For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

तेरे कूंचे से यूं खामोश गुजरकर मैंने

2122   1122   1122  22

तेरे कूंचे से यूं खामोश निकलकर  मैंने 

तेरे दीदार किये रूप बदलकर मैंने 

इक हिमालय  की तरह तुमसे मिला था लेकिन

 पाँव  अब चूम लिए तेरे पिघलकर मैंने 

 भौरों कलियों कि कभी  बात न मुझसे करना 

उम्र अब तक तो है काटी यूं बहलकर मैंने 

आजमाया है हुनर आज किसी बच्चे का

उनसे दिल मांग लिया उनका मचलकर मैंने  

दिल की चाहत तो है इजहारे मुहब्बत करना 

बात पर तुझसे…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 9, 2014 at 4:00pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
हो कितनी स्वछन्द ऐ कविता! (नवगीत 'राज')

धरती से नीले अम्बर तक

बिना किसी व्यवधान

इठलाती तितली सी चंचल

भरती रहे  उड़ान 

ना कोई सीमा ना कोई बंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी करुण रस से आप्लावित   

भीगे आखर से बोझिल   

कभी डूब शिंगार झील में

आती नख- शिख तक झिलमिल  

कभी गरल तू विरह का  पीती  

कभी नेह  मकरंद

हो कितनी स्वछन्द

ऐ कविता!

कभी परों पर लगा बसंती

रंग अबीर गुलाबी लाल

कहीं बिठाती दीये…

Continue

Added by rajesh kumari on October 9, 2014 at 12:50pm — 16 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : गुब्बारा (गणेश जी बागी)

"वाह वाह !! क्या लिखते हैं साहब, एक बार किताब छपने तो दीजिये, देखिये कैसे लोग हाथो हाथ उठा लेते हैं I"

पाण्डुलिपि पलटते हुए प्रकाशक ने "कवि जी" से कहा । खैर, जीवन भर की कमाई और कुछ मित्रों से उधार लेकर किताब छप गयी। 
प्रकाशक ने पाँच सौ प्रतियां "कवि जी" के पास भिजवा दीं । 
झाड़ू लगाते समय पत्नी का भुनभुनाना अब रोज की बात हो गयी ।
.

(मौलिक व अप्रकाशित)

पिछला पोस्ट => …

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 9, 2014 at 11:00am — 25 Comments

विश्‍वदृष्टि दिवस पर रचना

बचें दृष्टि से दृष्टिदोष फैला हुआ है चहुँ दिश।

निकट या दूर दृष्टि सिंहावलोकन हो चहुँ दिश।

दृष्टि लगे या दृष्टि पड़े जब डिढ्या बने विषैली।

तड़ित सदृश झकझोरे मन जब दृष्टि बने पहेली।

गिद्धदृष्टि से आहत जन-जन वक्र दृष्टि से जनपथ।

जन प्रतिनिधि, सत्‍ताधीशों के कर्म अनीति से लथपथ।

रखें दृष्टिगत हो जन-जाग्रति, जन-निनाद, जन-क्रांति।…

Continue

Added by Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul' on October 9, 2014 at 9:16am — 3 Comments

वैदेही

एक बार फिर आओ न वैदेही
फिर राम की बनो सनेही
इस बार उसके साथ वन में मत जाओ
उसे ले चलो किसी शहर की ओर
जहाँ अनगिनत रावण तुम्हारे
अपहरण का स्वप्न सजाये बैठे हैं.
रावण द्वारा अपहृत हो जाओ,
इन नए राक्षसों के विनाश का
तुम फिर से कारण बनो.
एक नया संसार बसाओ
इनका अब संहार कराओ.

तनिक फिर भृकुटि बनालो
राम को फिर से बुला लो.

