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प्रिय से रँगवावन को चुनरी

प्रिय से रँगवावन को चुनरी,

मन मोद लिए मुसकाय चली।

सब छाड़ि जहाँ के लाज सखे!

भरि थाल गुलाल उड़ाय चली।

पट पीतहि लाल हरा रँग से,

मन प्रेमहि रंग रँगाय चली।

नव यौवन के मद से सबके,

मन में मदिरा छलकाय चली।।1।।



सुंदर पुष्प सजा तन पे,

लट-केश -घटा बिखराय चली है।

अंजित नैन कटार बने,

अधरों पर लाल लुभाय चली है।।

अंगहि चंदन गंध भरे,

मदमत्त गयंद लजाय चली है।

हाय! गयो हिय मोर सखे!

कटि जूँ गगरी छलकाय चली… Continue

Added by रामबली गुप्ता on May 9, 2016 at 5:30pm — 5 Comments

क्षितिज

यह कौन है वहां उस छोर पर

जो देख रहा बादलों के कोर से

बैठ गया है जो वहां सालों से

न वो कोई ज़मीन पर रहता है

न ही आसमान को कोई हिस्सा है

दिखता है वो बहुत करीब मगर

जाने किस जहां में बस्ता है

दूर है वो पर करीब ही दिखता है

जब पूछते है पता उसका

कुछ मुस्कुराकर वो यह कहता है

बांवरा मन यह तेरा क्यों मुझको

इस बेचैनी से क्यों मुझको तू देखता है

क्षितिज हूँ मैं ,

आसमान का नहीं ,ज़मीन का भी नहीं

यह मेरा जहां है जहाँ तू मुझको…

Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 9, 2016 at 3:30pm — 5 Comments

नज़्म - तुम्हारे ख़त

कितना अच्छा होता न ?

अगर वो सारे ख़त तुम्हारे

जिन्हें मैं रोज़ पढ़ता हूँ

पढ़ कर मुस्कुराता हूँ

कभी आंसू भी आते हैं

मगर गिरने नहीं देता

कि कोई लफ्ज़ जो तुमने लिखा

मिट जाए न मेरे आंसू से

कितना अच्छा होता

जो ये सारे ख़त तुम्हारे

तुमने न लिखे होते

या मेरा पता गलत होता

तो आज जब तुम अहद सारे भूल बैठे हो

मैं भी भूल सकता था

सभी क़समें सभी वादे

सभी शिकवे सभी आहें

जो हैं जा ब जा बिखरे हुए

हर एक ख़त की भीगी सत्रों में

और जो… Continue

Added by saalim sheikh on May 8, 2016 at 11:41pm — 5 Comments

पुण्य-तिथि .... (विजय निकोर)

पुण्य-तिथि

(२७ वर्ष उपरान्त भी लगता है ... माँ अभी गई हैं, अभी लौट आएँगी)

माँ ...

रा्तों में उलझे ख्यालों के भंवर में, या

रंगीले रहस्यमय रेखाचित्रों की ओट में

कभी चुप-सी चाँदनी की किरणों में

श्रद्धा के द्वार पर धुली आकृतिओं में

सरल निडर असीम आत्मीय आकृति

माँ की खिलखिलाती मुसकाती छवि

समृतिओं के दरख़तों की सुकुमार छायाएँ

स्नेह की धूप का उष्मापूरित चुम्बन

मेरे कंधे पर तुम्हारा स्नेहिल हाथ…

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Added by vijay nikore on May 8, 2016 at 1:30pm — 31 Comments

गजल(मनन)

