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तिरी नज़रों में ....संतोष

तिरी नज़रों में ये  बात नज़र आती है
मिरी याद तो तुझे आज भी आती है

ये चाहत का मामला है जनाब,
दिल की कशिश है,लौट आती है

छुपा लो लाख इसे तुम दिल में मगर,
बात दुनियाँ को भी नज़र आती है

दिल गिरफ़्त में है और क़ैद भी'संतोष'
चाहत तिरी वो ज़ंजीर नज़र आती है
#संतोष
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by santosh khirwadkar on August 8, 2017 at 8:00pm — 9 Comments

लघुकथा---सोच

देर रात चार-पाँच लड़कियों का झुंड बदहवास , घबराया हुआ जब पुलिस स्टेशन में दाखिल हुआ तो पुलिस वालों के भी होश उड़ गए । पहले उन्हें बैठाया गया । ढाँढस बँधाया । फिर थानेदार साहब ने कहा-"हाँ , अब बताइए क्या हुआ ?"

" कुछ लड़कों ने हमारी कार का पीछा किया , हमें किडनैप करने की कोशिश की । बड़ी मुश्किल से जान बचाकर यहाँ तक आईं हैं ।" उनमें से एक लड़की ने आपबीती सुनाई ।

" देर रात आप घर से बाहर क्यों निकली ?" थानेदार साहब ने आखिर अपनी औकात बता ही दी ।

" यदि आप लड़कों को देर रात घर से बाहर न… Continue

Added by Mohammed Arif on August 8, 2017 at 6:43pm — 13 Comments

क्षणिक सुख ...

क्षणिक सुख ...

कितने

दुखों से

भर दिया

बज़ुर्गों का दामन

वर्तमान के

क्षणिक सुख की

सोच ने

सैंकड़ों झुर्रियों में

छुपा दिया

बज़ुर्गों के सुख को

वर्तमान के

क्षणिक सुख की

सोच ने

मानवीय संवेदनाओं के

हर बंध अनुबंध

बिसरा डाले

वर्तमान के

क्षणिक सुख की

सोच ने

ममता की अनुभूति

जो भूले न

आज तक

उन्हें

कन्धों तक का

मोहताज़ बना दिया

वर्तमान के…

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Added by Sushil Sarna on August 8, 2017 at 6:37pm — 6 Comments

कोमल स्पंदन मन चिर उन्मन, (गीत) :अलका ललित

16 मात्रा आधारित गीत (चोपाई छन्द आधारित )

*****

कोमल स्पंदन मन चिर उन्मन

रे स्याह भौंर गुंजन गुंजन

.

किसलय पुंजित ह्रदय हुलसित

उत्कंठा इंद्रजाल पुलकित

नित भोर भये चिर कोकिल-रव

मधु कुंज कुंज गुंजित कलरव

.

रे गंध युक्त मसिमय अंजन

रे स्याह भौंर गुंजन गुंजन

.

घनघोर घटा चितचोर विहग

नभ अंतःपुर द्युतिमान सुभग

अकलुष प्रदीप्त कोमल उज्ज्वल

तप नेह वेदना में प्रतिपल

.

रे स्वर्ण…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on August 8, 2017 at 4:30pm — 14 Comments

रुख से वो जब पर्दा हटा देगा

बहर - 1222 1222 1222 1222



वो ख़ुद अपनो का मारा हैं नहीं मुझको दग़ा देगा .....

मुहब्बत में यक़ीनन साथ वो मेरा निभा देगा ......





निगाहें देखकर उसकी , उसे कहते कयामत हो

कयामत होगी तब रुख से वो जब पर्दा हटा देगा ....



यहीं तो सोच के मंदिर में जाकर रोता है मुफ़लिस

कि मेरे अश्क़ को इक दिन ख़ुदा मोती बना देगा ......



वो ....बिस्तर मख़मली उसके लिए बेकार है यारों

उसे मेहनत का हासिल इक निवाला ही सुला देगा ....



