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November 2018 Blog Posts

ग़ज़ल (ख़त्म कर के ही मुहब्बत का सफ़र जाऊंगा)

(फाइ इलातु न _फ इ लातुन _फ इ लातुन _फ़े लुन)

ख़त्म कर के ही मुहब्बत  का सफ़र जाऊंगा l

तू ने ठुकराया तो कूचे में ही मर जाऊँगा l

जो भी कहना है वो कह दीजिए ख़ामोश हैं क्यूँ

आपका फ़ैसला सुनके ही मैं घर जाऊँगा l

वकते आख़िर है मेरा पर्दा हटा दे अब तो

छोड़ कर मैं तेरे चहरे पे नज़र जाऊँगा l

आ गए वक़ते सितम अश्क अगर आँखों में

मैं सितमगर की निगाहों से उतर जाऊँगा l

लौट कर आऊंगा मैं सिर्फ़ तू इतना कह दे …

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 6, 2018 at 10:30am — 20 Comments

'राहगुज़र : दिव्यालोक' [कुछ हाइकु: भाग-3]

1-
आलोक पर्व
सेतु ये जन-हेतु
प्रकाश-स्तंभ


2-
राहगुज़र
अंधेरे का निस्तार
प्रकाश-पर्व


3-
अपनापन
दीप से विस्तारित
आत्मकेंद्रित

4-
रूप चौदस
सौंदर्य प्रसाधन
आध्यात्मिकता

5-
दूज सुबोध
भ्रातृ-भगिनि योग
दिव्य-आलोक


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 6, 2018 at 10:09am — 8 Comments

'बिसात पर नूरा-कुश्ती' (लघुकथा)

"हमने कई थी न कि देर है अंधेर नईं! सबके साथ सबके दिन फिर रये! सो अपने भी दिन फिरहें!" नदी किनारे बैठे हुए एक बाबा ने दूसरे साथी बाबाओं से किया अपना दावा दोहराते-सिद्ध करते हुए कहा - "अपने कित्ते बाबा अंतर्राष्ट्रीय हो गये, ध्यान और योग से उद्योग जम गओ, ... एक और बाबा हाईटेक हो गओ!"

"हओ! मंत्री बनत-बनत रह गये; लेकिन अब रस्ता खुल गओ अपने लाने! धंधा-पानी भी संग-संग चलो करहे अब राम-नाम जपने के साथ! दुनिया खों आयुर्वेद को भेद बहुतई अच्छी तरा समझ में आ गओ!"

"लेकिन गुरु, धरम-करम और…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 6, 2018 at 12:11am — 2 Comments

हमेशा तो नहीं होती बुरी तकरार की बातें(ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222



हमेशा तो नहीं होती बुरी तकरार की बातें

इसी तकरार से अक्सर निकलतीं  प्यार की बातें।

नज़र मंजिल पे रक्खो तुम बढ़ाओ फिर कदम आगे

नहीं अच्छी लगा करतीं हमेेशा हार की बातें।

अँधेरे में चरागों-सा उजाला इनसे मिल जाता

गुनी जाएं तज्रिबे  के  सही गर सार की बातें।

अलग हैं रास्ते चाहे है मंजिल एक पर सबकी

जो ढूंढें खोट औरों में करे वो रार की…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 5, 2018 at 8:30pm — 17 Comments

'मर्म-सौगातें : सोने का देश' [कुछ हाइकु: भाग-2]

1-

मन-हर्षाता

धन्य धन-तेरस

मां लक्ष्मी दाता

2-

धन तेरस

दे अब के बरस

सोने का देश



3-

धन तेरस

सोने की ये चिड़िया

धन से धन्य

4-

धनोपार्जन

से धन-विसर्जन

चादर मैली



5-

धन की दास्तां

धनी-निर्धन व्यथा

कथा में कथा



6-

लड़ी में ज्वाला

प्रकाश, आग, भाग

आत्मायें लड़ीं



7-

पर्व ही गर्व

संदेश सम्प्रेषित

धन का दर्द



8-

दिल की…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 5, 2018 at 8:24pm — 8 Comments

मेरी धरोहर - लघुकथा -

मेरी धरोहर - लघुकथा -

"सुधा, मेरा सफेद कुर्ता पाजामा निकाल दो। शीघ्रता से।"

"अरे विनोद, यह क्या सुन रहा हूँ? यहाँ सब लोग दिवाली की पूजा की तैयारी में व्यस्त हैं और तुम ये क्या सफेद कपड़ों की फरमाइश कर रहे हो?"

