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झूठ का साया(लघुकथा)

                       

महिंद्र की सेवानिवृत्ति पार्टी शुरू हो गई | विभाग के कर्मचारियों के साथ महिंद्र के करीब के रिश्तेदार भी आ कर हाल में  बैठ गए | थोड़ी देर बाद साहिब  भी आ गए | साहिब और कार्यालय के कर्मचारियों ने महिंद्र और उसकी पत्नी को आगे पड़ी कुर्सियों पे बिठाया और उनके गले में हार डाले और उनको गिफ्ट दिए |

इसी समय सब को भोजन परोसा गया और सभी ने खाना शुरू किया, समारोह के चलते, कुछ लोगों को महिंद्र के बारे में कुछ कहने के लिए क्रमवार बुलाया गया |

मगर सभी…

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Added by मोहन बेगोवाल on May 28, 2017 at 6:02am — 4 Comments

(माँ रमा बाई

(माँ रमा बाई को यह कविता समर्पित )

माँ रमा बाई जी को कोटि कोटि वंदन

आओ हम सब करें फूलों से अभिनंदन

वक्त की पुकार समर्पित कर दो तन मन

ज्ञान की ज्योति से प्रकाशित करो वतन

अब समाज में समता लाकर रहेगें हम

नफरत सभी के दिलों से निकाल देगें हम

उनके अधूरे काम को अब पूरा करेगें हम

अज्ञान को संसार से मिटा कर रहेगें हम

जीवन के हर क्षण में याद रहे यह प्रण

टूटे दिलों को जोड़ एक माला बनाएँ हम

खुशियाँ सभी के राह में सदा बिछाएँ…

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Added by Ram Ashery on May 27, 2017 at 3:00pm — 2 Comments

बेबसी की किताब है यारोँ

2122 1212 22

वो दिखी बेनकाब है यारों।

सारा चेहरा गुलाब है यारोँ ।।



अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है ।

सबकी नीयत खराब है यारों ।।



है लबों पर अजीब सी जुम्बिश ।

कैसा छाया शबाब है यारों।।



होश खोया है देख कर उसको ।

वह पुरानी शराब है यारों ।।



एक मुद्दत के बाद देखा है ।

हुस्न का इंकलाब है यारों।।



पैरहन ख्वाब में वो आती है ।

कितनी आदत खराब है यारोँ ।।



मैं जिसे सुबहो शाम पढ़ता हूँ ।

वह ग़ज़ल लाजबाब है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 27, 2017 at 1:24pm — 8 Comments

***मेरा कसूर ***(कविता)राहिला

माँ! ये तुमने क्या किया?

एक तुम ही तो थीं अपनी

और तुमने ही मुँह मोड़ लिया।

मेरे आगमन की सूचना से,

माना तुम निराश थीं।

पर इतना क्रूर निर्णय लोगी,

इसकी मुझे ना आस थी।

जब ये भयानक विचार आया

तुम्हारे मन में।

बड़ा असुरक्षित महसूस किया

मैंने तेरे तन में।

जब अनजाने हत्यार ने ,

मुझपर प्रहार किया था।

माँ! ,भय से मैंने तेरी ,

कोख को थाम लिया था।

पर कब तक उस दानव से ,

मैं खुद को बचा सकती थी।

प्रयत्न किया उतना… Continue

Added by Rahila on May 27, 2017 at 12:18pm — 2 Comments

ग़ज़ल (बह्र--22/22/22/2)

सौदें होते हैं तन के
रिश्ते-नाते हैं धन के ।
याद बहुत आते हैं अब
मुझको दिन वो बचपन के ।
मीठी-मीठी यादें सब
ताने-बाने हैं मन के ।
कितने ही होते हैं दुख
माँ को लालन-पालन के ।
ग़ुर्बत के शिकवें हैं,ये
ख़ाली सारे बरतन के ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on May 27, 2017 at 10:40am — 7 Comments

मुझे

ईर्ष्या 

कृपया मुझे छोड़ दें

मुझे मुक्त चलने दें 

तेरी  समझ से

ईमानदारी

कृपया मुझे में भर

मेरे शब्दों को मुक्त कर 

उस विश्वास के साथ

मूर्खता

कृपया मुझे छोड़ दें

मुझे दो बार सुन लेकिन बोल

एक आवाज़ के साथ

अखंडता

कृपया मुझे सशक्त कर

मेरे दिमाग और शरीर को ऊपर ले

सही विकल्प बनाने के लिए

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by narendrasinh chauhan on May 27, 2017 at 10:30am — 1 Comment

