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मेरे भीतर की नदी ( कविता)

कल कल बहती है नदी

मेरे भीतर भी कहीं



सूर्य की तपिश में

गर्म होती है ऊपरी सतह



चाँदनी रातों में चमक जाती है

श्वेत तारों को आग़ोश में लिए हुए



सावन में हरित होती मिट्टी

सिमट जाती हैं मुझमें कभी



फिसलती रेत कभी जम जाती है

पर बहता है जल प्रवाह



निरंतर कभी ऊचें पर्वतों से

कभी निचली सतह पर अपनी गति से



ज़मीन पर से देखती है आसमां को

अपने में बहुत कुछ समेटे हुए



छोटे कंकड़ , बड़ी चट्टानें

छोटे… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on June 3, 2017 at 8:56am — 8 Comments

" यवनिका" -एक क्षणिका /अर्पणा शर्मा

खिंच जाएगी,
ड़ोरी सहसा,
थम जायेगी ,
ये कठपुतली,
भागते समय में निर्बाध,
यवनिका गिरेगी,
जीवन नाटक की,
और नैपथ्य में ,
गूँजेगी एक आवाज़,
कि अब तुम्हारा,
समय समाप्त ...!!"

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Arpana Sharma on June 2, 2017 at 11:23pm — 7 Comments

गजल(अक्ल के मारे हुए हैं..)

2122 2122

अक्ल के मारे हुए हैं

हम सभी हारे हुए हैं।1



आज मसले बेवजह के

देखिये नारे हुए हैं।2



जो नहीं थोड़ा सुहाये,

आँख के तारे हुए हैं।3



लूटते हैं जिस्म-ईमां

जान हम वारे हुए हैं।4



दान कर दीं कश्तियाँ भी

आज बेचारे हुए हैं।5



कान देते, बात बनती

वे उबल पारे हुए हैं।6



बाग भर मैं देख आया,

तिक्त फल सारे हुए हैं।7



सब लिये हैं गीत अपने

भाव को टारे हुए हैं।8



हंस ढूँढ़े, मिल… Continue

Added by Manan Kumar singh on June 2, 2017 at 8:24pm — 13 Comments

पैदा वो हालात न कर

इतनी ज्यादा बात न कर

वादों की बरसात न कर

 

ह्रदय बड़ा ही नाजुक है,

उस पर यूँ आघात न कर

 

ख्यात न हो कुछ बात नहीं,

पर खुद को कुख्यात न कर

 

मानव को मानव रहने दे,

ऊंची नीची जात न कर

 …

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on June 2, 2017 at 10:02am — 20 Comments

***दहलीज के उस पार***(लघुकथा)राहिला

शराबी पति से रुई की तरह धुनी जा रही कुसमा ,गाँव में आयी पुलिस की गाड़ी देख कर दौड़ पड़ी।

"बचा लो साहब !बहुत मारा ये जल्लाद हमको,इसकी ऐसन पूजा करो कि हाँथ उठाना भूल जाए ।"एक तो अचानक आई पुलिस और ऊपर से कुसमा की शिकायत ने गोविंद पर चढ़ी दारू के सुरूर को तनिक हल्का कर दिया। वह जुबान जो अभी तक तूफ़ान की गति से गालियां उगल रही थी,तालू से जा चिपकी।वह थोड़ा सहम सा गया।

"क्यों रे!ज्यादा चर्बी चढ़ गयी लगता?

एक बार की मेहमानी में सारी पिघला देंगे। सुन रहा है ना?और तू!,पुलिस वाला कुसमा की ओर देख… Continue

Added by Rahila on June 1, 2017 at 10:37pm — 14 Comments

बेटियाँ (मुक्तक)

(1)क़ुदरत की इनायत हैं बेटियाँ
माँ-बाप की चाहत हैं बेटियाँ
सदा सपनों को करती साकार
हर घर की ज़रूरत हैं बेटियाँ ।
(2)राहें नई बना रही हैं बेटियाँ
सपनें नये सजा रही हैं बेटियाँ
कीर्तिमानों के शिखरों को छू रही
विमानों को उड़ा रही हैं बेटियाँ ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on June 1, 2017 at 9:06pm — 11 Comments

'डोम' (एक लघु-कथा )

"जीवन के आखिरी समय में, सही गलत का तो हम नही जानते बेटा, लेकिन इस बात का दुःख हमें अवश्य है कि हमारे कर्मो की सजा तुम भोग रहे हो। हो सके तो हमे क्षमा......।" बाबा की अंतिम बातों को सोच छोटे ठाकुर की आँखें नम हो गयी।



लकड़ियाँ अब आग पकड़ चुकी थी और चिता से उठती लपटो में बड़े ठाकुर की देह विलीन होने लगी थी। पास खड़ा 'भैरू' साथ साथ लकडियां व्यवस्थित कर रहा था जबकि बढ़ती आंच से बचने के लिए बाकी सभी लोग थोडा पीछे हटने लगे थे। 'कुंवरजी' पहले ही दूर जा खड़े हुए थे। आजीवन कारावास की सजा के बीच… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on June 1, 2017 at 5:17pm — 8 Comments

तपस्या

क्या यह मुझे जानने में मदद करेगा
वहां उनकी हंसी है
रिक्त स्थान में भर
हवा में फसी

क्या यह मुझे सीखना शांत करेगा
हर जगह से आनंद के फैल  आँसू
दिल खुश से विस्फोट
जैसा कि यह केवल उचित है.

