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ये कैसा कन्या पूजन

एक हाथ से कन्या पूजन दूजे हाथ से कन्या हनन

माँ को खुश करने का कैसा है ये आयोजन

धन वैभव की चाहत में सुख संपत्ति के आगत में

मनाते सभी त्यौहार लक्ष्मी जी के स्वागत में

पर ये कैसा अनर्थ जो गृहलक्ष्मी पर भारी

घर अस्पताल में चलती इस लक्ष्मी पर आरी

माँ की ममता बेबस और निष्ठुर पिता का साया

उस घर में बेटी का जन्म क्यूँ न किसी को भाया

कैसी स्वार्थी कैसी निर्दयी ये दुनिया की मंडी

जहाँ बेबस है शक्ति स्वरूपा दुर्गा काली और चंडी

जिन हाथों से डाली जाती है…

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Added by DR. HIRDESH CHAUDHARY on October 15, 2015 at 10:00pm — 1 Comment

"प्यारी दुश्मन" -[लघु कथा] (18)

"प्यारी दुश्मन"- (लघु-कथा)



"तुम्हें जब अपने पास नहीं आने देती तो तुम अपनी समधन को क्यों नहीं बुला लेतीं ?"- पड़ोसन ने पार्वती से कहा।



"वो भी करके देख लिया, कह रही थी कि जब

तक दामाद जी खुद फोन करके नहीं बुलायेंगे, नहीं आऊंगी।" पार्वती ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा- "और बेटा कहता है कि मम्मी तुम्हारे होते हुए सासू माँ को बुलाने की क्या ज़रूरत है।"



पड़ोसन ने समझाते हुए कहा-" न तो तुम्हारी बहू पूरी दवायें ले रही है, न परहेज़ ढंग से कर रही है और न ही तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — 1 Comment

"प्यारी दुश्मन" -[लघु कथा] (18)

"प्यारी दुश्मन"- (लघु-कथा)



"तुम्हें जब अपने पास नहीं आने देती तो तुम अपनी समधन को क्यों नहीं बुला लेतीं ?"- पड़ोसन ने पार्वती से कहा।



"वो भी करके देख लिया, कह रही थी कि जब

तक दामाद जी खुद फोन करके नहीं बुलायेंगे, नहीं आऊंगी।" पार्वती ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा- "और बेटा कहता है कि मम्मी तुम्हारे होते हुए सासू माँ को बुलाने की क्या ज़रूरत है।"



पड़ोसन ने समझाते हुए कहा-" न तो तुम्हारी बहू पूरी दवायें ले रही है, न परहेज़ ढंग से कर रही है और न ही तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 15, 2015 at 8:27pm — 1 Comment

ग़ज़ल : हो ख़ुशी या ग़म या मातम, जो भी है यहीं अभी है

बह्र : ११२१ २१२२ ११२१ २१२२

 

हो ख़ुशी या ग़म या मातम, जो भी है यहीं अभी है

न कहीं है कोई जन्नत, न कहीं ख़ुदा कोई है

 

जिसे ढो रहे हैं मुफ़लिस है वो पाप उस जनम का

जो किताब कह रही हो वो किताब-ए-गंदगी है

 

जो है लूटता सभी को वो ख़ुदा को देता हिस्सा

ये कलम नहीं है पागल जो ख़ुदा से लड़ रही है

 

जहाँ रब को बेचने का, हो बस एक जाति को हक

वो है घर ख़ुदा का या फिर, वो दुकान-ए-बंदगी है

 

वो सुबूत माँगते हैं, वो…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 15, 2015 at 6:13pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गुमसुम क्यों नदी का तीर है---- ग़ज़ल----मिथिलेश वामनकर

2122 – 2122 – 2122 – 212

 

चाँदनी जब रात, गुमसुम क्यों नदी का तीर है?

मौन है जल किसलिए, पूछो कि क्यों गंभीर है?

