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ग़ज़ल -निलेश "नूर"

मेरे दिल से ये भी न पूछिए, कि जला कहाँ ये बुझा कहाँ,

जो शरर था आग़ था ख़ाक है लगी इसको ऐसी हवा कहाँ.

.

कई संग उठे हैं मेरी तरफ़, कई उँगलियाँ मेरी ओर हैं,  

जो सज़ा मिली है गुनाह की वो गुनाह मैंने किया कहाँ.

.

मेरे लडखडाने की देर है, मुझे मयपरस्त कहेंगे सब,

उन्हें क्या पता मुझे इश्क़ है, कभी जाम मैंने छुआ कहाँ.     

.  

जो ख़ुदा कहे यहीं जम रहूँ, जो इशारा हो अभी चल पडूँ,

ये जो वक़्त है ये घड़ी का है, ये कभी किसी का हुआ कहाँ.   

.

ये…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on October 28, 2014 at 11:09am — 12 Comments

खुशियों की तारीख

खुशियों की तारीख

अस्पताल के हृदय-वार्ड में वो दम्पति उदास और गमगीन बैठा था |रह-रह कर उनके गलों से आँसू नीचे ढलक रहे थे |दीवाली और तीन साल की इकलौती बेटी के जन्मदिन में शामिल ना हो पाने की कसक ने उनके अंदर चक्रवात ला दिया था |स्त्री के हृदय-आपरेशन के बाद आई विसंगतियों के कारण वे घर से 250 किमी दूर यहाँ बेटी को एक पड़ोसी के यहाँ छोडकर पड़े थे | राम जी को जब सारी स्थिति पता चली तो वो दम्पति के पास पहुँचे और पति के काँधे पर हाथ रखकर समझाया –ये सही रहीं तो जीवन की कितनी ही दिवाली…

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Added by somesh kumar on October 27, 2014 at 11:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

याद तेरी है कोई दल दल क्या
डूबता जाता हूँ मैं ;पल पल क्या

हर क़दम पे मिले फ़ना आशिक़
है तुम्हारी गली भी मक़्तल क्या

हो गए चूर सपने बच्चों के
खा गई बाप को ये बोतल क्या

सच ओ ईमाँ की बात करता है
उसको कहता जहां ये पागल क्या

ढूंढ ही लेते हैं मुझे ये ज़ख़्म
ज़ख़्म भी बन गए है गूगल क्या

मौलिक व अप्रकाशित
गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on October 27, 2014 at 8:20pm — 12 Comments

मुझको फुर्सत में सताती है मेरी तनहाई...

बात करता हूं तो बातों में मेरी तनहाई

आंसुओं की तरह आंखों में मेरी तनहाई,

मेरी दहलीज पे जलते हुए चरागों को

आंधी बन करके बुझाती है मेरी तनहाई,

बेवफाई का गिला जब भी किया है मैंने

मुस्कराती है, रुलाती है मेरी तनहाई,

मेरे हिस्से के ये इतवार इन्हें तुम ले लो

मुझे फुर्सत में सताती है मेरी तनहाई,

जिंदगी मौत की राहों पे चला करती है

आईना रोज दिखाती है मेरी तनहाई,

दुश्मनों ने तो हमें वार करके छोड…

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Added by atul kushwah on October 27, 2014 at 6:00pm — 11 Comments

जेवर (लघुकथा)

चमचमाती हुई विेदेशी गाड़ी देखकर जैसे कान्ता ही चौंधिया गईं गाड़ी का दरबाजा खुला तो अन्दर से निकले बिदेशी इत्र का ज़बरदस्त झौंका उसके नथुनों से टकराया। सर से पाँव तक ज़ेवरों से लदी हुई बन्दिता नपे तुले पाँव जमीन पर रखते हुए गाड़ी से बाहर आई और कहा : “

मैने सोचा, तुम्हें शादी में अपने साथ ही ले चलूँ  और इसी बहाने तुम्हारा घर भी देख लूँ । किधर हे तुम्हारा घर ?”

