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चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराए लोग --- सुलभ अग्निहोत्री

चौराहे-चौपाल हर जगह मिलते हैं बौराये लोग
हमसे, तुमसे, इससे, उससे, सबसे आजिज आये लोग

बड़ी दिलेरी दिखलाते थे बिला वजह हर मौके पर
वक्त पड़ा तो सबसे पहले भागे पूँछ दबाये लोग

भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा
कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग

नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का
सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग

खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर
अपने चारण बने आप ही अपने पर इतराये लोग

.. सुलभ अग्निहोत्री

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Sulabh Agnihotri on November 23, 2014 at 10:50am

बहुत-बहुत आभार आदरणीय योगराज जी !
गुणीजनों की अनुशंसा आल्हादित करती है, साथ ही सार्थक दिशा-निर्देश भी देती है।
आपने मेरी सभी प्रस्तुतियों को समय दिया इससे और संबल मिला - पुनः आभार!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 3, 2014 at 4:09pm

//भाई का कंधा भी अपने कंधे से उठता देखा
कैसे उसके कद को छांटें, सोच-सोच पगलाये लोग//

बहुत खूब आ० सुलभ अग्निहोत्री जी.

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:26pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:26pm

बहुत-बहुत आभार भाई  Ram Awadh VIshwakarma जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:25pm

बहुत-बहुत आभार भाई  जितेन्द्र 'गीत' जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:25pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीय Dr. Vijai Shanker जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:24pm

बहुत-बहुत आभार आदरणीया rajesh kumari  जी !

Comment by Sulabh Agnihotri on October 16, 2014 at 1:23pm

बहुत-बहुत आभार भाई  narendrasinh chauhan जी !

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 10, 2014 at 4:37pm

सुलभ जी

बहुत उम्दा i

नुक्कड़-नुक्कड़ ढोल पीटते अपने सूरज होने का
सूरज जब निकला तो बरबस चुंधियाये अँधराये लोग

खुद ही तमगे गढ़े टांककर खुद ही अपने सीने पर
अपने चारण बने आप ही अपने पर इतराये लोग

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 8, 2014 at 2:28pm

लाजबाब गजल बधाई

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