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अतुकांत कविता

सोचा था आईने की तरह

साफ़ रखूँगी अपना चेहरा

पर कुछ तो है जो छिपा जाती हूँ

यूँ भाव चेहरे के बदल लेती हूँ

कि कहीं प्रतीयमान न हो जाये|



बोलती थी कभी बेधड़क हो

कुछ तो है जो किसी कोने में

मौनव्रत रख बैठ जाती हूँ

कि कही कुछ प्रतीप न हो जाये|



आँखों में भी दिखता था कभी

दूसरे की गलत बातो का प्रतिकार

पर किसी का तो डर है जो

अब आँखों को झुका लेती हूँ…

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Added by savitamishra on July 30, 2014 at 3:30pm — 20 Comments

एक ग़ज़ल..दिन सुहाने आ गए.

*एक ग़ज़ल 



बारिशों का दौर आया दिन सुहाने आ गए है.

जल भरे बादल धरा को गुदगुदाने आ गए हैं.

++

झड़ चुकीं थीं पत्तियां सब दिख रहीं वीरान सी वो,

फूल फिर से डालियों पर...... मुस्कुराने आ गए है.

++

मंदिरों ने प्रार्थना की मस्जिदों ने दी अजानें,

रहमतों को मेघ लेकर जल गिराने आ गए हैं.

++

भीगते सारे महल…

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Added by harivallabh sharma on July 30, 2014 at 11:00am — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
( ग़ज़ल )पर यहीं पर करार सा है कुछ -- गिरिराज भंडारी

2122    1212  22 /112  

पर यहीं  पर करार सा  है कुछ

****************************

उजड़ा  उजड़ा दियार सा है कुछ

पर यहीं  पर करार सा  है कुछ 

 

गर्मियाँ  खून  में  कहाँ  बाक़ी

गर्म हूँ , तो बुखार सा  है कुछ

 

खूब बोले थे खुल के, क्यूँ आखिर

बच गया फिर, उधार सा है कुछ

 

दिल को  बेताबियाँ नहीं  डसतीं

प्यार है, या कि प्यार सा है कुछ

 

फूल कलियों में  खूब  चर्चा  है

अब ख़िंज़ा मे उतार सा  है…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 30, 2014 at 10:30am — 26 Comments

बचपन के जज़्बात

जाने कहाँ विलुप्त हो गए बचपन के एहसास

हमसे बहुत दूर हो गए ममता भरे हाथ।

        

जिस प्यार के तले सीखा था जीने का अंदाज

अकेला छोड़ उड़ गए सुनहरे परवाज़

        

अपने जज़्बातों का मुकाम पाने को

बेताब है अपना नया घरौदा बनाने को

       

क्या पता किससे मिले, बिछड़े किसी से

कौन कहेगा तू रहना खुशी से,

        

जमाने की हाफा-दाफी ने भुला दिया-

अपनों के प्यार की दौलत को

ऊंचा उठने के मनोरथ ने मिटा…

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Added by kalpna mishra bajpai on July 29, 2014 at 11:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल- लोगों को ईद पर खुशी होगी।

चाँद की आँख में नमी होगी

लोगों को ईद पर खुशी होगी

 

चाँद हर रोज देखता है तुम्हें,

आपकी आज बेबसी  होगी

 

जिंदगी रोज खून से लथपथ,

आज कैसे ये जिंदगी होगी

 

गर्दनें काट कर दिखाते हो,

क्या खुशी फिर भी ईद की होगी

 

अन्ध-विश्वास से लडाई है,

अब लडाई ये रोकनी होगी 

 

छोड दो अपना-अपना कहना उसे,

इस तरह खत्म दुश्मनी होगी

 

आज इनसानियत है खतरे में,

क्या वजह है ये सोचनी…

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Added by सूबे सिंह सुजान on July 29, 2014 at 10:00pm — 18 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे (ग़ज़ल 'राज')

२२   २२  २२  २२  २२  २२  २२  २२  

अवशेष चिनारों के तुमसे आफ़ात पुरानी  कह देंगे

हालात वहाँ कैसे बिगड़े खुद अपनी जुबानी कह देंगे

 

 दीवारें धज्जी धज्जी सी हर छत दिखती उधड़ी उधड़ी                     

 आसार लहू के अक्स तुम्हें बेख़ौफ़ कहानी कह देंगे

 