मौलिक व अप्रकाशित
विजय प्रकाश शर्मा

Added by Dr.Vijay Prakash Sharma on October 8, 2014 at 10:30pm — 18 Comments

चित्त की वृत्ति

चित्त की वृत्ति

चंचल है कदाचित,

यह मचलती

सूर्य के प्रकाश जैसी।



तन विषय विष से भरे

घट को पिए जो

खार के सागर

अहं के ज्वार उगले।



रोक दो वृत्ति

तमस को भेद कर -चित्त में

योग - अनुशासन

तुला पर तोलता है।



वृत्ति की आवृत्ति

निश्छल शून्य जब भी

दिव्य अद्भुत योग से

साक्षात मुक्ति।



आत्मा - परमात्मा

चित्त के उपज जो

एक खोली में रहें जीव जैसे-

काष्ठ में अग्नि,

जल में वाष्प…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on October 8, 2014 at 9:00pm — 14 Comments

पूर्वगाथा ....(विजय निकोर)

पूर्वगाथा

हादसा नया हो न हो

पुरानी चोट से जगह-जगह

दर्द नया

लहर दर्द की, अब दुखी

तब दुखी

कब रुकी

बहती चली गई

मेघ यादों के आँखों में घने

बरसे, बरसे अनमने

तालाब से नदी, सागर

रातों सियाह महासागर बने

कोई नि:सीम अखण्ड विश्वास

तारिकाएँ नभ में कितनी टूटीं

टूटी नहीं किसी के आने की आस

स्नेह की किरणों की उष्मा में बादल

बने फिर घने, फिर बरसे

भीतर सागर…

Continue

Added by vijay nikore on October 8, 2014 at 8:00pm — 14 Comments

गाँव आ गया.....

* गाँव आ गया*



उबड़ खाबड़ सड़कें,गाड़ी

हिचकोले खाती।

सड़क किनारे लगीं सब्जियाँ

मन में बस जातीं

शुद्ध हवा साँस खिल आए।

गाँव आ गया।



पानी लेने ललनाएँ भी

दूर दूर आती।

सिर काँधें पर धरी गगरियाँ

छलक छलक जाती।

गागर कटि संग लचकी जाये।

गाँव आ गया।



लिपे पुते हैं सजे धजे से

आँगन दालानें।

भोली भाली सरल सहज सी

निश्छल मुस्कानें।

आँगन को तुलसी महकाये।

गाँव आ गया।



आम नीम जामुन कनेर के

पग… Continue

Added by seemahari sharma on October 8, 2014 at 4:35pm — 6 Comments

चुटकियों से माँ...................

एक छतरी है जो याद मुझको बहुत आती है|

चुनरी पालने की याद मुझको रोज आती है |।

 

सुधियों से परिपूर्ण,सुध बचपन की आती है |

अंगने के झूले की,याद उस उपवन की आती है|।

 

सायबान की छाया में ..पालने की गोदी में.......

हरकतों पर मेरी दूर खड़ी माँ खूब  मुस्कुराती है।।

 

चुटकियों से माँ, मेरे चेहरे पर सरगम सजाती है |

डूबकर मेरी किलकारियों में ,हर गम भूल जाती है|।

 

माँ मुझे पालना झुलाती है ,कभी गोदी में हिलाती है…

Continue

Added by anand murthy on October 8, 2014 at 4:30pm — 4 Comments

स्नेह की छाँव (लघुकथा)

" बेटा, तुम जब भी शहर से आते हो तो घर में कम और इस पेंड़ के पास ज्यादे समय बिताते हो, घर में मन नही लगता क्या..."

