For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

अगर बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

1222 1222 1222 1222 तरही ग़ज़ल

अगर  बेटे की भाई से अदावत और हो जाती

मेरे अपने ही घर में इक बगावत और हो जाती

 

जहाँ खामोशी से मेरी जसामत और हो जाती

वहीं कुछ कहने से मेरे मुसाफत और हो जाती

  

हिमानी के शिखर पर डाल गलबहियाँ पलक मींचे

युगल प्रेमी यही सोचे क़यामत और हो जाती

 

सुलगती साँसे जलता तन पिला दो मय ये आँखों की

जहाँ सब कुछ हुआ इतनी इनायत और हो जाती

 

 इधर बेटा उधर भाई पिता करते तो क्या करते

अगर…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 28, 2016 at 5:07pm — 8 Comments

पुरानी किताबें ....

पुरानी किताबें ........

पुरानी किताबें

कुछ भी तो नहीं

सिवाय पुरानी कब्रों के

जिनमें दफ़्न हैं

चंद सूखे गुलाब

कुछ सिसकते हुए

मुहब्बत के ख़ुश्क से हर्फ़

कुछ पुराने पीले

टुकड़े टुकड़े से

अधूरे प्रेम के

प्रेम पत्र

पुरानी किताबें

जिनमें सो गयी

जीने की आस लिए

कई आकांक्षाएं

घुटी हुई सांसें

मोटी सी ज़िल्द की

अलमारी में

कैदियों से जीते

मौन कई अफ़साने

जंज़ीरों में…

Continue

Added by Sushil Sarna on September 28, 2016 at 3:00pm — 12 Comments

लघुकथा शीर्षक " श्राद्ध "/अर्पणा शर्मा

पितृपक्ष चल रहे थे और नगर के बड़े सेठजी ने अपने पिताजी के श्राद्ध पर एक भव्य आयोजन किया था। 11 पंड़ित मंत्रोच्चार कर सेठजी के पिताजी की तस्वीर को नाना प्रकार के व्यंजन समर्पित कर रहे थे। नाते- रिश्तेदारों के साथ ही बाहर माँगनेवालों और दरिद्रों की भीड़ प्रतीक्षारत थी कि कब भोजन शुरू हो और उनको भी मिले। दान की सामग्री पंड़ाल में एक मेज पर रखी थी जिसे सेठजी का ज्येष्ठ पुत्र संभाल रहा था। अंदर पंड़ित जी ने श्राद्ध की महिमा का बखान करते हुए कहा कि 84 लाख योनियों में जन्म से मुक्ति के लिये विधि… Continue

Added by Arpana Sharma on September 28, 2016 at 12:30pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४४

गैर ही तू सही तेरा असर तो बाक़ी है 

लज्ज़तेयाद का वीराना घर तो बाक़ी है

माना मंजिल नहीं इश्बाह की हासिल मुझको 

पैरों के वास्ते इक रहगुज़र तो बाक़ी है

तेरे सीने की आग बुझ गई तो क्या कीजे 

मेरे सीने में धड़कता जिगर तो बाक़ी है

सोज़िशें रोज़ की जीने नहीं देतीं मुझको 

क्या करें साँसों का लंबा सफ़र तो बाक़ी है

तेरी साँसें भी हैं मलबूस मेरी साँसों से 

मेरे भी सीने में तेरा ज़हर तो बाक़ी…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 28, 2016 at 12:26pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४3

रोज़मर्रा की ज़रुरत बद से बदतर हो गई 

दाल-रोटी ही हमारा अब मुक़द्दर हो गई

फ़िक्र में आलूदगी ही हर घड़ी का काम है 

रात को दो गज ज़मीं ही मेरा बिस्तर हो गई

सूखी कलियों की तरह हर ख़्वाब ही कुम्हला गया 

धूप यूँ हालातेनौ की नोकेनश्तर हो गई

जिस्म भी अब थक गया है सांस भी अब बोझ है 

मेरे कदमों की गराँबारी ही ठोकर हो गई

यास की तारीकियों से यूँ हुई रौशन हयात 

ज़ुल्मतेवीराँ से मेरी जाँ मुनव्वर हो…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 28, 2016 at 12:00pm — No Comments

मेरे हिस्से की हँसी

तुम चुरा

ना लो

मेरे हिस्से की

हँसी

इस कारण

मुस्कुराना छोड़

दिया है

दर्द ना आँखों से

छलक पाएँ

पालकों

से आँखों को

सिया है

मन्नतें माँगी

नही फिर भी

बिन माँगे झोली

भरी देखी

कसाई बना है

वक़्त सभी का

आज़ादी पर

रोक

लगी देखी

बेपरवाह सब

घूम रहे

लगता नहीं

ये घर लौटेंगे

शहर में

घूम रहे भेड़िए

सचाई पर

बेड़ियाँ

लगी देखी

अपनापन पनपता

बाँटे किससे… Continue

Added by S.S Dipu on September 28, 2016 at 10:05am — 5 Comments

गजल(कर गुजरते कुछ.......)