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by narendrasinh chauhan on June 1, 2017 at 4:08pm — 1 Comment

तृषित ज़िंदगी ...

तृषित ज़िंदगी ...

गाँव की
उदास और चुप शाम

टूटे छप्पर
हवाओं से
बिखरे तिनके
बयाँ कर रहे थे
ज़ुल्म आँधियों का

बिखरे 

रोटियों के टुकड़े
और
टूटे हुए मटके में
दो हाथों के इंतज़ार में
ठहरा
तृप्ति को तरसता
अतृप्त पानी
कह रहा था
चली गयी
शायद
कोई  ज़िंदगी

तृषित ही 

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on May 31, 2017 at 2:00pm — 8 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
अरी जिंदगी ! ले जाएगी मुझको बता किधर .....गीत/ डॉ० प्राची सिंह

नटी बनी थिरका करती है जब-तब डगर-मगर

अरी ज़िंदगी ले जाएगी मुझको बता किधर...



क्यों ओढ़ी तूने सतरंगी सपनों की चूनर

सपने पूरे करने की जब राहें हैं दुष्कर

माना मीठी मुस्कानें पलकों तक लाते हैं

पर कर्कश ही होते हैं बिखरे सपनों के स्वर



तिनका-तिनका ढह जाता है

नीड़ हमेशा, फिर

बुनती है क्यों वहीं घरौंदा, चंचल जिधर लहर

अरी ज़िंदगी...



छलकी आँखों को पलकों के बीच दबाती है

सिसकी के तन पर उत्सव का लेप चढ़ाती है

शब्द कहेंगे झूठ मगर… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on May 31, 2017 at 11:17am — 5 Comments

ग़ज़ल --कश्मीर हमारा है हमारा ही रहेगा

221 1221 1221 122

भारत की बुलन्दी का सितारा ही रहेगा ।

कश्मीर हमारा है हमारा ही रहेगा ।।



हालात बदलने में नहीं देर लगेगी ।

प्यारा है हमें मुल्क तो प्यारा ही रहेगा ।।



हम एक थे हम एक हैं हम एक रहेंगे ।

यह दर्द तुम्हारा है तुम्हारा ही रहेगा ।।



बरबाद नहीं होगी शहीदों की निशानी ।

इतिहास में हारा है तू हारा ही रहेगा ।।



ऐ पाक कहाँ साफ़ रहा है तेरा दामन ।

है तुझ से किनारा तो किनारा ही रहेगा ।।



यह ख्वाब न् पालो के कभी तोड़… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 31, 2017 at 8:30am — 10 Comments

बिन मौसम बरसात ( कविता)

बिन मौसम बरसात कहीं 

साथ  होती है यादें 

रिम झिम रिम झिम बरसे पानी 

साथ होती हैं बातें 

उस नदी की अल्हड लहरें 

साथ होती है रातें 

आसमान पर चाँद सितारे 

बादल गीत हैं गातें

कल कल करता बहता पानी 

कागज़ की नाव बहाते 

चल मुसाफिर चलता चल तू 

साथ नहीं कोई आते 

मौलिक एवं…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 30, 2017 at 10:34pm — 4 Comments

वो घर मेरा नहीं ...

वो घर मेरा नहीं ...



कितना कठिन है

अपने घर का पता जानना



लौट जाते हैं

हर बार

आकर भी

घर के पास से हम

किस से पूछें  पता 

सभी मुसाफिर लगते हैं

अपने घरों से

अंजाने लगते हैं

जानते हैं

ये घर

हमारा नहीं

फिर भी

उसको घर मानते हैं



टूट जाते हैं

जो पत्ते शज़र से

फिर वो शज़र

उनका घर नहीं रह जाता

हो जाते हैं

वो हवाओं के हवाले

घर के पास होते हुए भी…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 30, 2017 at 6:00pm — 9 Comments

खुला ह्रदय का द्वार नहीं है

मापनी २२ २२ २२ २२ 

यदि करना इनकार नहीं है,

क्यों करता इकरार नहीं है

 

सच से रहता उसका झगड़ा,

झूठ  मुझे स्वीकार नहीं  है

 

शूल नहीं है प्रेम अगर, तो,

फूलों का भी हार नहीं है

 

दिल से कभी न कह…

Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on May 30, 2017 at 9:30am — 11 Comments