“वो उधर उस गली में, लेकिन उधर गाड़ी नही जाएगी। ” कान्ता ने अपने घर की तरफ इशारा करते हुए बताया ।

“गाडी वहाँ नही जा सकती, तुम…

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Added by Bipul Sijapati on October 27, 2014 at 2:00pm — 8 Comments

गली में खेलती वो लड़की

गली में खेलती वो लड़की

================

गली में खेलती वो लड़की

कई आँखों के केंद्र में है |

कुछ आँखों के लिए वो सरसरी भर है

कुछ दूरबीन लगाए बैठी हैं

देखती रहती हैं 

उसकी हर छोटी-बड़ी चपलता 

कुछ आँखों के लिए वो किरकिरी है

लगातार बदलती हवा का

दुष्परिणाम 

इतनी बड़ी लड़की का गली में खेलना..

मतलब, उसे गलत दिशा में धकेलना है !

अच्छा नहीं होता 

लड़कियों को इतनी छूट का मिलना 

इसीकारण, उसकी माँ उसे देती रहती है नसीहतों के घूँट…

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Added by somesh kumar on October 27, 2014 at 11:30am — 10 Comments

अधसूखे घाव

सिसकियों से सींची

टूटी ज़िन्दगी बार-बार जीने के बाद

पंख कटे रक्ताक्त पंछी-सी मैं…

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Added by vijay nikore on October 26, 2014 at 8:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल

2122 1122 22

खुद से यूँ आप वफ़ा कर चलिये

गाह सच को न छुपा कर चलिये

 

मैं इबादत में करूँ सजदे आप

दैर पर शीश नवा कर चलिये

 

दिल में भर जाये सड़न ही न कहीं

नफ़रतें दिल से हटा कर चलिये

 

चलिये महका के ज़माने भर को

प्यार का फूल खिला कर चलिये

 

कीजिये अम्न की कोशिश यों भी

हक़ में इंसाँ के दुआ कर चलिये

 

क्यूँ रहे हुस्न ही पर्दे में जनाब

आप भी नज़रें झुका कर…

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Added by शिज्जु "शकूर" on October 26, 2014 at 8:00pm — 26 Comments

सर्वव्यापी (लघुकथा)

" त्योहारों के मौसम में इनकी बिक्री बहुत बढ़ गयी है " मुस्कुराते दुकानदारों की बातचीत सुनते हुए उसने देखा, फुटपाथ पर बिछे हुए तमाम देवी देवताओं के चित्र इसकी गवाही दे रहे थे |

" भगवान हर जगह होते हैं , उन्हें खोजने की जरुरत नहीं " , मंदिर में सुना ये प्रवचन उसे याद आ गया |

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on October 26, 2014 at 1:00am — 10 Comments

एक कप चाय (लघुकथा)

"यार एक कप चाय मिल जाती तो मजा आ जाता I"  

पतिदेव का हुक्म सुन घर की साफ़ सफाई करके थकी हारी पत्नी रसोईघर की तरफ मुड़ गयी.

साहब सोफे पर बैठ कर टीवी ऑन कर मजे से चैनल बदलते हुए कह रहे थे:

"आज तो यार बहुत थक गए, दीपावली पर बाज़ार जाना, उफ्फ्फ्फ़ ...."

पति की हां में हां मिलाते हुए पत्नी चाय देकर वापिस मुड़ गई और अपने काम में लग गयी !