छद्मवेशी देशभक्त दोस्तों को समर्पित)

2122 2122 2122 2

***

कर गुजरते कुछ अभी तैयार बैठे हैं

देख अपनों की दशा लाचार बैठे हैं।1



दुश्मनों की नस दबाते, शोर मच जाता,

इश्क के तो ढ़ेर सब बीमार बैठे है।2



दोस्त वह खंजर चलाता आँख बेपानी,

भर रहे हामी मुए इस पार बैठे हैं।3



जीतते आये दिलों पे राज भी करते

भेदियों की भीड़ है मन मार बैठे हैं।4



फूल कितने भी खिलाये चुभ रहे काँटे

बागवाँ पहले यहाँ सब हार बैठे हैं।5



रोशनी… Continue

Added by Manan Kumar singh on September 28, 2016 at 8:34am — 13 Comments

ग़ज़ल -- मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना ( दिनेश कुमार दानिश )

221--2122--221--2122



मेयार शायरी का क़ायम जनाब रखना

ता-उम्र फ़िक्रो-फ़न के ताज़ा गुलाब रखना



जाती है जान जाए लेकिन न कम हो इज़्ज़त

सहराओं के मुक़ाबिल क्या चश्मे आब रखना



देना हिसाब होगा हम सबको रोज़-ए-महशर

गठरी में तुम भी अपनी कुछ तो सवाब रखना



तहज़ीब का तक़ाज़ा कहता है औरतों को

शर्मो हया का हर पल रुख़ पर नक़ाब रखना



हर वक़्त भागना ही जीवन नहीं है प्यारे

साँसों के इस सफ़र में कुछ सब्रो-ताब रखना



उम्मीद पर टिकी… Continue

Added by दिनेश कुमार on September 28, 2016 at 7:17am — 2 Comments

माँ !तो आज तुम्हारा पहला श्राद्ध भी हो गया !

तुम्हारी तरह

आज तुम्हारी बहू भी सुबह अँधेरे उठ जायेगी



ठीक तुम्हारी तरह

साफ़ सुथरे चौके को फिर से बुहारेगी 

नहा धो कर साफ़ अनछूई एक्वस्त्रा हो

तुलसी को अनछेड़ जल चढ़ायेगी

ठीक तुम्हारी तरह 

आज फूल द्रूब लाने को भी बेटी को नहीं कहेगी

ठाकुर जी के बर्तन भी स्वय मलेगी

ज्योती को रगड़ -रगड़ जोत सा चमकायेगी

महकते घी से लबलाबायेगी

घर के बने शुद्ध घी शक्कर में लिपटा

चिड़िया चींटी गैया को हाथ से…

Continue

Added by amita tiwari on September 27, 2016 at 9:00pm — 1 Comment

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ४२

रुख्सत/विदाई/ Departure

----------------------------------

 

साथ रहते हैं मेरे गम मैं जहां जाता हूँ

अब दरीचे पे ही रहता हूँ कहाँ जाता हूँ

 

हाय रे ये ज़िल्लतें जीने नहीं देतीं मुझे

मैं ज़मीं को छोड़कर अब आसमाँ जाता हूँ

 

अलविदा ऐ दोस्तोअहबाब हैं जिनके करम

ऐ मेरे प्यारे वतन हिन्दोस्ताँ जाता हूँ

 

दुःख न करना मेरा कोई पैकरेअल्ताफ़ में

मैं फ़लक के पार सू-ए-गुलसिताँ जाता हूँ

 

कुछ अधूरे ख़्वाब हैं…

Continue

Added by राज़ नवादवी on September 27, 2016 at 5:30pm — No Comments

जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

किस ज़माने की बात करते हो
रिश्तें निभाने की बात करते हो

अहसान ज़माने का है यार मुझ पर
क्यों राय भुलाने की बात करते हो

जिसे देखे हुए हो गया अर्सा मुझे
दिल में समाने की बात करते हो

तन्हा गुजरी है उम्र क्या कहिये
जज़्बात दबाने की बात करते हो

गर तेरा संग हो गया होता "मदन "
जिंदगानी लुटाने की बात करते हो

मौलिक और अप्रकाशित

मदन मोहन सक्सेना

Added by Madan Mohan saxena on September 27, 2016 at 12:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल - जिंदगी है ढ़लान पर भाई