2122 2122 212

कुर्सियों का खेल बस चलता रहा

आदमी हर बार कर मलता रहा।1



रोशनी की खोज में निकले सभी

रोज सूरज भी उगा, ढलता रहा।2



फैलता जाता तिमिर घर-घर यहाँ

बस उजाला हाथ है मलता रहा।3



सींचते बिरवे रहे हम श्वेद से

सूखना असमय जरा खलता रहा।4



मुश्किलें हों लाख दर पे देखिये

हर घड़ी सुंदर सपन पलता रहा।5



पंछियों का क्या ठिकाना,उड़ गये,

है अलग कलरव अमर चलता रहा।6



जो बुझाता आग तपकर रोज ही

आदमी वह आज भी… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 8, 2016 at 7:30am — 6 Comments

मातृ-दिवस पर एक ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222



गगन मेरा पिता है और ये धरती है मेरी माँ

मैं जिसमें लोटता रहता हूँ वो मिट्टी है मेरी माँ



कुशलता से सभी रिश्तों के मनकों को पिरोती है

बड़ी ही नर्म और' मजबूत-सी डोरी है मेरी माँ



ज़माने के सभी रिश्तों को पल-भर में भुला दूँ,पर

मैं उसकी कोख से जन्मा, मेरी अपनी है मेरी माँ



फ़िज़ा में गूंजता हर ओर मातम,जब सिसकती है

दहल जाती है पृथ्वी, जब कभी रोती है मेरी माँ



यही कारण है शायद, मैं कभी मंदिर नहीं जाता

मेरी… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 8, 2016 at 7:00am — 5 Comments

बरसात आँसुओं की और प्यार की फ़सल हो (ग़ज़ल)

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

 

इस दिल की लालसा पर एक बार तो अमल हो

बरसात आँसुओं की और प्यार की फ़सल हो

 

नाले की गंदगी है समुदाय की ज़रूरत

बहती हुई नदी में पर साफ शुद्ध जल हो

 

देवों के शीश पर चढ़ ये हो गया है पागल

ऐसा करो प्रभो कुछ फिर कीच का कमल हो

 

गर्मी की दोपहर को पूनम की रात लिखना

गर है यही ग़ज़ल तो मुझसे न अब ग़ज़ल हो

 

सरलीकरण में फँसकर विकृत हैं सत्य सारे

हारेगा झूठ ख़ुद ही यदि सच न अब सरल…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on May 7, 2016 at 9:16pm — 2 Comments

ये रास्ते ....

कितने थक गए हैं 

ये लम्बे तन्हा रास्ते 

सृजन और संहार की 

इनमें सदियाँ समाई हैं…

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Added by Sushil Sarna on May 7, 2016 at 7:30pm — 4 Comments

कोई सीखे आपसे - बैजनाथ शर्मा 'मिंटू'

अरकान - 2122   2122   2122   212

 

दिल लगाकर दिल चुराना कोई सीखे आपसे|

तौर ये सदियों पुराना कोई सीखे आपसे|         

 

कल सुबह नज़रें मिली औ शाम को ही गुफ्तगू,

रात को सपनों में आना कोई सीखे आपसे|

 

आपकी मख्मूर आँखें गोया मय के जाम हैं,

ये अदाएँ कातिलाना कोई सीखे आपसे|

 

सैंकड़ो उल्फ़त में अबतक बन गए हैं आशना,

इश्क में पागल बनाना कोई सीखे आपसे|

 

पीठ पीछे प्यार का इकरार करते हैं मगर,

सामने…

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Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 7, 2016 at 4:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल

22-22-22-22-22-22-22-2



सच को लिख कर तुम दुनिया में होने का इज़हार करो

झूठी बातेँ सारी छोड़ो दिल को ना लाचार करो

गर जीवन में मुश्किल आए हिम्मत को मत हारो तुम

शिकवे छोड़ो मन में ठानो फिर ख़ुद को औज़ार करो

कितने अच्छे वो दिन लगते जब हम छोटे बच्चे थे

मम्मी पापा कहते फिरते मत दिन को बेकार करो

नफरत जग में जिसने बांटी देखो उसका हाल बुरा

तोड़ो सारी तुम दीवारें मिल के सबसे प्यार करो

मिट्टी पानी आग हवा केवल जरिया…

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Added by munish tanha on May 7, 2016 at 11:30am — 2 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : व्यवस्था (गणेश जी बागी)

