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बन प्रेम-प्रसून सुवासित हो,
उर में सबके नित वास करो।

मद-लोभ-अनीति-अधर्म तजो,
धर धर्म-ध्वजा नर-त्रास हरो।।

सत हेतु करो विषपान सदा,
नहि किंचित हे! मनुपुत्र! डरो।

सदभाव-सुकर्म-सुजीवन का,
जग में प्रतिमान नवीन धरो।।1।।

पथ में अति काल-बवंडर से,
नहि किंचित कंत! कदापि डरो।

करके दृढ़-निश्चय साहस से,
हिय धीर धरे नित यत्न करो।।

हर रोक-रुकावट-विघ्न मिटे,
जब सिंह समान हुँकार भरो।

निज-लक्ष्य-समर्पित-साधक का,
तुम वीर! नया प्रतिमान धरो।।2।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Saurabh Pandey on May 12, 2016 at 11:19pm

आदरणीय भाई रामबली गुप्ताजी, आपकी दुर्मिल पर कामयाब कोशिश मुग्ध कर रही है. वैसे तनिक और संयत होते तो यह प्रस्तुति और सहज हुई होती. जैसे, खड़ी हिन्दी (हिन्दुस्तानी) की रचनाओं में नहीं को नहि न किया करें. वैसे आदरणीय गोपालनारायन जी ने तजो और धरो जैसे शब्दों पर उठायी है. मगर मैं उनकी आपत्ति पर संतुष्ट नहीं हूँ. कारण कि ये दोनों शब्द हिन्दी के भी हैं. 

आपके प्रयास पर हार्दिक बधाई और शुभकमनाएँ 

Comment by रामबली गुप्ता on May 6, 2016 at 8:00pm
हृदयतल से सादर आभार आद.गोपाल नारायण जी, आद. सुशील सरना जी एवं आद.समर कबीर जी
Comment by Sushil Sarna on May 6, 2016 at 6:38pm

हर रोक-रुकावट-विघ्न मिटे,
जब सिंह समान हुँकार भरो।

निज-लक्ष्य-समर्पित-साधक का,
तुम वीर! नया प्रतिमान धरो।।2।।
बहुत सुंदर आदरणीय रामबली जी , सुंदर शब्द चयन, प्रवाह में कसावट ... क्या बात है। हार्दिक बधाई सर जी।

Comment by Samar kabeer on May 6, 2016 at 6:29pm
जनाब रामबली गुप्ता जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 6, 2016 at 4:08pm
आदरणीय , ११२ पर 'प्रतिमान' व्यंजक अच्छी प्रस्तुति-- तजो और धरो शब्द से बचना चाहिए था क्योंकि सवैय्या खडी बोली में है . अकविता के युग में छंद का स्वागत है .

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