"जी दादाजी, आपने सही सुना। मुझे मेरे दोस्त अकबर के घर जाना है। उसके अब्बू का इंतकाल हो गया है।"

"तुम्हें पता है आज इस दीपावली के शुभ अवसर पर मैं अपनी वसीयत भी बनाने वाला हूँ। अभी हमारे परिवार के वक़ील आने ही वाले हैं। हो सकता है जो उस वक्त मौजूद ना हों, उन्हें…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 5, 2018 at 4:58pm — 14 Comments

कुछ हाइकु

धनतेरस

धन धान्य हो भरा

शुभकामना

  

धन बरसे

लक्ष्मी रहें प्रसन्न

सब हरसें

  

झालर दीप

सुंदर उपहार

सजे बाजार

  

हल्की है ज़ेव

महंगाई की मार

सुस्त ग्राहक

  

प्रथा निभाएँ

धनतेरस पर

थोड़ा ही लाएँ

 

 धनतेरस

खुशियाँ दे अपार

प्यारा त्योहार

 

…. मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on November 5, 2018 at 3:30pm — 7 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६६

२१२२ २१२२ २१२२



है वो मेरा दोस्त, मेरा नुकताचीं भी

शर्म खाए उससे कोई ख़ुर्दबीं भी //१



काविशे सुहबत में आके मैंने जाना

हाँ में उसकी तो छुपा था इक नहीं भी //२



जब उफ़ुक़ पे सुब्ह लाली खिल रही थी

थी हया से सुर्ख थोड़ी ये ज़मीं भी //३



दूर क्यों जाना है ज़्यादा जुस्तजू में

पालती है जबकि दुश्मन आस्तीं भी //४…



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Added by राज़ नवादवी on November 4, 2018 at 7:30am — 10 Comments

'ईको-फ्रेंडली प्रकाश-मित्र' [कुछ हाइकु]

कुछ  'दीवाली-हाइकु' :

 

1-

दिल्ली-दीवाली

(दिली-दीवाली)

दीपक-दिलवाली

ईको-फ्रेंडली

2-

कुम्हार-कला

मिट्टी, भावों से खिला

ये दीपोत्सव

3-

प्रज्जवलित

दीप कुम्हार वाले

सीप के मोती

4-

सीप का मोती

दीवाली-महोत्सव

रिश्तों की खेती

5-

मानवीयता

दानवीयता परे

दीवाली भरे

6-

दिव्य-दीवाली

दशा-दिशा निमित्त…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 4, 2018 at 6:00am — 8 Comments

और इस तरह

मेरी आँखें बंद करो

और इस तरह से

दुनिया को बंद करना

मैं तुम्हें फिर मिलूंगा

तुम  शानदार हो 

जीवित और ज्वलंत

मेरे सीने  से गहरी सांस लेना

मैं तुम्हारी मुस्कान  की तस्वीर बना लूँगा 

तुम्हारी  आंखों के पीछे का नरम  प्रकाश

मेरे दिमाग में यादों का  मीलो  चलना

इच्छा है कि मैं एक चील  की तरह झपट के 

और तुम्हें उस जगह  ले जाऊ 

जिस  जगह जहां आँसू गिरते थे 

जबकि हम आमने-सामने बैठे थे

एक दूसरे के गाल पर हाथ

फुसफुसाते हुए "सब ठीक…

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Added by narendrasinh chauhan on November 3, 2018 at 2:30pm — 2 Comments

काल चक्र - लघुकथा -

काल चक्र - लघुकथा -

"राघव, तुम यहाँ रेलवे प्लेटफार्म पर, इस हालत में?"

मुझे एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ कि यह बेंच पर बैठा शख्स मेरा मित्र राघव ही है। दाढ़ी , बाल  बढ़े हुए। पैर में हवाई चप्पल। पाजामे के साथ ढीली सी टी शर्ट। मेरा हम उम्र था लेकिन अस्सी साल का बूढ़ा लग रहा था|

मैं जिस राघव का दोस्त था, वह तो सदैव आसमान में उड़ता था। शेर की तरह दहाड़ता था। कालेज के दिनों में वह अकेला बंदा था जो सूट बूट और टाई पहनकर कार में कॉलेज आता था। क्या शानदार  व्यक्तित्व था। हर कोई उसे…

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Added by TEJ VEER SINGH on November 3, 2018 at 12:04pm — 12 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ६५

२१२२ २१२२ २१२२

---------------------------

आ गया है जेठ, गर्मी का महीना

अब समंदर को भी आयेगा पसीना //१



उम्र भी अब तो सताने लग गई है

डूबता ही जा रहा है ये सफ़ीना //२



सोचता हूँ जिंदगी भी क्या करम है

उफ़ ! ये मरना और यूँ मर मर के जीना //३



ज़िंदगानी के तराने गा रहे सब

हैं दिवाने सैकड़ों और इक हसीना //४…

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Added by राज़ नवादवी on November 3, 2018 at 7:00am — 16 Comments