मिरा घर है अँधेरे में… Continue

Added by पंकजोम " प्रेम " on August 8, 2017 at 4:30pm — 10 Comments

गहराई ...

गहराई में ही जीवित रहता शीतल जल

सश्रम ही पाता तृषित मनुज वह नीर विमल ... ||

गंभीर ज्ञान ज्ञानी का बसता अंतः तल

आता समक्ष जब स्वागत में हों ध्वनि करतल ... ||

ज्ञान अधूरा हो या छिछला - उथला जल

दिखता सुदूर पर प्राप्य सहज, करता मन चंचल ... ||

.

- करीब (मौलिक व अप्रकाशित)

Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 8, 2017 at 3:00pm — 4 Comments

राखी (भाग 1)

आज राखी बँध रहे थे, खूब राखी बँध रहे थे,

भाई भी सब सज रहे थे, पहन कुरते जँच रहे थे!

हीरे – मोती सोने – चाँदी, से सजे रेशम के धागे,…

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Added by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 7, 2017 at 10:00pm — 8 Comments

चाँद ढूँढ रहे हो ??......संतोष

क्यूँ आसमां में चाँद ढूँढ रहे हो,

वो मेरे पास उतर आया है



हाँथों की इन लकीरों में जैसे मेरे,

ज़िंदगी बन के चला आया है



आईना सा था वो बिल्कुल साफ़,

छूने से मेरे ,उस पर कुछ दाग़ उभर आया है



चमकता सितारा हूँ ज़मीं पर उसका,

वो आसमाँ सा ज़मीं को सजाने आया है



ये मेरी मुहब्बत ही तो है उससे,

वो मुझसे मिलने ज़मीं तक आया है



जलते हो तो जलो ए दुनियाँ वालों तुम,

वो मुझसे ईद मुबारक़ कहने आया… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 7, 2017 at 8:18pm — 10 Comments

राखी

"राखी" (चौपइया छंद)



पर्वों में न्यारी, राखी प्यारी,

सावन बीतत आई।

करके तैयारी, बहन दुलारी,

घर आँगन महकाई।

पकवान पकाए, फूल सजाए,

भेंट अनेकों लाई।

वीरा जब आया, वो बँधवाया,

राखी थाल सजाई।।



मन मोद मनाए, बलि बलि जाए,

नव उमंग है छाई।

भाई मन भाए, गीत सुनाए,

खुशियों में बौराई।

डाले गलबैयाँ, लेत बलैयाँ,

छोटी बहन लडाई।

भाल पे बिंदिया, ओढ़ चुनरिया,

जीजी मंगल गाई।।



जब जीवन चहका, बचपन महका,

तुम थी तब… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on August 7, 2017 at 6:21pm — 6 Comments

ग़ज़ल

122 122 122 122

ख़यानत की खातिर मुहब्बत नहीं है ।

मेरी आशिकी क्या अमानत नहीं है ।।



हुई दफ़अतन जो ख़ता थी नज़र से ।

हमें अब नज़र से शिकायत नहीं है ।।



मिटा कर चले जा रहे हैं उमीदें ।

बची आप में भी सराफ़त नहीं है ।।



चले आइये बज्म में रफ्ता रफ्ता ।

मेरी आप से अब अदावत नहीं है ।।



ठहर जाने वाले यकीं कर मेरा तू ।

मेरे दिल की अब तक इज़ाजत नहीं है ।।



तेरे दर पे आना मुनासिब कहाँ अब ।

वहां आशिकों की निज़ामत नहीं है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on August 7, 2017 at 5:25pm — 15 Comments