गज़ल

221 1221 1221 122



अब हम भी ज़माने का सुख़न देख रहे हैं ।।

बिकता है सुखनवर ये पतन देख रहे हैं ।।



बदनाम न् हो जाये कहीं देश का प्रहरी ।

नफरत का सियासत में चलन देख रहे हैं ।।



वो मुल्क मिटाने की दुआ मांग रहा है ।

सीने में बहुत आग जलन देख रहे हैं।।



सब भूंख मिटाते हैं वहां ख्वाब दिखा कर ।

रोटी की तमन्ना का हवन देख रहे हैं ।।



वादों पे यकीं कर के गुजारे हैं कई साल ।

मुद्दत से गुनाहों का चमन देख रहे हैं ।।



लाशों में… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 27, 2017 at 8:30am — No Comments

प्रासंगिक अस्तित्व (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

वह एक गाड़ी में सवार थी, जो अब तेज़ गति पकड़ रही थी। गाड़ी किसी और दिशा में जा रही थी और खिड़की से वह विपरीत दिशा में देख रही थी, जहां से वह चली थी। खिड़की से नज़ारे देखते हुए अचानक लगने वाले ब्रेक के झटकों से वह कभी सहम जाती, तो कभी उसे संभलने का सुखद अहसास सा होता। लेकिन तेज़ हवाएं उसे कभी सुखद लग रहीं थीं, तो कभी उसे झकझोर कर परेशान कर रही थीं। तेज़ हवाएं उससे बातें कर रहीं थीं या वह ख़ुद उनसे मोहित होकर उनसे बातें करना चाह रही थी, किसी को भी समझ नहीं आ रहा था। वह खिड़की बंद नहीं कर पा रही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on May 27, 2017 at 2:00am — 4 Comments

***बदलते सुर***(लघुकथा)राहिला

"ये लो दो चेक ,बैंक में जमा कर देना"

दफ्तर के लिए निकल रहे अनुराग के हाथ में चेक थमाते हुए वह बोली।"कहाँ से आये?"

"भेजी दी दो रचनाएँ ,पुरुस्कृत हुयी तो मिले।"

"वाह ..,क्या बात है।,मुबारक हो भई!फिर तो पार्टी बनती है।घर बैठे कमाने लगीं तुम तो!"पति ने कुछ गर्वित होकर कहा, तो उसके होंठों पर फीकी सी मुस्कान तैर गयी।

आज उसने अपने शौक पर खर्च किये लम्हों की परिवार को पहली क़िस्त अदा की थी।

रात में जैसे ही कमरे में अनुराग आये उसने सकपका कर ,झगड़े की जड़ को किनारे रख… Continue

Added by Rahila on May 26, 2017 at 9:30pm — 5 Comments

तुम

यह तुम्हारी आंखें है

यह तुम्हारा मुंह है

यह तुम्हारी मुस्कुराहट है

तुम्हारा दिल

तुम्हारी  हंसी

लेकिन यह मेरा दिल है

मेरा डर

यह मेरा प्यार है

मेरी उम्मीद

मैं जिसके लिऐ  हूँ

Added by narendrasinh chauhan on May 26, 2017 at 9:57am — 2 Comments

कुण्डलिया

जग कर रमलू जी जपें,राम नाम के बोल

कुल्ला करने के लिए,नल देते हैं खोल

नल देते हैं खोल,भूल गए बन्द करना

जल बहता है व्यर्थ,उन्हें क्यों इससे डरना

सतविन्दर कविराय,टैंक ने लिया उन्हें ठग

साबुन चिपकी गात,हाथ में है खाली जग





बात पते की एक है,सुन लो! मेरे पास

कुछ भी तब भाता नहीं,दिल हो अगर उदास

दिल हो अगर उदास,जहाँ की खुशियाँ सारी

देती दुख ही हाय!, बनीं कंटक की डारी

सतविन्दर कविराय,उठाओ दुख का ढाबा

दिन जीवन के चार,ख़ुशी से काटो… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 25, 2017 at 11:30pm — No Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दो कुण्डलिया छंद

वो मेरा अस्तित्व थे, मैं उनकी प्रतिछाप

खोए जब पदचिह्न तो, गूँज उठी यह थाप

गूँज उठी यह थाप, रहा संकल्प अधूरा

आखिर कैसे कौन करेगा उसको पूरा

इतना विस्तृत गहन रहा भावों का घेरा

जो उनका संकल्प, बना है अब वो मेरा

हाय! अबोला सब रहा, कह पाती सब काश

अब कह दूँ कैसे अकथ, तोड़ समय का पाश

तोड़ समय का पाश, धार को कैसे…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on May 25, 2017 at 8:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल- खता होते होते

शाब्दिक कलन -१२२ १२२ १२२ १२२

*******************

मुहब्बत हुई जो खता होते होते।

सरे-राह गुजरी खफा होते होते। १

------

हसूं या रोऊँ जिंदगी पर खुदाया,

जहर हो गई है दवा होते होते। २

------

बची उम्र अब तो न जीने की कोई,

हँसी थी मुसीबत फना होते होते। ३

-------

शमां बुझ गई सो गई सारी महफ़िल,

विराना हुआ दिल वफ़ा होते होते। ४

--------

मिला तख़्त बैठें खजाना छुपाकर,

मुक़द्दस हुए अब सजा होते होते। ५

---------

रिवाजे बना… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on May 25, 2017 at 3:24pm — 11 Comments

