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मृत्यु फिर जीत गयी .....

मृत्यु फिर जीत गयी .......

लम्हे यादों के 

बढ़ती शब् के साथ

पिघलते रहे

मेरे अहसास

लफ़्ज़ों के पैरहन में

गूंगे बन

सिरहाने रखीं किताब में

पिघलते रहे

दीवारों पर

छाई शून्यता की काई में

ये नज़रें

किसी के बहते लावे के साथ

पिघलती रही

मैं और तुम

का अस्तित्व

पिघलकर

एक हुआ

ज़िस्म केज़िंदाँ में

अनबोले लम्स

पिघलते रहे

ज़िस्म मिटे

साये…

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Added by Sushil Sarna on September 3, 2016 at 4:00pm — 12 Comments

चुप्पी /कान्ता रॉय

एक चुप्पी इधर,एक चुप्पी उधर भी

चुप रहने का यह क्षण,दरअसल शोर था

झंझावात था



आमादा था निगलने पर

रिश्ते को रिश्ते के साथ ,जो आस्तित्वहीन था

उस आस्तित्वहीन की गर्माहट…

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Added by kanta roy on September 3, 2016 at 10:30am — 17 Comments

मोह(लघुकथा)राहिला

वह सात दिन लगातार चलते हुए आखिर अपने घर तक पहुँच ही गयी।लेकिन अपने घास पूस के टपरे में कदम रखने से पहले ही उसकी हिम्मत जबाब दे गयी और वह धम्म में जमीन पर ऐसी गिरी की लाख कोशिशों के बाद भी उठ ना सकी।आज ही के दिन उसके घर वालो ने उसे गैरों के हवाले किया था।पूरे रस्ते वह कितना रोई ।उस जैसी कई थी उस गाड़ी में ,श्यामा भी।

"बस कर गौरा!मत रो.., जब अपनों ने ही अपना नहीं समझा तो किस की जान को रो रही हो।"

"तू बता श्यामा!क्या ये अन्याय नहीं है?जिस उम्र में हमें उन की,अपने घर की, सबसे ज्यादा…

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Added by Rahila on September 3, 2016 at 9:35am — 21 Comments

ग़ज़ल : टूटती सारी हदें सड़कों पे अब

212 22 12 22 12

टूटती सारी हदें सड़कों पे अब ।

लुट रहीं हैं इज्जतें सड़को पे अब ।।



ऐ मुसाफिर देख जंगल राज ये ।

फिर खड़ी है जहमतें सड़कों पे अब ।।



हैं बहुत दागी यहां की खाकियां ।

बिक रही है हरकतें सड़को पे अब ।।



हो चुके हैं राज में गुंडे बहुत ।

लग रहीं हैं महफ़िलें सड़कों पे अब ।।



दिख रही इंसानियत की बेबसी ।

हर तरह की सोहबतें सड़कों पे अब ।।



बाप जिन्दा लाश बनकर रह गया ।

मिट गयीं सब अस्मतें सड़को पे अब ।।…

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Added by Naveen Mani Tripathi on September 3, 2016 at 5:30am — 4 Comments

अक्षम दाता (लघुकथा)

"आप लोगों को आने में थोड़ी देर हो गयी, इनका ब्लड प्रेशर इतना कम हो चुका है कि आप लोग... किसी भी तरह की घटना के लिये तैयार रहें|" डॉक्टर के शब्द हल्के से उसके कान में पड़े, लेकिन वह तो इससे पहले ही समझ चुका था, कि मृत्यु उसके बहुत निकट है|

 

हस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उसने इशारे से अपनी पत्नी और दोनों बेटों को बुलाया| उन तीनों का हृदय आने वाले समय की आशंका से बहुत तेज़ी से धड़क रहा था| वह उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया| बड़े बेटे ने कहा, "पिताजी, आपको कुछ नहीं होगा, आप ठीक हो…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on September 2, 2016 at 11:30pm — 9 Comments

तन्हा रह जाता है ....

तन्हा रह जाता है ....