अधजले ठूँठ

प्रतीक्षातुर पलों में, नींदों में

आर-पार जाती पारदर्शी सोच में

परस्पर आत्मीय पहचान 

हम दोनों के ओंठ मुस्करा देते

हवा में आगामी प्रातों की ओस-सुगन्ध

हमारी बातों में कहीं  "न"  नहीं  थी

कभी कोई इनकार नहीं था, पुकार थी बस

धधकते हुए सूरज में प्रखर तेज था तब

उस प्रदीप्त धूप की छाती में

कुछ भसम करने की चाह नहीं थी

मैदानों को चीरती हवाओं में

थी रोम-रोम में उमंग 

सूरज की उजाड़ किरणों में अब

अपने…

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Added by vijay nikore on August 7, 2017 at 4:31pm — 4 Comments

कहने को शर्मीली आँखें

मापनी २२ २२ २२ २२

 

झील सी गहरी नीली आँखें

हैं कितनी सकुचीली आँखें

 

खो देता हूँ  सारी सुध बुध

उसकी देख नशीली आँखें

 

यादों  के सावन  में भीगीं

हो गईं कितनी गीली आँखें

 

मोम बना दें पत्थर को…

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Added by बसंत कुमार शर्मा on August 7, 2017 at 4:30pm — 32 Comments

भैया मेरे (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

पोस्टमेन भी उस समय मुस्कराकर एक अजीब सी ख़ुशी हासिल कर रहा था, जब चिट्ठी हाथ में थामते हुए सलीम मुस्कराया। उसे पता था कि इस दौर में भी इस घर में अगर चिट्ठी आती है तो बहिन की चिट्ठी हुआ करती है। सलीम को बहुत दिनों बाद बहिन का ख़त मिला था। बीवी से नज़रें बचाकर जब उसने ख़त पढ़ा, तो अपने आंसुओं को रोक नहीं सका। आंसू पोंछ कर फिर से उसने वह ख़त पढ़ा। दो भाइयों की इकलौती बहिन यास्मीन के ख़त की कुछ पंक्तियां उसे झकझोर रही थीं :



"हर बार की तरह इस बार भी रक्षा-बंधन का दिन मैंने तुम दोनों के… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on August 7, 2017 at 10:42am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - आदमी वो सरफिरा, लगता तो है ( गिरिराज भंडारी )

2122   2122  212  

दूध में खट्टा गिरा लगता तो है

काम साज़िश से हुआ,लगता तो है

 

था हमेशा दर्द जीवन में, मगर  

दे कोई अपना, बुरा, लगता तो है

 

बज़्म में सबको ही खुश करने की ज़िद

आदमी वो सरफिरा, लगता तो है

 

सच न हो, पर गुफ़्तगू हो बन्द जब,

बढ़ गया कुछ फासिला, लगता तो है 

 

गर मुख़ालिफ हो कोई जुम्ला, मेरे

दोस्त अब दुश्मन हुआ, लगता तो है

 

ज़िन्दगी की फ़िक्र जो करता न था

मौत से वह भी…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 7, 2017 at 8:30am — 23 Comments

राखी पर्व पर् कुण्डलिया

कच्चे धागे से जुड़ा, राखी का त्यौहार

मिले बहन जब भ्रात से, बरसे स्नेह अपार

बरसे स्नेह अपार, बहन जब बाँधे राखी

जगता सात्विक भाव, उड़े मन जैसे पाखी

रेशम की यह डोर, पहनते बूढ़े बच्चे

रिश्ते बने प्रगाढ़, भले हों धाँगे कच्चे



आये सावन मास में, रक्षाबंधन पर्व

बहना दे शुभकामना, भाई करता गर्व

भाई करता गर्व, बहन जो घर पर आती

हर बहना ऱक्षार्थ, वचन भाई से पाती

रहे बहन सुरक्षित, पर्व सबको बतलाये

बहे नेह की धार, यहाँ जब सावन आये



राखी के… Continue

Added by नाथ सोनांचली on August 7, 2017 at 7:30am — 6 Comments

स्नेहसिक्त भाव

तुमसे मिलने की उदात्त प्रत्याशा ...