कहीं हद तोड़ कर तट भी अगर मझधार हो जाता - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२



किसी की बद्दुआ  से  गर  कोई  बीमार हो जाता

दुआ सा आखिरी वो भी बड़ा हथियार हो जाता।१।



ललक से धन की थोड़ा भी कहीं दो चार हो जाता

कसम से आईना भी तब महज अखबार हो जाता।२।



घड़ी भर को ही हमदम का अगर दीदार हो जाता

सुकूँ से मरने  का  यारो  तनिक  आधार हो जाता।३।



कहानी प्यार की  अपनी  किनारे  लग कहाँ पाती

कहीं हद तोड़ कर तट भी अगर मझधार हो जाता।४।…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 3, 2018 at 6:00am — 20 Comments

'तू मेरा क्या लागे?' (लघुकथा)

"देख, अब भी समय है! संभाल ले, अनुशासित कर ले अपने आप को!"

"अपनी थ्योरी अपने ही पास रख! ... देख, रुक जा! ठहर जा! रोक ले समय को भी! उसे और तुझे मेरे हिसाब से ही चलना होगा!"

"तो तू मुझे अपनी मनचाही दिशा में धकेलेगा! अपनी मनचाही दशा बनायेगा! 'देश' और 'काल' की गाड़ी की मनचाही 'स्टीअरिंग' करेगा!

"बिल्कुल! ड्राइवर, कंडक्टर, सब कुछ मैं ही हूं और हम में से ही हैं हमारे देश की गाड़ी चलाने वाले! तुम.. और समय .. तुम दोनों तो बस क़िताबी हो; बड़ी ज़िल्द वाली बड़ी-बड़ी क़िताबों में रहकर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on November 3, 2018 at 12:29am — 5 Comments

ग़ज़ल नूर की- सोचिये फिर डूबने में कितनी आसानी रहे

.

सोचिये फिर डूबने में कितनी आसानी रहे

उनकी आँखों में जो मेरे वास्ते पानी रहे.

.

मैं किसी को जोड़ने में घट भी जाऊँ ग़म न हो

ज़िन्दगानी के गणित में इतनी नादानी रहे.

.

क़त्ल होते वक़्त भी मैं मुस्कुराता ही रहूँ

ताकि क़ातिल को मेरे ता-उम्र हैरानी रहे.

.

क़ाफ़िला यादों का गुज़रे रेगज़ार-ए-दिल से जब

आँखों में लाज़िम है सारी रात तुग़्यानी रहे.

.

क्यूँ भला सोचूँ वो दुश्मन है मेरा या कोई दोस्त

मैं रहूँ…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on November 2, 2018 at 6:45pm — 29 Comments

काँच पत्थर से भले टकरा गया। (ग़ज़ल- बलराम धाकड़)

2122 2122 212

काँच पत्थर से भले टकरा गया।

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा समझा गया।

फ़िर सियासत में हुई हलचल कहीं,

मीडिया के हाथ मुद्दा आ गया।

सारी दुनिया एक कुनबा है अगर,

आयतन रिश्तों का क्यों घटता गया?

इक बतोलेबाज की डींगें सुनीं,

आदमी घुटनों के ऊपर आ गया।

फिर किसी औरत का दामन जल…

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Added by Balram Dhakar on November 2, 2018 at 3:30pm — 19 Comments

मंदिर की घंटी :हरि प्रकाश दुबे

सुदूर पहाड़ी पर एक प्रसिध्द ‘माँ दुर्गा’ का एक मन्दिर था, जिसका संचालन एक ट्रस्ट के हाथ में था। उसमे पुजारी, आरती करने वाला, प्रसाद वितरण करने वाला, मंदिर की सफाई करने वाला, मंदिर की आरती के समय घंटी बजाने वाला आदि सभी लोग ट्रस्ट द्वारा दी जाने वाली दक्षिणा एवम भोजन पर रखे गए थे।

आरती खत्म हो जाने के बाद जहाँ अन्य लोग चढ़ावे को इक्कठा कर कोष में जमा कराने में तत्पर रहते थे वही घंटी बजाने वाला ‘घनश्याम’ आरती के समय भाव के साथ इतना भावविभोर हो जाता था कि होश में ही नही…

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Added by Hari Prakash Dubey on November 1, 2018 at 10:09pm — 3 Comments

गजल- नहीं आती

मापनी - २१२२ 12 1222 

चाहते हैं मगर नहीं आती

हर ख़ुशी सबके’ घर नहीं आती  

 

दिल में’ थोड़ी सी’ गुदगुदी कर दे  

आजकल वो खबर नहीं आती  

 

मैं इधर जब उदास होता हूँ  

नींद उसको उधर नहीं…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on November 1, 2018 at 5:30pm — 30 Comments

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