घर में टूटी खाट

फटे हुए कपड़े हैं तन पर,
घर में टूटी खाट
बैठा उकड़ू बस बारिश की,
जोह रहा है बाट.
सूद समेत ले गए सब कुछ,
साहूकार हमारे,…
Continue

Added by बसंत कुमार शर्मा on May 25, 2017 at 10:00am — 2 Comments

मैं

जब यहां खड़े हो रहे हैं
तुम्हारे साथ
मुझे नहीं पता क्या करना है
या कौन हूँ 
खो गया और टूटा हुआ
आदमी
बाहर जोड़े अपने
हाथ
मुझे नहीं पता
कब बारी है
मुझे बहा दिया गया 
आपके द्वारा 
कुचला और टूटा भी
अब मुझे नहीं पता कि मैं कौन हूँ ...

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by narendrasinh chauhan on May 24, 2017 at 12:30pm — 3 Comments

बया का घोंसला- दोहे

तिनका लेकर चौंच में, मन में भर उल्लास
बया बनाती घोंसला, जग में सबसे ख़ास

इक बबूल के पेड़ पर, बसा बया का गाँव
भरी दोपहर में मिले, उसको ठंडी छाँव

छन छन कर आती हवा, नहीं धूप का काम
मई जून में कर रही, बया वहाँ आराम

गर्मी, सर्दी, बारिशें, हो आँधी तूफ़ान
सदा बया का घोंसला, रहता सीना तान
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by बसंत कुमार शर्मा on May 24, 2017 at 9:46am — 4 Comments

ग़ज़ल नूर की - तेरे सदमे से उबर जाऊँगा,

२१२२/११ २ २/२२ (११२)

.
तेरे सदमे से उबर जाऊँगा,
न उबर पाया तो मर जाऊँगा.
.
अपनी ही मौत का इल्ज़ाम हूँ मैं
क्यूँ किसी ग़ैर के सर जाऊँगा.
.
मेरी बेटी! तू मुझे “भौ” कर के  
जब डरायेगी तो डर जाऊँगा.
.
बूँद रहमत की, फ़क़त एक ही बूँद  
काश बरसे तो मैं तर जाऊँगा.
.
आती सदियों की तलब की ख़ातिर
जाम कुछ “नूर” से भर जाऊँगा.  
.
निलेश "नूर"
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 23, 2017 at 7:00pm — 13 Comments

ग़ज़ल --इस्लाह के लिए (गुरप्रीत सिंह )

(2122-2122-2122-212)

पहले सूरज सा तपें खुद को ज़रा रोशन करें

फिर थमें मत फिर किसी को चाँद सा रोशन करें।

ये नहीं, कोई दिया बस इक दफ़ा रोशन करें

गर करें, बुझने पे उसको बारहा रोशन करें।

मेरी भी वो ही तमन्ना है जो सारे शह्र की

आप मेरे घर में आएं घर मेरा रोशन करें।

सामने है इक चराग़ और आप के हाथों में शमअ

आप किस उलझन में हैं जी?क्या हुआ? रोशन करें!

तीरगी के हैं नुमाइंदे सभी इस शह्र में

कौन है…

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Added by Gurpreet Singh jammu on May 23, 2017 at 10:04am — 21 Comments

ग़ज़ल

वज़्न - 221 1222 221 1222

पिजरे से परिंदे को आज़ाद नहीं करते ।

कुछ लोग मुहब्बत को आबाद नहीं करते ।।



फ़ितरत है पतंगों की शम्मा पे मचलने की ।

ऐसे जुनूं पे आलिम इमदाद नहीं करते ।।



वह दर्द मिटाने का वादा किया था वरना ।

रह रह के मुकद्दर को हम याद नही करते ।।



ज़ालिम की अदालत में सच पर गिरी है बिजली।

मालूम अगर होता फरियाद नही करते ।।



वो साथ निभाएंगे कहना है बहुत मुश्किल ।

वो वक्त कभी हम पर बर्बाद नहीं करते ।।



हसरत ही… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 23, 2017 at 1:28am — 7 Comments

विश्वास ...

विश्वास ....

क्या है विश्वास

क्या वो आभास

जिसे हम

केवल महसूस कर सकते हैं

और गुजार देते हैं ज़िंदगी

सिर्फ़ इस यकीन पर कि

एक दिन तो

उसे हम स्पर्श कर लेंगे

छू लेंगे एक छलांग में

आसमान को

या

वो है विश्वास

जिसे हम जानते हुई भी

कि वो

चाहे कितना भी

हमारी साँसों के करीब क्यूँ न हो

छोड़ देगा

हमारा साथ

निकल जाएगा चुपके से

हमारे क़दमों के नीचे से

जैसे

ज़मीन होने का…

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Added by Sushil Sarna on May 22, 2017 at 8:30pm — 2 Comments

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