2122 1212 22

आज मुद्दा ज़ुबान पर भाई ।

गोलियां क्यूँ जवान पर भाई ।।



उठ रहीं बेहिसाब उँगली क्यूँ ।

इस लचीली कमान पर भाई ।।



कुछ वफादार हैं अदावत के।

तेरे अपने मकान पर भाई।।



बाल बाका न हो सका उनका।

खूब चर्चा उफान पर भाई ।।



मरमिटे हम भी तेरी छाती पर।

चोट खाया गुमान पर भाई ।।



बिक रही दहशतें हिमाक़त में ।

उस की छोटी दुकान पर भाई ।।



गीदड़ो का फसल पे हमला है ।

बैठ ऊँचे मचान पर भाई ।।



यार… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on September 27, 2016 at 12:34am — 4 Comments

मंज़र बदल जाएगा

जॉन एफ केनेडी

ने कहा

कि यह मत पूछो

कि देश ने तुम्हारे

लिए क्या किया,

यह पूछो कि

तुमने देश के

लिए क्या किया?

इन शब्दों ने मेरे

जीने का अन्दाज़

ही बदल दिया है



मैं शिक्षक हूँ

क्या मैंने छात्रों

का मनोबल

बढ़ा लिया है

पूछूँ मैं

ख़ुद से अब

क्या

तनख़्वाह लेके

सही किया है ?

मैं बेचता हूँ

दूध पानी मिला

मिला के क्या

गाय का नाम

मैंने ही

मिटा रखा है ?

मैने बनके… Continue

Added by S.S Dipu on September 26, 2016 at 11:46pm — 1 Comment

ग़ज़ल

काफिया : कर चल दिए  रदीफ़: आ

बहर : २२१२ २२१२ २२१२ २२१२

थी जान जब तक वो लडे  फिर जाँ लुटा कर चल दिये

इस देश की खातिर वे खुद को भी मिटा  कर चल दिये|

लड़ते गए सब वीरता से टैंकरों  के सामने

झुकने दिया  ना देश को खुद शिर कटा कर चले दिए |

परिवार को कर देश पर  कुर्बान खुद लड़ने गए

वो वीर थे  जो देश की इज्जत बचा कर चल दिये |

एकेक ने मारा कई को फिर शहीदों से मिले

अंतिम घडी  तक फर्ज अपना सब निभा कर चल दिए…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on September 26, 2016 at 10:34pm — No Comments

ग़ज़ल को ढूँढने, चलिए चलें खेतों में गाँवों में (ग़ज़ल)

1222   1222   1222   1222

न जाने धूल कब से झोंकता था मेरी आँखों में!

जो इक दुश्मन छुपा बैठा था मेरे ख़ैरख़्वाहों में!

भटकते फिरते थे गुमनाम होकर जो उजालों में!

हुनर उन जुगनुओं का काम आया है अंधेरों में!

फ़क़त इक वह्म था,धोखा था बस मेरी निगाहों का,

अलग जो दिख रहा था एक चेहरा सारे चेहरों में!

हक़ीक़त के बगूलों से हुए हैं ग़मज़दा सारे,

हुआ माहौल दहशत का,तसव्वुर के घरौंदों में!

ख़ता इतनी सी थी हमने गुनाह-ए-इश्क़…

Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 26, 2016 at 5:19pm — 9 Comments

बिगडती बात ( गजल )

१२२२    /    १२२२   /  १२२२   /   १२२२ 

.

जमी जो बर्फ रिश्तों पे  पिघल जाये तो अच्छा है 

बिगड़ती बात बातों से सँभल जाये तो अच्छा है 

 

हमारी याद जब आये शहद यादों में घुल जाये

छिपी जो दिल में कडवाहट निकल जाये तो अच्छा है  

 

तमन्ना  चाँद पाने की बुरी होती नही लेकिन

जमीं से देखकर ही दिल बहल जाये तो अच्छा है

 

मुकद्दर में मुहब्बत के लिखी हैं ठोकरें ही जब 

गमों से पेशतर ये दिल सँभल जाये तो अच्छा…

Continue

Added by Sachin Dev on September 26, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