 

प्यार के झुरमुट अंधेरों से लिपट सोते…

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Added by मिथिलेश वामनकर on October 15, 2015 at 2:44pm — 12 Comments

रूप मदिरा पान का पाकर निमन्त्रण फँस गये

2122 2122 2122 212



दिल की धड़कन का उन्हें देकर नियंत्रण फँस गये।

रूप मदिरा पान का पाकर निमन्त्रण फँस गये।।



चित्त की हर भित्ति पर बस रंग उनका दिख रहा।

भित्तियों पर उनकी छवि का करके चित्रण फँस गये।।



मन भ्रमर चञ्चल जो बंजारे सा था तो ठीक था।

उनमें ही अवधान का करके एकत्रण फँस गये।।



कल्पना की वाटिका में तितलियों की भीड़ थी।

मन के उपवन में उन्हें देकर आमन्त्रण फँस गये।।



इस तरह प्यासे नहीं थे चक्षु ये मेरे कभी।

दृष्टि से…

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 15, 2015 at 12:49am — 3 Comments

"प्यार-संस्कार" - (गीतिका) [2]

2122 2122 2122 21

आधार छंद- रूपमाला (मापनी-मुक्त)



चार दिन की चाँदनी है, चार दिन का प्यार,

प्यार का बीमार कहता, भावना व्यापार।

[1]



आज हम त्योहार पर ही, बांटते हैं प्यार,

काश हम हर 'वार' को ही, बांटते हर बार।

[2]



काश उन्हें पूछते हम, बेचते जो प्यार,

झेलते तन बेचकर ही, रोज़ अत्याचार।

[3]



भागते फिरते जुटाने, रोज़ धन को लोग,

तब तरसते खूब रहते, छोड़ कर सब प्यार।

[4]



जाग कर के रात को हो, मौन… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 10:15pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
राजधानी जो आये पता कर चले--(ग़ज़ल)-- मिथिलेश वामनकर

212—-212---212---212

 

पूछते रह गए आप क्या कर चले?

वो मेरी जिंदगी हादसा कर चले.

 

 गुमटियाँ शह्र से जो हटा कर चले…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on October 14, 2015 at 4:30pm — 23 Comments

अंजामे मुहब्बत .....

अंजामे मुहब्बत .......

कितनी अज़ीब हैं ज़िंदगी की राहें

हर मोड़

एक उलझी पहेली

हर राह पर फिसलन

हर नफ़स एक चुभन

गर्द में दफ़्न

वफ़ा और ज़फ़ा के अनसुने अनकहे

वो अफ़साने

जिन्हें सुनना चाहे

ये दिल बार बार

हर बार

कोई लफ्ज़ लबे दहलीज़ पे

इज़हार से शरम खाता है

और अश्के रवां रुखसार पे रुक जाता है

कह देती है सांस

साँसों में तपते अहसासों को

दे देती है खामोश धड़कनों को

अपनी धड़कनों की आवाज़

वो बात मुहब्बत की…

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Added by Sushil Sarna on October 14, 2015 at 2:16pm — 10 Comments

"सखेद" - [छंद- चौपईया/जयकरी पर आधारित]

[छंद- चौपईया/जयकरी पर आधारित मापनी मुक्त रचना]



रहो सोचते तुम मत आज,

कर लो जो करना है काज।

भले दूसरों की मत मान,

मन की अपने तुम लो जान । /1/



नुक्ता-चीनी करते टोक,

नेक काम पर थोपें रोक।

यही इस ज़माने का राज़,

कर्मयोगी समझ लो आज। /2/



होता शिक्षा का व्यापार,

रहे निर्धन वर्ग लाचार।

है योजनाओं का प्रचार,

फिर भी होते अत्याचार। /3/



टी.वी., फ़िल्मों को तू देख,

भूल गीता-क़ुरआन-लेख,

पाठ सिखाते सारे… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 14, 2015 at 2:00pm — 9 Comments

एम॰ बी॰ ए॰ बहू -( लघुकथा )-

सुनयना की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे कि उसकी सास का फ़ोन आगया,"समधन जी, ज़रा फ़ुरसत निकाल कर अपनी लाडली को ले जाना"! और आगे बिना कुछ कहे सुने फ़ोन काट दिया!शाम को सुनयना के मॉ बापू पहुंच गये उसके ससुराल!

"कोई भूल हो गयी क्या हमारी सुनयना से"!

"नहीं जी, भूल तो हमसे हुयी जो इसकी भोली सूरत और एम. बी. ए. की डिग्री से धोखा खा गये"!

"आखिर हुआ क्या, बहिनजी, कुछ बताइये तो सही"!