"मौलिक व अप्रकाशित"…

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Added by Alok Mittal on October 25, 2014 at 11:30pm — 17 Comments

सफाई (लघुकथा) : डॉo विजय शंकर

दावत जोरदार रही , सब ने छक के खाया, खाना था ही इतना बढ़िया , तिस पर बिठा कर पत्तल पर प्रेम से परोस-परोस कर खिलाया गया था। अब कहाँ होतीं हैं ऐसी दावतें। देर रात तक नौकरों ने सारे पत्तल इकठ्ठा करके पास तिराहे के कोने पर, जहां लोग कूड़ा फेंकते थे , फेंक दिये। लोग रात देर तक टहल टहल कर बतियाते रहे , दावत की तारीफ करते रहे। सब कुछ अच्छा था पर किसी एक-दो को अच्छा नहीं लगा। किसी ने सुबह-सुबह इधर-उधर दो एक फोन कर दिये । साढ़े दस तक एक बाबू साहब एक डायरी लेकर आ गए। उन्हें बुलवाया , कहा , अच्छी दावत…

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Added by Dr. Vijai Shanker on October 25, 2014 at 9:30pm — 9 Comments

कहानी : शगुन

माध्यमिक बोर्ड उत्तर पुस्तिकाओं की जंचाई चरम पर थी । मास्साब दनादन काॅपी जांचने में मशगूल थे। एकाएक ! एक काॅपी के दो पन्ने ही चेक कर पाये थे ,कि काॅपी में चिपका सौ का नोट, रोल नम्बर ,विद्यार्थी का नाम और एक टिप्पणी :

"कृपया नम्बर बढा दीजिये।"



अड़ोसी पड़ोसी मास्टर मास्टरनियों ने एक दूसरे को कनखियों से देखा । जैसे मन ही मन कह रहे हो ;

"हाय! ये काॅपी मेरे बंडल में क्यों न निकली ?"



बीस पच्चीस काॅपियों के बाद फिर एक काॅपी में पाँच सौ का नोट और कुछ वैसी ही मिलती…

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Added by Dr.sandhya tiwari on October 25, 2014 at 2:00pm — 3 Comments

क्षणिकाएँ

क्षणिकाएँ

1.

थम गई

गर्जन मेघों की

दामिनी भी

शरमा गयी

सावन की पहली बूँद

उनकी ज़ुल्फ़ों से टकरा गयी

............................................

2.

साया जवानी का

अंजाम देख

घबरा गया

वर्तमान की

टूटी लाठी से

भूतकाल टकरा गया

..............................................

3.

किसकी जुदाई का दंश

पाषाण को रुला गया

लहरों पे झील की

आसमाँ का चाँद

बस तन्हा 

रह गया…

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Added by Sushil Sarna on October 25, 2014 at 2:00pm — 13 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ? // --सौरभ

२१२२  १२१२  २२



इससे बढ़कर कोई अनर्गल क्या ?

पूछिये निर्झरों से - "अविरल क्या ?"



घुल रहा है वजूद तिल-तिल कर

हो रहा है हमें ये अव्वल क्या ?



गीत ग़ज़लें रुबाइयाँ.. मेरी ?

बस तुम्हें पढ़ रहा हूँ, कौशल क्या ?



अब उठो.. चढ़ गया है दिन कितना..

टाट लगने लगा है मखमल क्या !



मित्रता है अगर सरोवर से

छोड़िये सोचते हैं बादल क्या !



अब नये-से-नये ठिकाने हैं..

राजधानी चलें !.. ये चंबल क्या ?



चुप न…

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Added by Saurabh Pandey on October 25, 2014 at 12:00pm — 40 Comments

दोहे-रमेश चौहान

एक दीप तुम द्वार पर, रख आये हो आज ।

अंतस अंधेरा भरा, समझ न आया काज ।।



आज खुशी का पर्व है, मेटो मन संताप ।

अगर खुशी दे ना सको, देते क्यों परिताप ।।



पग पग पीडि़त लोग हैं, निर्धन अरू धनवान ।

पीड़ा मन की छोभ है, मानव का परिधान ।।



काम सीख देना सहज, करना क्या आसान ।

लोग सभी हैं जानते, धरे नही नादान ।।



मन के हारे हार है, मन से तू मत हार ।

काया मन की दास है, करे नही प्रतिकार ।।



बात ज्ञान की है बड़ी, कैसे दे अंजाम ।

काया अति सुकुमार…

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Added by रमेश कुमार चौहान on October 24, 2014 at 9:35pm — 8 Comments