दिखते पर्वत सहमे-सहमे औ गुम-सुम से झरने नदियाँ   

कब-कब दामन में आग लगी कब बरसा पानी कह देंगे  

 

जो साथ जला करते थे कभी आबाद रहे जिनसे आँगन

वो आज अल्हेदा चूल्हे खुद दिल की…

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Added by rajesh kumari on July 29, 2014 at 9:48pm — 21 Comments

श्राद्ध (लघुकथा)

"अरे पनीर की सब्ज़ी कहा है ? जल्दी लाओ , यहाँ ख़त्म हो गयी |"

बड़े भैया ने आवाज़ लगायी और आगे बढ़ गए | कई पंगतों में लोग बैठ कर भोजन कर रहे थे , काफी गहमागहमी थी दरवाजे पर | सारे रिश्तेदार और अगल बगल के गांव से भी लोग खाने आये हुए थे | थोड़ी दूर ज़मीन पर कुछ और लोग भी बैठे थे जो हर पंगत के उठने के बाद पत्तल वगैरह बटोरते , उसे ले जाकर किनारे रख देते और जो कुछ भी खाने लायक बचा होता था , वो सब उनके बर्तनों में रख लेते थे |

खटिया पर लेटे हुए बाबूजी सब देख रहे थे | उसके दिमाग में पिछले कुछ…

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Added by विनय कुमार on July 29, 2014 at 5:00pm — 21 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
दादी, हामिद और ईद (लघुकथा) // --सौरभ

हामिद अब बड़ा हो गया है. अच्छा कमाता है. ग़ल्फ़ में है न आजकल !

इस बार की ईद में हामिद वहीं से ’फूड-प्रोसेसर’ ले आया है, कुछ और बुढिया गयी अपनी दादी अमीना के लिए !

 

ममता में अघायी पगली की दोनों आँखें रह-रह कर गंगा-जमुना हुई जा रही हैं. बार-बार आशीषों से नवाज़ रही है बुढिया. अमीना को आजभी वो ईद खूब याद है जब हामिद उसके लिए ईदग़ाह के मेले से चिमटा मोल ले आया था. हामिद का वो चिमटा आज भी उसकी ’जान’ है.

".. कितना खयाल रखता है हामिद ! .. अब उसे रसोई के ’बखत’ जियादा जूझना नहीं…

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Added by Saurabh Pandey on July 29, 2014 at 3:00pm — 61 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुमनाम पिथौरागढ़ी

२२  २२  २२   २२

 

सन्नाटा भी पसरा सा है

उसका कमरा बिखरा सा है

 

अब तुम पास नहीं हो ,शायद

उसका मुखड़ा उतरा सा है

 

बुत  से कैसा कहना सुनना

हाफ़िज़ भी तो बहरा सा है

 

जीवन हुआ दिसंबर जैसा

आँखों में क्यों कुहरा सा है

 

देख के तुझे लगता है ये

चाँद कांच का कतरा सा है

 

गुमनाम बना लो घर कोई

अब खंजर का खतरा सा है

 

मौलिक व अप्रकाशित

 गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on July 29, 2014 at 2:30pm — 5 Comments

पहचान...(लघुकथा)

बचपन से देवेश को एक तिरष्कार, जो कभी मोहल्ले के दूसरे बच्चों या उनके पालकों द्वारा झिड़की भरे अंदाज से मिलता रहा था. इस वजह से देवेश का बचपन हमेशा एक डर और निरंतर टूटे  हुए आत्मबल में गुजरा. इन्ही मापदंडों के अनुसार अपनी पहचान को तरसते, आज वो बड़ा हो चुका है. निकला है एक सामजिक कार्यक्रम में शामिल होने को, अपनी एक पहचान और बहुत सारा आत्मबल लेकर.... भीड़ में जो उसे पहचानते है वो लोग उसे अनदेखा कर रहे थे . और जो उसे नही पहचानते , वो लोग जानने की कोशिश में लगे हुए है.....