"कोई एक बात हो तो बतायें! बिना उठाये सुबह उठती नहीं, महारानीजी, बिस्तर पर ही चाय चाहिये,रसोई…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 14, 2015 at 12:00pm — 6 Comments

नवरात्रि-उपहार....

दोहा छ्न्द-----नवरात्रि-उपहार

 

प्रथम शैलपुत्री मनन, है नवरात्रि विधान.

वृद्धि करें वन जीव जड‌, तप बल योग प्रमाण.1

ब्रह्मचारिणी मां प्रखर, दिव्य ज्योति की सार.

सकल सिद्धि यश विजय का, देती हैं उपहार.2

देवि चंद्र घंटा करें, रोग - दोष से मुक्त.

सुखद शांति सुख सम्पदा, वर देतीं उपयुक्त.3

दिव्य हास्य से प्रकट कर, सकल ब्रह्म रस छ्न्द.

खुले हृदय से बांटतीं, कूष्माण्डा मां कंद.4

शक्ति पांचवीं स्कंद…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 14, 2015 at 10:30am — 6 Comments

जाने कितने ग़म (ग़ज़ल)

1222 1222 1222 1222

हैं हँसते मुस्कुराते हम छिपाते जानें कितने ग़म।

हाँ चलते गुनगुनाते हम मिटाते जानें कितने ग़म।।



हमारे होंठ जब लरज़े सुनाएँ दास्ताँ अपनी।

अचानक रूबरू मेरे हैं आते जानें कितनें ग़म।।



कभी रोते हुए बच्चे कभी तो छटपटाती माँ।

विवशता युक्त आँखों से बताते जानें कितने ग़म।।



वो जो चलती हुई गाड़ी से पटरी पर गयी फेंकी।

बिलखती आँख के आंसूँ सुनाते जानें कितने ग़म।।



दिखी है लाश लटकी पेड़ पर जब अन्नदाता की।

निवाले में तभी से… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 13, 2015 at 11:39pm — 14 Comments

"थोपी क्षमा" - [लघु कथा - 17]

"थोपी क्षमा" - (लघु कथा)



कक्षा में पीछे बैठे हुए मित्र को मोबाइल पर चित्र दिखा रहे छात्र को शिक्षक ने रंगे हाथों पकड़ लिया। छात्र ने फुर्ती से मोबाइल दूसरे मित्र तक पहुँचा दिया और पूरी कक्षा के सामने शिक्षक को झूठा-शक्की करार दे दिया। दो थप्पड़ मार कर शिक्षक ने उससे सच बोलने को और 'क्षमा' माँगने को कहा, किन्तु छात्र ने शिक्षक का हाथ सख्ती से पकड़ लिया। शिक्षक उसे खींचता हुआ कक्षा से बाहर 'प्राचार्य-कक्ष' की ओर ले जाने लगा।



"तुम क्या ले जाओगे मुझे, मैं लिये चलता हूँ तुम्हें… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 9:30pm — 5 Comments

कुम्हारी / लघुकथा

बाजार में बहुत भीड़ थी आज । क्यों ना हो ,नवरात्रि का पहला दिन, लोग सुबह से ही स्नान ध्यान कर पूजा-पाठ की तैयारी में लगे हुए थे ।

मै भी स्नान कर ,कोरी साड़ी पहन, नंगे पैर माता रानी को लिवाने आई थी । फुटपाथ के उसी निश्चित कोने में , माता रानी विविध रूपों में मुर्ति रूप लिये दुकानों में सज रही थी । कहीं तीन मुंह वाली शेर पर सवार थी , कहीं अपने अष्टभुजा में सम्पूर्ण शस्त्रों के साथ , तो कहीं दस भुजा लेकर महिषासुर का वध करती हुई । काली ,चामुण्डा सबके दर्शन हुए लेकिन मै लेकर…

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Added by kanta roy on October 13, 2015 at 8:00pm — 4 Comments

लघुकथा – संतान हीन

"चाचीजी, मेरे मन में वर्षों से एक सवाल  है, यदि आप बुरा ना मानो तो पूछ लूं"!

"बिरज़ू बेटा,  पूछ ले क्या शंका है तेरे मन में"!