अतुकांत कविता : व्यवस्था

 

गर्मी से तपती धरती

चहुँ ओर मचा हाहाकार

बादल को दया आयी

चारो तरफ नज़र दौड़ाई

जाति देखी, धर्म देखा

सगे-सम्बन्धी, पैरवीकार देखा  

खुद को सिमित करके  

खूब बरसा, जमकर बरसा

 

कही बाढ़ तो कही सूखा

पुनः मचा…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 7, 2016 at 10:30am — 9 Comments

ज़िन्दगी से जो मिला, हमको गवारा हो गया (ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212



ज़िन्दगी से जो मिला हमको गवारा हो गया

कुछ गिला-शिकवा किये बिन ही गुज़ारा हो गया



टूटकर ख़ुद पूर्ण करता है जो औरों की मुराद

मेह्रबानी से किसी की मैं वो तारा हो गया



सत्य-अहिंसा साथ लेकर हम भटकते ही रहे

फ़ोटो से बापू की, उसका काम सारा हो गया



कल तलक जो मेरे सीने में धड़कता था,वो दिल

आज ये ऐलान करता हूँ, तुम्हारा हो गया



क़ैद कर दो प्रेम को इतिहास के पन्नों में अब

आजकल के प्रेमियों को 'काम' प्यारा हो… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 7, 2016 at 6:44am — 6 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
रुनझुन फिर पायल होने दो.... गीत//डॉ प्राची

बरसो तुम जीभर मरुथल में, अब खुद को बादल होने दो।

अपनी एक छुअन से मेरा पोर-पोर संदल होने दो।



जब खुशियों की सेज बिछी थी

तब आँखों में स्वप्न भिन्न थे,

रूठे-रूठे से हम थे या-

सौभागों के पृष्ठ खिन्न थे,

वक्र चाल हर तिरछे ग्रह की अब बिल्कुल निष्फल होने दो। अपनी एक....



अपनी-अपनी ज़िद को पकड़े

तन्हाई से खूब लड़े हैं,

लहरों की आवाजाही बिन

तट दोनों खामोश पड़े हैं,

पानी में कुछ तो हलचल हो, लहरें अब चंचल होने दो। अपनी एक....…



Continue

Added by Dr.Prachi Singh on May 7, 2016 at 5:30am — 4 Comments

पैसा:बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’

अरकान – 1222 1222 1222 1222

 

कभी चाहत कभी हसरत कभी श्रृंगार है पैसा 

कभी है फूल तो देखो कभी तलवार है पैसा |

 

जुदा माँ-बाप से कर दे लड़ाए भाई-भाई को,

बहाए खून का दरिया तो फिर बेकार है पैसा|

 

खुदा का शुक्र है घर में बरसती है सदा खुशियाँ, 

कि रहते साथ सब मिलकर मेरा परिवार है पैसा|

 

इसे पाने की खातिर ही जहां में खोया है सब कुछ

मेरे आपस के सम्बन्धों में ये दीवार है पैसा…

Continue

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 6, 2016 at 10:30pm — 3 Comments

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव ...

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव ...

दूर दूर तक

काली सड़कें

न पीपल न छाँव

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव

नीला अम्बर

पड़ गया काला

अब धरा पे फैला धुंआ

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव

कंक्ट्रीट के

जंगल फैले

अब दिखता नहीं कुआं

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव

हल-बैल का

अब युग बीता

ट्रैक्टर हुआ जवां

अखियाँ ढूंढें अपना गाँव

सांझ के खेले

ढपली मेले

खो गए जाने कहाँ

अखियाँ ढूंढें अपना…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 6, 2016 at 6:01pm — 6 Comments

ग़ज़ल-नूर-अश्क आँखों से फिर बहा जाये,

२१२२/१२१२/२२ (११२)

.