" चाचा, यहाँ बड़ा सुकून मिलता है! याद है आपको जब मैं नर्सरी में पढता था! एक बार वहाँ पौधशाला वाले पौधे बाँट रहे थें, ये आम का पेंड़ मैं वहीं से लाया था, पिता जी पौधों के प्रति मेरा प्रेम देखकर बहुत खुश हुए थें!  इसे उन्होने अपने हाथों से लगाया था और खाद-पानी भी समय-समय से दिया करते थें! इसे वे बहुत प्यार करते थें,  इसीलिए कुछ पल इसकी छाया में बिताना, पिता जी के स्नेह की…

Continue

Added by Pawan Kumar on October 8, 2014 at 12:30pm — 16 Comments

सच! में..आज बहुत बदसूरत है

बहुत सुंदर है

मीठा है बहुत,

बिलकुल मिश्री की तरह

मिल जाता है, कहीं भी

कभी भी, हर तरफ

खोखलापन लिए, समा जाये इसमें

कोई भी,कितना भी.

सच! ही तो है

असत्य जो है

कितना आसान है

इसे पाना, स्वीकारना

खुश हो लेना

चलायमान तो इतना

कि रुकता ही नहीं

अनेकों राहें, उनमे भी कई राहें

पूर्ण सामयिक ही बन बैठा  है.

और वो देखो !.. सत्य

वहीं खड़ा है, अनंत काल से

न हिलता न…

Continue

Added by जितेन्द्र पस्टारिया on October 8, 2014 at 10:02am — 18 Comments

थका-हारा-मेहनतकश आदमी

थका-हारा-मेहनतकश आदमी

थका-हारा-मेहनतकश आदमी कहीं भी सो सकता है

24 घंटे चिल्लाती पौं-पौं पी-पी पू-पू करती

धूल फांकती धुआं चाटती सड़को के फूटपाथों पे भी |

उसके फेफड़े बहुत मज़बूत होते हैं…

Continue

Added by somesh kumar on October 8, 2014 at 12:00am — 7 Comments

लगता है ये त्योहारों का मौसम है..

खुशूबू हैं संगीत हवाएं सरगम हैं

ये आंसू की बूंद नहीं ये शबनम है.

सूरज जब भी ड्यूटी करके घर लौटा
अंधकार में डूबा सारा आलम है,

बडे—बडे तैराक डूबते देखे हैं,
बचकर रहना उसकी आंखें झेलम हैं,

तुम क्या जानो अश्क कहां से आते हैं
उनसे पूछो जिनकी आंखों में गम है,

चौराहों पर पुलिस, लोग सहमे—सहमे
लगता है ये त्योहारों का मौसम है।।


- मौलिक व अप्रकाशित

@ अतुल कुशवाह

Added by atul kushwah on October 7, 2014 at 11:30pm — 5 Comments

दीप जलाएँ....

'दीप जलाएँ....



मावस का तम घना मिटाएँ

आओ सब मिल

दीप जलाएँ।



महकाएँ घर आँगन द्वारे

स्वच्छ करें गलियाँ चौबारे

कटुता के सब महल ढहाएँ

हिलमिलकर यह

पर्व मनाएँ।



अम्बर का तम मिट ना पाया

अनगिन तारे थाल सजाया

तम की शिला भेद जो पाएँ

दीप माल से

धरा सजाएँ।



घर जो उजियारे को तरसे

माँ लक्ष्मी की कृपा यूँ बरसे

दीप पर्व वो सभी मनाएँ

खील बतासे

ना मुरझाएँ।

आओ मिल सब

दीप जलाएँ।

सीमा हरि… Continue

Added by seemahari sharma on October 7, 2014 at 7:18pm — 16 Comments

दीप कोई प्रीत का अंतस जले

**दीप कोई प्रीत का अंतस जले.

 

हो चुकी है रात आधी,

घोर तम मावस पले.

इस अमा में दीप कोई,

प्रीत का अंतस जले.

--

हर तरफ खुशियाँ बिछी हैं,

द्वार तोरण से सजे.

आतिशी होते धमाके,

वाद्य मंगल धुन बजे.

कौन देता ध्यान उनपर,

भूख से मरते भले.

--

बाल दे इक दीप कोई,

रौशनी भी हो यहाँ.

झोपड़ी को राह तकते,

घिर चूका है कहकशाँ.