एक ग़ज़ल

बह्र 1222 1222 1222 1222





तेरी बस याद आने से सभी दुःख-दर्द टलतेे हैं।

तेरे ही नाम पे जीवन युँही हम काट चलते हैं।



गमों का दौर है आया नहीं सुख अब दिखाई दे

इसी में डूब कर अबतो सभी दिन-रात ढलते हैं।



यहाँ जो भी मुकम्मल है हिफाज़त को जमाने की

उसी के जह्न में देखो गलत अरमान पलते हैं।



कभी सोचा नहीं जिसने हो जाए अम्न ही कायम

लिए उम्मीद फिर ऐसी उसी के पास चलते हैं।



अदाकारी में जो माहिर समझ में वे नहीं आते

कभी तोला कभी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 26, 2016 at 1:00pm — 19 Comments

करबटें बदलता हूँ

करबटें बदलता हूँ रात भर मैं गलता हूँ

जख्म दिए औरों ने पर मैं खुद ही सिलता हूँ

 

मुँह मोड़ लिया हो अपनों ने तोड़ दिया हो सपनों ने

हर बार मगर हँसकर सबसे अक्सर मैं मिलता हूँ

 

जिन गलियों में बस शूल मिले यादों की बस कुछ धूल मिले

कभी रहे काशी काबा में हर रोज मैं पैदल चलता हूँ

 

वक्त के इस दौर में निकला मैं जिस भी ओर में

सदा बचा मैं शोलों से पर पानी से मैं जलता हूँ

 

सुबह भी देखी थी निराली पल भर में जो हुई थी…

Continue

Added by anupam choubey on September 26, 2016 at 1:00pm — 5 Comments

अब नहीं मेरे गांव में(छंदमुक्त चतुष्पदी कविता)

वो बगिया पनघट शीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

बुढ़ा बरगद झूमता पीपल-अब नहीं मेरे गाँव में।

परोसा करते थें तृप्त भोजन पानी जो आतिथ्य में,

वो बर्तन कांसे और पीतल-अब नहीं मेरे गाँव में।

-----

भाभी पानी छिट जगाती-अब नहीं मेरे गाँव में

लचका लोरी सोहर गाती-अब नहीं मेरे गाँव में

चाची भाभी बहना को पिछड़ा ये सब लगता है

हँसुली विछुआ झांझ भाती-अब नहीं मेरे गाँव में

-------

फाग चैत की राग गूंजता-अब नहीं मेरे गाँव में

बैल अकड़ ट्रैक्टर से जूझता-अब नहीं मेरे… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on September 26, 2016 at 9:21am — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है ( गिरिराज भंडारी )



1222    1222    1222    1222 

मुख़ालिफ इन हवाओं में ठहरना जब ज़रूरी है

चरागों को जलाने का कोई तो ढब ज़रूरी है

 

रुला देना, रुलाकर फिर हँसाने की जुगत करना

सियासत है , सियासत में यही करतब ज़रूरी है

 

उन्हें चाकू, छुरी, बारूद, बम, पत्थर ही दें यारो  

तुम्हें किसने कहा बे इल्म को मक़तब ज़रूरी है

 

तगाफुल भी ,वफा भी और थोड़ी बेवफाई भी

फसाना है मुहब्बत का, तो इसमें सब ज़रूरी है

 

पतंगे आसमाँनी हों या रिश्ते…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on September 26, 2016 at 8:30am — 24 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on vijay nikore's blog post अनसुने अनकहे के बीच
"आ. भाई विजय जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post कुंडलिया. . . . झोला
"आ. भाई सुनील जी सुंदर कुंडलियां हुई हैं हार्दिक बधाई।"
Wednesday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted blog posts
Wednesday
sushil yadav posted blog posts
Oct 26
Sushil posted blog posts
Oct 26
vijay nikore posted a blog post

अनसुने अनकहे के बीच

                        अनसुने अनकहे के बीच.कहे अनसुने-से रहे कुछ जज़्बातउसपर अनकहे एहसासों का…See More
Oct 26
रोहित डोबरियाल "मल्हार" replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"1 लाख मासिक चाहिए ही क्यों भाई, वर्डप्रेस CRM में वेबसाइट को ट्रांसफर कर दिया जाए, तो सालाना खर्च…"
Oct 15
KALPANA BHATT ('रौनक़') replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"दुःखद"
Sep 29
Profile IconKamran Akmal and sushil yadav joined Open Books Online
Sep 24
राज़ नवादवी replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"🌹 OBO के पुनर्गठन एवं पुनर्जीवन के लिए एक सशक्त अपील और कुछ रचनात्मक…"
Sep 22
Dharmendra Kumar Yadav posted blog posts
Sep 19
Sushil Sarna posted a blog post

कुंडलिया. . . . झोला

कुंडलिया. . . . झोलाझोला   लेकर  हाथ  में, चले   मुरारी   लाल । भाव देख कर थम गई,  उनकी बढ़ती चाल…See More
Sep 19

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service