कल की तरह

ये आज भी गुजर जाएगा

स्मृतियों की कोठरी में

फिर कुछ और पल समेट जाएगा

हर कल के साथ

अपने अस्तित्व की शिला से

अपने अमिट होने का

दम्भ को पुष्ट करता रहेगा

हर कल का सूरज

अस्त्तित्वहीन होकर

किसी कल के गर्भ में

लुप्त हो जाएगा

क्या है जीवन

वो

जो गुजर गया

या वो

जो आज है

या फिर वो

जो आने वाले

काल के गर्भ में

सांसें ले रहा है

हर रोज़

इक मैं जन्म लेता…

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Added by Sushil Sarna on September 2, 2016 at 9:05pm — 6 Comments

गजल: दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया..

दिल में ठहरा कोई ख्वाब सा रह गया

मैं उसे उम्रभर चाहता रह गया,

उसके जैसा कोई भी दिखा ही नहीं

जिसकी तसवीर मैं देखता रह गया,

शाम होते ही वो याद आने लगा

फिर उसे रातभर सोचता रह गया,

मुझसे मिलने वो आया बहुत दूर से

मैं शहर में उसे ढूंढता रह गया,

उसके बारे में अब याद कुछ भी नहीं

हां मगर याद उसका पता रह गया,

थी वो तकदीर शायद किसी और की

मैं दुआ में जिसे मांगता रह गया।।

.

# अतुल…

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Added by atul kushwah on September 2, 2016 at 6:00pm — 3 Comments

प्रार्थना,दिग्पाल छ्न्द

आ बैठ कंठ शारद,हम ध्यान हैं लगाते
वाणी बने सही यह,कर जोरि कर मनाते
सुर साधना करें माँ,नत हो तुझे बुलाएँ
हों शब्द भाव ऐसे,सबको सदा सुहाएँ।

बोलें सदा सही हम,हर झूठ से बचाओ
हो पुण्य कर्म सारे,हर पाप से बचाओ
हैं मंद बुद्धि प्राणी,अब आप ही सँभालो
वाणी हमें गले से,हँसके जरा लगालो।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 2, 2016 at 4:29pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पत्थरों की नोक से घायल करें उगता सवेरा ( नव गीत 'राज ')

किश्तियों का छोड़ चप्पू

रौंदते पगडंडियों को

पत्थरों की नोक से

 घायल करें उगता सवेरा

 

आग में लिपटे हुए हैं

पाखियों के आज डैने

करगसों  के हाथ में हैं

लपलपाती  लालटेनें

कोठरी में बंद बैठी

ख्वाहिशों की आज मन्नत

फाड़ कर बुक्का कहीं पे

रो रही है देख जन्नत

जुगनुओं की अस्थियों को

ढो रहा काला अँधेरा

 

घाटियों की धमनियों से

रिस रहा है लाल पानी

जिस्म में छाले पड़े हैं

कोढ़…

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Added by rajesh kumari on September 2, 2016 at 10:30am — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अगर विरोधों मे फँस जायें तो दंगा तो है ही ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22  22 ( बहरे मीर )

ज्यूँ तालों में रुका हुआ पानी, गंदा तो है ही 

राजनीति में नीति नहीं तब वो धंधा तो है ही

 

अब भाषा की मर्यादा छोड़ें, गाली भी दे लें

अगर विरोधों मे फँस जायें तो दंगा तो है ही

 

दिखे केसरी, हरा न दीखे. तो फिर कानूनों में

घुसा हुआ कोई बन्दा निश्चित अंधा तो है ही

 

डरो नहीं ऐ भारतवासी पाप करम करने में

मैल तुम्हारे धोने को अब माँ गंगा तो है ही

 

सारे झूठे , हाथों में…

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Added by गिरिराज भंडारी on September 2, 2016 at 9:30am — 18 Comments

पागल या बदनसीब (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

व्यस्त मुख्य सड़क पर भारी वाहनों की आवा-जाही के बीच साइकिलों पर सवार विद्यालयीन छात्रायें बातचीत करती हुईं अपने विद्यालय की ओर जा रही थीं। उसी दिशा में जा रहे स्कूटर पर सवार एक शिक्षक ने अपने वाहन की गति धीमी करके दो छात्राओं को समझाने की कोशिश करते हुए कहा-"भारी ट्रक आ-जा रहे हैं, बातें करते हुए साइकल मत चलाईये!" - इतना कहा ही था कि पीछे से एक कार ने शिक्षक के स्कूटर को यूं टक्कर मारी कि वह उछलकर गिर पड़ा और वाहन दूसरी ओर बहक गया।