अश्क आँखों से फिर बहा जाये,

अपना जाये, किसी का क्या जाये.

.

तुम अगर चश्म-ए-तर में आ जाओ,

झील में चाँद झिलमिला जाये.
 

.

ढ़लती उम्रों के मोजज़े हैं मियाँ

इक बुझा जाए, इक जला जाये.

.

याद माज़ी को कर के जी लूँगा, 

फिर जहाँ तक ये सिलसिला जाये.

.

ज़ह’न कहता है, कर ले सब्र ज़रा,

और दिल है कि बस…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2016 at 7:00am — 20 Comments

दुर्मिल सवैया

बन प्रेम-प्रसून सुवासित हो,

उर में सबके नित वास करो।



मद-लोभ-अनीति-अधर्म तजो,

धर धर्म-ध्वजा नर-त्रास हरो।।



सत हेतु करो विषपान सदा,

नहि किंचित हे! मनुपुत्र! डरो।



सदभाव-सुकर्म-सुजीवन का,

जग में प्रतिमान नवीन धरो।।1।।



पथ में अति काल-बवंडर से,

नहि किंचित कंत! कदापि डरो।



करके दृढ़-निश्चय साहस से,

हिय धीर धरे नित यत्न करो।।



हर रोक-रुकावट-विघ्न मिटे,

जब सिंह समान हुँकार… Continue

Added by रामबली गुप्ता on May 6, 2016 at 4:30am — 5 Comments

गीत

स्नेह का दीप चाहे विजन में जले किन्तु जलता रहे यह् बढे ना  कभी

जो हृदय शून्य था मृत्तिका पात्र सा

नेह से आह ! किसने तरल कर दिया ?

जल उठी कामना की स्वतः वर्तिका

शिव ने कंठस्थ फिर से गरल कर लिया

अश्रु के फूल हों नैन-थाली सजे स्वप्न के देवता पर चढ़े ना  कभी   

आ बसी मूर्ति जब इस हृदय-कोश में

पूत-पावन वपुष यह उसी क्षण हुआ

रच गया एक मंदिर मुखर प्रेम का

साधना से विहित दिव्य प्रांगण हुआ

फूल ही सर्वथा एक शृंगार हो,…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 5, 2016 at 9:39pm — 2 Comments

जख्म दे के हवा करे कोई

2122  -  1212  -  22  

जख्म दे के हवा करे कोई

इस तरह भी वफ़ा करे कोई

 

आप तो मेरी जान हो जानम

देख कर ये जला करे कोई

 

प्यार में शर्त तुम लगाते हो

सोच कर के दगा करे कोई

 

दूर मंजिल तो रास्ता केसा

रात औ दिन चला करे कोई

 

वो बना है मरीज इस खातिर 

पास उस के रहा करे कोई

 

हर कदम झूठ फ़िक्र धोखा है

अब कहाँ तक सहा करे कोई

.

मुनीश “तन्हा” नादौन…

Continue

Added by munish tanha on May 5, 2016 at 9:00pm — 2 Comments

गीत

स्नेह का दीप चाहे विजन में जले किन्तु जलता रहे यह् बढे न कभी

जो हृदय शून्य था मृत्तिका पात्र सा

नेह से आह ! किसने तरल कर दिया ?

जल उठी कामना की स्वतः वर्तिका

शिव ने कंठस्थ फिर से गरल कर लिया

अश्रु के फूल हों नैन-थाली सजे स्वप्न के देवता पर चढ़े न कभी   

आ बसी मूर्ति जब इस हृदय-कोश में

पूत-पावन वपुष यह उसी क्षण हुआ

रच गया एक मंदिर मुखर प्रेम का

साधना से विहित दिव्य प्रांगण हुआ

फूल ही सर्वथा एक शृंगार हो,…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 5, 2016 at 8:45pm — 1 Comment

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