कहानी : मस्जिद का स्पीकर

मस्जिद के स्पीकर से उठने वाले शोर से वो परेशान थे |सुबह सोते वक्त ,दोपहर में रामायण पढ़ते समय या फ़ोन पे गम्भीर हिंदूवादी चर्चा करते हुए उनके कामों में वो स्पीकर से उठने वाली आवज़ उनके कामों को बाधित कर देती |रिटायर्मेंट की पूंजी से यही एक आशियाना लिया था एक महीने पहले पर अब बेटा-बहू और वे स्वयं उलझन में थे कैसे बाहर निकले |कई बार मन हुआ कि अपने मत के संगठनों में शिकायत कर प्रशासनिक दबाब बनाएँ  पर हाल के दिल दहला देने वाले दंगों की यादों ने उनकी हिम्मत छीन ली |इतना पैसा तो था नहीं कि कहीं और…

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Added by somesh kumar on October 24, 2014 at 4:00pm — 10 Comments

दीपावली - चमकती फैलती दीपावली की रोशनी देखो

चमकती, फैलती, दीपावली की रोशनी देखो

जो फैलाई है तुमने इक नजर वो गन्दगी देखो

हमेशा दूसरों में तो निकाली हैं कमी लाखों, ...

पता चल जाएगा सच, जब कभी अपनी कमी देखो

खुशी अपनी जताने के तरीके तो हजारों हैं,

किसी की मुस्कुराती आँखों के पीछे नमी देखो

मसीहा ही समझता है हमारे दर्द के सच को

वो सबके दर्द लेकर खुश हुआ, उसकी खुशी देखो

वो कुदरत की तबाही, बेघरों के दर्द जाने है,

फरिश्ता ही मना सकता है यूँ दीपावली देखो।

^^^^^^^^^सूबे सिंह सुजान…

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Added by सूबे सिंह सुजान on October 23, 2014 at 10:47pm — No Comments

आओ मिलकर दीप जलायें

आओ मिलकर दीप जलायें

अंधकार को दूर भगायें

जगमग जगमग हर घर करना

अन्धकार है सबका हरना

अम्बर से धरती पर तारे

साथ चाँद को नीचे लायें 

अंतर्मन का तमस हरेंगे

कलुषित मन में प्रेम भरेंगे

द्वेष,बुराई और वासना

मिलकर सारे दूर हटायें

उत्सव है यह दीवाली का

सुख समृद्धि और खुशहाली का

भेदभाव आपस के भूलें

मन में शांति दीप जलायें

दीपों की पंक्तियाँ जगाई

धरती अपनी है चमकाई

सद्ज्ञान के दीप…

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Added by Sarita Bhatia on October 23, 2014 at 10:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल (अय्यूब खान "बिस्मिल")

कर दिया आम मिरे इश्क़ का चर्चा देखो

देखो ज़ालिम कि मुहब्बत का तरीक़ा देखो

याद करना कि मिरे दर्द कि शिद्दत क्या थी

खुद को ज़र्रों में कभी तुम जो बिखरता देखो

खूं तमन्ना का मुसलसल यहाँ बहता है अब

मेरी आँखों में है इक दर्द का दरिया देखो

यूँ सुना है कि वो नादिम है जफ़ा पे अपनी

उसके चेहरे पे जफाओं का पसीना देखो

अपने हाथों से सजाके में करूँगा रुखसत

कर लिया है मेने पत्थर का कलेजा देखो

ये हिना सुर्ख ज़रा…

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Added by Ayub Khan "BismiL" on October 23, 2014 at 3:00pm — 7 Comments

लक्ष्मी पूजन (लघुकथा)

एक पल की देरी किये बिना वो तेज़ क़दमों से बड़े-बड़े डग भरती हुई लक्ष्मी मंदिर में पूजा करने चली गयी| रास्ते में एक छोटी सी जिंदा बच्ची कचरे के डिब्बे में जो देख ली थी - शायद सात-आठ दिन पहले ही जन्मी थी|

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on October 22, 2014 at 11:56pm — No Comments

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