दोनों छात्राओं में से एक ने पीछे मुड़ कर देखा और… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on September 2, 2016 at 1:45am — 7 Comments

ग़ज़ल ( अंजाम तक न पहुंचे )

ग़ज़ल ( अंजाम तक न पहुंचे )

------------------------------------

मफऊल-फ़ाइलातुन -मफऊल-फ़ाइलातुन

आग़ाज़े इश्क़ कर के अंजाम तक न पहुंचे ।

कूचे में सिर्फ पहुंचे हम बाम तक न पहुंचे ।

फ़ेहरिस्त आशिक़ों की देखी उन्होंने लेकिन

हैरत है वह हमारे ही नाम तक न पहुंचे ।

उसको ही यह ज़माना भूला हुआ कहेगा

जो सुब्ह निकले लेकिन घर शाम तक न पहुंचे ।

बद किस्मती हमारी देखो ज़माने वालो

बाज़ी भी जीत कर हम इनआम तक न…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on September 1, 2016 at 10:17pm — 12 Comments

गैर मुरद्दफ़ ग़ज़ल- इश्क़ की राहों में

2122 2122 212



इश्क़ की राहों में हैं रुसवाईयाँ।

हैं खड़ी हर मोड़ पर तन्हाईयाँ।।

क्या करे तन्हा बशर फिर धूप में।

साथ उसके गर न हो परछाइयाँ।।

ऐ खवातीनों सुनों मेरा कहा।

क्यूँ जलाती हो दिखा अँगड़ाइयाँ।।

चाहता हूं डूबना आगोश में।

ऐ समंदर तू दिखा गहराइयाँ।।

दिल दिवाने का दुखा, किसको ख़बर ?

रात भर बजती रही शहनाइयाँ।।

तुम गये तो जिंदगी तारीक है।

हो गयी दुश्मन सी अब रानाइयाँ।।

दूर…

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Added by डॉ पवन मिश्र on September 1, 2016 at 9:54pm — 6 Comments

रिश्तों के सीनों में ......

रिश्तों के सीनों में ......

कितनी सीलन है

रिश्तों की इन क़बाओं में

सिसकियाँ

अपने दर्द के साथ

बेनूर बियाबाँ में

कहकहों के लिबासों में

रक़्स करती हैं

न जाने

कितने समझौतों के पैबंदों से

सांसें अपने तन को सजाये

जीने की

नाकाम कोशिश करती हैं

ये कैसी लहद है

जहां रिश्ते

ज़िस्म के साथ

ज़मीदोज़ होकर भी

धुंआ धुंआ होती ज़िन्दगी के साथ

अपने ज़िन्दा होने का

अहसास…

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Added by Sushil Sarna on September 1, 2016 at 9:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल: शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें

212 22 12 22122



शूलियों पर चढ़ चुकी सम्वेदनायें ।

बाप के कन्धों पे बेटे छटपटाएं ।।



लाश अपनों की उठाये फिर रहा है ।

दे रही सरकार कैसी यातनाएं ।।



है यही किस्मत में बस विषपान कर लें ।

दर्द की गहराइयां कैसे छुपाएँ ।।



सिर्फ खामोशी का हक अदने को हासिल ।

डूबती हैं रोज मानव चेतनाएं ।।



हम गरीबों का खुदा कोई कहाँ है ।

मुफलिसी पर हुक्मरां भी मुस्कुराएं।।



वो करेंगे जुर्म का अब फैसला क्या ।

जो नचाते सैफई में…

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Added by Naveen Mani Tripathi on September 1, 2016 at 9:30pm — 6 Comments

