी न लेते।।

खुद   करते   पाखंड,  दूसरों  को  भरमाते।…

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Added by Hariom Shrivastava on May 2, 2019 at 11:01pm — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
तीन मुक्तक // - सौरभ

सितारे-चाँद, अच्छे दिन, ऋणों की बात जपनी है

सजा कर बेचना है स्वप्न ये पहचान छपनी है

बनाते हम बड़ी बातें तथा जुमले खपाते हैं

सियासत तुम समझते हो मगर दूकान अपनी है 

 

जिन्हें तो चिलचिलाती धूप का अनुभव नहीं होना

कभी हाथों जिन्हें सामान कोई इक नहीं ढोना

जिन्हें ज़ेवर लदी उड़ती-मचलती औरतों का साथ

वही मज़दूर-मेहनत औ’ ग़मों का रो रहे रोना 

 

सियासत की, धमक से औ’ डराया ख़ूब अफ़सर भी

लिखा है पत्रिका में इंकिलाबी लेख जम कर भी

उठा कर…

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Added by Saurabh Pandey on May 2, 2019 at 7:30pm — 14 Comments

मृगतृष्णा-लघुकथा

"देखो आज का अखबार, एक लड़के ने जिसे कोई भी सहूलियत हासिल नहीं थी, राज्य सेवा परीक्षा उत्तीर्ण कर ली. जिसे करना होता है ना, वह लैंप पोस्ट की रौशनी में भी पढ़ लेता है", पिताजी आज फिर उबल रहे थे. इस बार भी राकेश असफल हो गया, वह खुद बहुत उदास था.

"लक्ष्य तो निर्धारित करते नहीं ठीक से, बस साधनों का रोना रोते रहोगे. मुझे लगता था कि मेरे रिटायर होने से पहले मैं भी सुनूंगा कि एक बाबू का लड़का बड़ा अधिकारी बन गया. लेकिन जनाब को तो कोई मतलब ही नहीं है इन सब से", अभी तक उनका बड़बड़ाना जारी था.

पहले…

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Added by विनय कुमार on May 2, 2019 at 5:45pm — 6 Comments

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