लूटते सारी ख़ुशी वो,

काट सकते जो…

Continue

Added by harivallabh sharma on October 7, 2014 at 2:07pm — 13 Comments

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराए लोग --- सुलभ अग्निहोत्री

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराये लोग

हमसे, तुमसे, इससे, उससे, सबसे आजिज आये लोग

बड़ी दिलेरी दिखलाते थे बिला वजह हर मौके पर

वक्त पड़ा तो सबसे पहले भागे पूँछ दबाये लोग

भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा

कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग

नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का

सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग

खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर

अपने चारण बने आप ही अपने पर…

Continue

Added by Sulabh Agnihotri on October 7, 2014 at 12:00pm — 13 Comments

एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़-डा० विजय शंकर

अच्छे काम का प्राइज़ हो न हो

बेईमानी एक व्यवस्थित इंटरप्राइज़ है .

बेईमानी स्वयं बड़ी ईमानदारी से होती हैं .

सिद्धांतों , आदर्शों में नहीं , व्यवहार में होती है .

इसीलिये लोग किसी को यह सलाह नहीं देते

कि बेईमान बनो, कहते हैं व्यवहारिक बनो .



व्यवहार का नेटवर्क कितना भी गहन क्यों न हो

व्यवस्था का हर अंग अकेला माना जाता है ,

कोई अदना या सरगना कभी पकड़ा भी जाए ,

वह स्वतन्त्र, अकेला इंटरप्रिन्योर माना जाता है .

सजा सिर्फ उसे होती है ,चाहे जितनी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on October 7, 2014 at 10:36am — 14 Comments

कविता का आगमन

 दूर किसी स्टेशन से

शहर के ट्रैफिक को चीरते हुए

फुटपाथ पर उनींदे पड़े बच्चे का स्पर्श लिए

चौथे माले पर बेरोजगारों के कमरे तक

तुम्हारा आना

 

उन उखड़ी सड़कों से होते हुए

जहाँ की धूल विकास के नारों पर मुस्कुराती है,

बस की पिछली सीढ़ियों से लटकते हुए

बेटिकट पहुँचना मेरे गाँव

और मुझे छज्जे के कोने पर बैठा देख

यक-ब-यक मुस्कुराना  

 

तुम्हारा आना

छिपकली की तरह दीवार पर

आँधियों की तरह…

Continue

Added by आशीष नैथानी 'सलिल' on October 6, 2014 at 11:34pm — 2 Comments

ग़ज़ल- वहशतों का असर न हो जाये

वहशतों का असर न हो जाये

आदमी जानवर न हो जाये



शाम के धुंधलके डराने लगे हैं,

हमसे ओझल नगर न हो जाये



अपने रिश्तों को अपने तक रखना,

मीडिया को खबर न हो जाये



ग़म का पत्थर मुझे दबा देगा,

आपकी हाँ अगर न हो जाये...



आप झुक जाएंगी जवानी में,

टहनियों सी कमर हो जाये



आपका इन्तजार जहर बना,

“सब्र वहशत असर…

Continue

Added by सूबे सिंह सुजान on October 6, 2014 at 9:00pm — 2 Comments

कुर्बानी (लघुकथा)

"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? "
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

.

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by विनय कुमार on October 6, 2014 at 9:00pm — 15 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

*दोहा*बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।*चौपाई*वह फुहार वह साथ…See More
15 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
16 hours ago
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
18 hours ago
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
21 hours ago
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Saturday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Friday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Friday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"आदरणीय  अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय…"
Thursday
Ashok Kumar Raktale commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"चुप रहिए...  वाह  क्या रदीफ़ है, इसे देखकर ही मैं हाज़िर हो गया.  रहना हो भारत में…"
Jul 5
Ashok Kumar Raktale commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।.....सच है अभिनय जीवन की…"
Jul 5

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service