एक नज़्म: सूनापन

सूनापन



एक ख़ला है, ख़ामोशी है,

जिधर देखो उदासी है,

समय सिफ़र हो गया,

आंसू निडर हो गए,

घेरे हैं लोग,पर कोई साथ नहीं,

सर पर किसी का हाथ नहीं,

शाम खाली गिलास सा,

टेबल पर औंधे मुंह पड़ा है,

मन में चिंता दीमक की तरह,

मन को खाये जा रही  है,

दिल की गली ऐसी सूनी है,

मानो दंगे के बाद कर्फ़्यू लगा हो,

शरीर सूखे पेड़ की तरह खड़ा तो है पर,

पीसा के मीनार सा, झुक सा गया है,

कब तक और कहाँ तक

इस सूनेपन, इस अकेलेपन का

बोझ…

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Added by आशीष सिंह ठाकुर 'अकेला' on September 1, 2016 at 6:30pm — 8 Comments

स्वर्गीय माँ की स्मृति में(ताटंक छंद)-रामबली गुप्ता

जीवनदात्री माता जब भी, याद तुम्हारी आती है।

हरि-सम निर्मल छवि माँ! तेरी मानस-पट पर छाती है।।

याद सदा आती हैं मइया! प्यार भरी तेरी बातें।

गाकर लोरी मुझे सुलाया, जागी तू कितनी रातें।।1।।



दूध-भात के कौर मधुर वो, मुझे न विस्मृत हो पाते।

जब आँचल में सो कर तेरे, हम सपनों में खो जाते।।

धूल-धूसरित तन ले जब आ बैठ गोद में जाता था।

हर भय से हर संशय से माँ! सहज-सुरक्षा पाता था।।2।।



बनी प्रथम गुरु-गुरुकुल तुम ही, नित नव बात बताती थी।

छोटों को दूं… Continue

Added by रामबली गुप्ता on September 1, 2016 at 5:30pm — 7 Comments

गीत,दिग्पाल छ्न्द-सतविन्द्र

गीत



मापनी :2212 122 2212 122

-------



मुझको सता रही हैं,यादें सभी तुम्हारी

दिलकश अदा तुम्हारी,मोहक हँसी तुम्हारी



चुपचाप पास आना,आकर मुझे सताना

वो पास बैठ जाना, हर बात को बताना

कब भूल पा रहा हूँ,वो दिल्लगी तुम्हारी

दिलकश.....





मैं भूलता जहां को,नजदीक तुम अगर थे

इस प्रेम की डगर पर,ऐ जान हमसफ़र थे

महसूस कर रहा हूँ,हर साँस भी तुम्हारी

दिलकश.....



नज़रें करें शरारत,अच्छी मुझे लगी थी

जब देख… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on September 1, 2016 at 5:01pm — 6 Comments

ग़ज़ल : मेरी ग़ज़लों का मंज़र

मेरी ग़ज़लों का मंज़र खुरदुरा है,
शज़र उम्म्मीद का लेकिन हरा है।

बढ़ाओ हाथ हम आज़ाद होंगे,
कलम भी जोश से देखो भरा है।

हमारे शेर में हैं अर्थ कितने,
बज़ाहिर दिख रहा जो इकहरा है।

चटानो को नहीं छूना कि मौसम,
हिदायत दे गया सब भुरभुरा है।

ग़ज़ल पढ़ना सुनाना ठीक है पर,
अगर गाने लगे तो सुर बुरा है।

निरुत्तर कर दिया मुझको ख़ुशी ने,
ग़मो को देख कर मुझ पर मरा है।


मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Ravi Shukla on September 1, 2016 at 12:21pm — 9 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
'बेवकूफ औरत' (लघु कथा 'राज ')

  

मई जून का महीना आग बरसाता हुआ सूरज ऊपर से सामर्थ्य से ज्यादा भरी हुई खचाखच बस, पसीने से बेहाल लोग रास्ता भी ऐसा कहीं छाया या हवा का नाम निशान  नहीं बस भी मानों रेंगती हुई चल रही हो| एक को गोदी में एक को बगल में बिठाए बच्चों को लेकर रेवती सवारियों के बीच में भिंची हुई बैठी थी| मुन्नी ने पानी माँगा तो रेवती ने बैग से गिलास निकाल कर पैरों के पास रक्खे हुए केंपर से बर्फ मिला ठंडा ठंडा पानी दोनों बच्चों को पिला दिया |पानी देखकर न जाने कितने अपने होंठों को जीभ से गीला करने…

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Added by rajesh kumari on September 1, 2016 at 12:17pm — 14 Comments

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