"चाचीजी, पूरे खानदान में आपकी और चाचाजी की जोडी सबसे अब्बल है! सुंदर ,स्वस्थ और आकर्षक, मगर संतान हीन!क्या आपने कभी इस बारे में नहीं सोचा!कोई जांच आदि नहीं कराई"!

"क्या करेगा अब ये गढे मुर्दे उखाडकर, जाने भी दे"!

"चाचीजी, बताइये ना, ऐसा क्यों हुआ"!

"तो सुन,  जब मैं  व्याह के आयी थी तो पहले ही दिन मुझे  घर की औरतों ने  बताया कि तेरे…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 13, 2015 at 2:00pm — 6 Comments

"नाम के मुसलमान" - [लघु कथा- 16]

"फोन करने और 'ईद मुबारक़' कहने की क्या ज़रूरत थी ?" शबाना ने एतराज़ जताते हुए कहा।

" तो तुमने इतने सालों बाद भी मेरी आवाज़ पहचान ली थी ! फिर तुमने अपने शौहर को क्यों दे दिया फोन ?" कुछ नाराज़गी के लहज़े में आफताब ने पूछा।

"ग़ैर मर्दों से यूँ फोन पर बातें करना हमारे यहाँ मना है। आवाज़ क्या, तुम्हारी तो रग-रग से वाकिफ हूँ मैं तो !" लम्बी साँस लेते हुए शबाना ने उसे समझाया- " देखो, गढ़े मुर्दे उखाड़ कर ज़ख़म कुरेदने से कोई फायदा नहीं ! तुम्हारे वालिद साहब ही घर आये थे और उन्होंने बहुत…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 13, 2015 at 8:00am — 3 Comments

ऐसा हो नव-जीवन -[ काव्य-रचना]

आत्म-मंथन से,
चिंतन-मनन से,
कुछ सुधरे,
अपना जीवन,
स्वार्थों से,
लोभ से,
अंधविश्वास,
अंधानुकरण से,
मुक्त रहे जो,
ऐसा हो नव-जीवन।
प्रकृति से,
संस्कृति से,
नीति-रीति से,
सहज अनुकूलन।
आचरण से,
सदानुकरण से,
पर्यावरण से,
श्रेष्ठ संतुलन,
ऐसा हो नव जीवन।

(मौलिक व अप्रकाशित)
_शेख़ शहज़ाद उस्मानी
शिवपुरी म.प्र.

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 12, 2015 at 8:48am — 7 Comments

"नज़रिया" - [लघु कथा - 16]

"नज़रिया" - (लघु कथा)



एक दिन बेडरूम में काली चीटियों के झुंड को देखकर शीनू ने अपने पिता जी से कहा-" पापा, दीवार पर ये इतनी सारी चीटियां लाइन बनाकर कहां जा रही हैं, उनके तो मुँह में भी कुछ है !"



"बेटा, वे अपने भोजन का इन्तज़ाम कर रही हैं, लगता है कुछ 'जुगाड़' हो गया है।"



"जुगाड़ ! जुगाड़ में इतनी सारी चीटियां इकट्ठा ! जैसे कि कोई 'दावत' या 'भोज' हो रहा हो !"



"हाँ बेटा, ये चीटियां मिल जुलकर अनुशासन में खाना शेयर करती हैं। देखो, पूरा परिवार ही नहीं, पूरा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2015 at 10:39pm — 4 Comments

"महकती रोती दुनिया" - [लघु कथा - 15]

"महकती रोती दुनिया" - [लघु कथा]



"बड़े ग़ज़ब की बात थी कि कष्ट उठाते हुए भी उनके चेहरों पर मुस्कान बरकरार थी, भीड़-भाड़ में भी उनके चेहरे खिल रहे थे। एक ने दूसरे से सटकर पूछा- "क्यों तुम्हारा क्या कसूर था? "



"वही, जो तुम्हारा था"- उत्तर देकर दूसरे ने कहा- " सुनो, ज़रा ये तो बताओ, तुम कौन से ख़ानदान से हो ?"



"अबे, ये क्यों पूछ रहा है? जो लिखा है सो होके रहेगा। कोई कहीं भी ले जाये, होना सबका वही है, जो होता आया है।"



"तुम्हारे कहनेे का मतलब क्या है, समझा… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 11, 2015 at 3:29pm — 5 Comments

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