डॉ रेखा ( (कहानी)

"ये कहाँ जा रही हो अम्मी ?" पड़ोस वाली महिला ने पूछा

"अरे वो अपनी मधु है न उसके घर से खबर आयी है , उसके पेट में दर्द हो रहा है , पेट से है न वो , पिछला जापा भी मैंने किया था , इस बार भी ......." बूढ़ी अम्मा ने हंस कर उत्तर दिया ।

" हे भगवान किस युग में जीते है ये इस मधु के घर वाले , दुनिया भर के अस्पताल है , पर देखो तो अब भी दायी से जापा करवाना चाहते है वो भी घर में । "



बूढ़ी अम्मा उन सबकी बातें सुन रही थी । लकड़ी की गाडी के सहारे से धीरे धीरे चलने वाली इस अम्मा का जीवन किसने… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 28, 2017 at 11:11pm — 3 Comments

गजल(झूठ बहुत ...)

22 22 22 22

झूठ बहुत तुमने बोले हैं

भाव सभीने ही तोले हैं।1



नासमझी का दामन पकड़े

छोड़े तुमने बस गोले हैं।2



कर्त्ता हो,बलिहारी समझो,

शब्दों के पीछे झोले हैं।3(झटके)



निज करनी मत पर्दा डालो,

राज कहाँ हमने खोले हैं?4



लिंग-वचन नियमित रहने दो,

कथ्य बहुत क्यों कर डोले हैं?5



चाहे कुछ भी कर लोगे क्या?

तथ्यों के अपने झोले हैं।6(झोलियाँ)



तुमने कुछ समझा है?,बोलो-

शेर बने क्या मुँहबोले हैं?7

@'मौलिक… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 28, 2017 at 10:30pm — 9 Comments

ग़ज़ल...क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है

मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन मुफाइलुन

1212 1212 1212 1212

सुदूर उस तरफ जहाँ झुका वो आसमान है

वहीँ उसी दयार में गरीब का मकान है



ये आजकल जो शोर है शहर शहर गली गली

क्या क्रांति की है दुन्दभि या सिर्फ ये उफान है



चढ़ाव ज़िन्दगी का ज्यूँ मचलती है कुई लहर

कदम जरा सँभल के रख बहुत खड़ी ढलान है



जड़ों से जो जुदा हुये जमीन भी न पा सके

​​बिखर गये वो टूटकर समय का ये बयान है



ये प्यार की छुअन हुई या कसमकस ए ज़िन्दगी

बृजेश के ललाट पे जो चोट… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 28, 2017 at 6:26pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सच का चोगा पहना दो - शिज्जु शकूर

सच का चोगा पहना दो
झूठ का परचम लहरा दो

इसमें है साख तुम्हारी
कि सियारों को रँगवा दो

सच न ज़मीं तक आ जाए
सबको बाहम उलझा दो

लिखा हुआ है काग़ज़ पर
सच में भी वो दिखला दो

पहले जैसा था मेरा
घर वैसा अब लौटा दो

सबकुछ अच्छा-अच्छा है
अख़बारों में छपवा दो

ये भी आज चलन में है
सारे अहसान भुला दो

-मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on May 28, 2017 at 4:46pm — 7 Comments

झूठ का साया(लघुकथा)

                       

महिंद्र की सेवानिवृत्ति पार्टी शुरू हो गई | विभाग के कर्मचारियों के साथ महिंद्र के करीब के रिश्तेदार भी आ कर हाल में  बैठ गए | थोड़ी देर बाद साहिब  भी आ गए | साहिब और कार्यालय के कर्मचारियों ने महिंद्र और उसकी पत्नी को आगे पड़ी कुर्सियों पे बिठाया और उनके गले में हार डाले और उनको गिफ्ट दिए |

इसी समय सब को भोजन परोसा गया और सभी ने खाना शुरू किया, समारोह के चलते, कुछ लोगों को महिंद्र के बारे में कुछ कहने के लिए क्रमवार बुलाया गया |

मगर सभी…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 28, 2017 at 6:02am — 4 Comments

(माँ रमा बाई

(माँ रमा बाई को यह कविता समर्पित )

माँ रमा बाई जी को कोटि कोटि वंदन

आओ हम सब करें फूलों से अभिनंदन

वक्त की पुकार समर्पित कर दो तन मन

ज्ञान की ज्योति से प्रकाशित करो वतन

अब समाज में समता लाकर रहेगें हम

नफरत सभी के दिलों से निकाल देगें हम

उनके अधूरे काम को अब पूरा करेगें हम

अज्ञान को संसार से मिटा कर रहेगें हम

जीवन के हर क्षण में याद रहे यह प्रण

टूटे दिलों को जोड़ एक माला बनाएँ हम

खुशियाँ सभी के राह में सदा बिछाएँ…

Continue

Added by Ram Ashery on May 27, 2017 at 3:00pm — 2 Comments

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