प्रेरणा के प्रहर थे 

स्वत: मुस्कराने लगे

तुम्हारे आने का मौसम ही होगा

वरना वीरान हवाओं में

ध्वनित-प्रतिध्वनित न होते 

यूँ वह गीत-आलाप सुरीले पुराने 

उस अमुक अरुणोदय से पहले ही एक संग

हर फूल, कली, हर पत्ते का झूम-झूम गाना

हाथ-में-हाथ पकड़ खेलना, तुम्हें गुनगुनाना

और नवजात-सी उत्सुक पक्षिणियों का 

सांवले पंख फैला

चोंच-मार खेलना, चहचहाना…

Continue

Added by vijay nikore on August 6, 2017 at 7:57pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - क्यों भला दंड वत हुआ जाये ( गिरिराज भंडारी )

2122   1212   22/112

अब यहाँ पर विगत हुआ जाये

या, जहाँ से विरत हुआ जाये

 

खूब दीवार बन जिये यारो

चन्द लम्हे तो छत हुआ जाये

 

कोई खोले तो बस खला पाये

प्याज़ की सी परत हुआ जाये

 

ताब रख कर भी सर उठाने की

क्यों भला दंड वत हुआ जाये

 

आग, पानी , हवा की ले फित्रत 

हैं जहाँ, जाँ सिफत हुआ जाये

 

खूबी ए  आइना बचाने को 

क्यूँ न पत्थर फ़कत हुआ…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on August 6, 2017 at 6:00pm — 24 Comments

चलो फिर यादों के सफ़र पर......संतोष

चलो फिर यादों के सफ़र पर हो आते हैं ,

तन्हाई का ये दौर कुछ देर को भूल आते है



बिखरे हमारे ख़्वाबों को ग़र सवाँरना हो तो,

चलो आज फिर उनसे मुलाक़ात कर आते हैं



ख़्वाबों में ही सही मगर थे हमसफ़र कभी,

यही ऐहसास को फिर पैकर किये आते है



ये कैसा मरज है कि दिलों से जाता ही नहीं,

दिल अफ़्सुर्दा है क्यूँ तुम्हारा ये भी जान आते है



सोचा नहीं था कि फिर सामना होगा तुमसे,

बिखरे ख़्वाबों का एक नया आईना बना आते हैं



उम्मीद आज भी फ़क़त… Continue

Added by santosh khirwadkar on August 6, 2017 at 12:40pm — 9 Comments

लकीरों में तो कुछ रक्खा नहीं है(गजल) /सतविन्द्र कुमार राणा

गजल

बह्र 1222 1222 122



फरेबी तू जो बन पाया नहीं है

तभी सिक्का तेरा चलता नहीं है



नहीं नीयत में ही जब काम करना

कहे क्यों तू, मिला मौका नहीं है



ज़ुबाँ में सादगी उसकी झलकती

भले देहात में रहता नहीं है



जिया था तू वतन के वास्ते पर

शहादत का तेरी चर्चा नहीं है



सरे बाज़ार देखो झूठ बिकता

जो' बिक जाए वो' फिर सच्चा नहीं है



लिखी तकदीर हाथों से ही जाती

लकीरों में तो कुछ रक्खा नहीं है



मौलिक एवं… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2017 at 12:30pm — 6 Comments

एक ग़ज़ल/सतविन्द्र राणा

बह्र:1222 1222 122

नहीं पहले-सी चेहरे पे चमक है
हँसी में आपकी गम की झलक है

नहीँ आमाल में जिसकी है नीयत
उसी की क़ामयाबी पे भी शक है

कोई तो खेल में पानी बहाता
कहीं पर प्यासा मरने की धमक है

पहुँचना उसका ही होगा फलक तक
नज़र जिसकी बहुत आगे तलक है

रहेगी रात तन्हा, दिन अकेला
हमारा साथ कुछ ही देर तक है

उसे बंदिश भला क्या रोक पाए?
नजर में जिसकी ये सारा फलक है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on August 6, 2017 at 11:00am — 14 Comments

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