“अरे..!…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on July 29, 2014 at 11:16am — 24 Comments

कुण्डलिया छंद - लक्ष्मण लडीवाला

ईद मनाये हम सभी गले मिले सब आज

सर्व धर्म सद्भाव के अकबर थे सरताज |

अकबर थे सरताज, सभी का मान बढाया

नवरत्नों के साथ, गर्व से राज चलाया

सभी तीज त्यौहार सुखद अनुभूति कराये

बढे ह्रदय सद्भाव सभी अब ईद मनाये |…

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Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments

दोहे।

दिनकर मनमाना हुआ, गई धरा जब ऊब।

सूर्य रश्मियाँ रोक के, ......मेघा बरसे खूब।



त्राही दुनियां में मची, संकट में सब जीव।

बरखा रानी आ गई, .....कहे पपीहा पीव।



झूम रहे पत्ते सभी, पवन गा रही गीत।

वन्दन बरखा का करें, निभा रहें हैं रीत।



रंग धरा के खिल गए, शीतल पड़ी फुहार।

वन कानन नन्दन हुए , झूम उठा संसार।



पुष्प सभी हैं खिल उठे, जल की पड़ी फुहार।

भ्रमरों ने गुंजन किया, तितली ने मनुहार।



जल निमग्न धरती हुई, जन जीवन फिर…

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Added by seemahari sharma on July 29, 2014 at 10:30am — 10 Comments

क्या है जो रोज़ गुनाह करते हो --डा० विजय शंकर

क्या किसी भी सजा से नहीं डरते हो

क्यों रोज़ गुनाह पे गुनाह करते हो

दुनियाँ जहाँन की सब खबर रखते हो

खुद क्या हो बिलकुल बेखबर रहते हो

अपने कर्मों पे नज़र नहीं रखते हो

कौन क्या कर रहा परेशान रहते हो

औरों के खजाने पे नज़र रखते हो

कभी चोरी के नोट अपने गिनते हो

शेर की खाल में गीदड़ नज़र आते हो

घर में आईने बिलकुल नहीं रखते हो

बैसाखियाँ ले कर गुजर बसर करते हो

दौड़ में सबसे आगे हो, दम भरते हो

ईश्वर की दुनियाँ को बहुत बनाते हो

भगवान से… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on July 29, 2014 at 10:09am — 12 Comments

बैठक

याद आता है 

वो अपना दो कमरे का घर 

जो दिन मे 

पहला वाला कमरा 

बन जाता था 

बैठक .... 

बड़े करीने से लगा होता था 

तख़्ता, लकड़ी वाली कुर्सी 

और टूटे हुये स्टूल पर रखा 

होता था उषा का पंखा

आलमारी मे होता था 

बड़ा सा मरफ़ी का 

रेडियो ... 

वही हमारे लिए टी0वी0 था 

सी0डी0 था और था होम थियेटर 

कूदते फुदकते हुये 

कभी कुर्सी पर बैठना 

कभी तख्ते पर चढ़ना 

पापा की गोद मे मचलना…

Continue

Added by Amod Kumar Srivastava on July 28, 2014 at 10:06pm — 11 Comments

गजल- रंग पानी सा....

गजल- रंग पानी सा....

बह्र - 2122, 2122, 2122



नारि ही जब शक्ति की दुर्गा-सती है।

आज कल हालात की मारी हुयी है।।



काल बन भस्मासुरों को भस्म कर दें,

निर्भया बन वह सड़क पर लुट रही है।



विष्णु-शिव-ब्रह्मा हुआ है आदमी अब,

सृ-िष्ट - नारी की कहानी त्रासदी है।



नित गरीबी आग में पकती रही पर,

भूख, बच्चों की पढायी सालती है।



रक्त नर का पी कपाली बन लड़ी जो,

खून में लथपथ शिवानी सो रही है।…



Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 28, 2014 at 9:00pm — 9 Comments

मुक्तक

1

न्याय पर जनतंत्र जन कल्याण पर,

अर्थ अवसरवाद का चेहरा लगा है/

रोशनी सर्वत्र जाने में विवश है,

बादलोँ का सूर्य पर पहरा लगा है/

2

तुम अँधेरे पंथ पर क्यों चल रहे,

रोशनी के जाल हमने तिर दिये हैं/

रह गई जो कालिमा दीपक तले,

उन अँधेरोँ से तो दीपक पल रहे हैं/

3

नीँद उड़ती जा रही है,रात रिसती रह गई/

धार में नौका ना जाने किस दिशा को गह गई/

उड़ गये बादल छलक पाताल का पानी गया,

फिर बिगड़ते सन्तुलन की बात धरती कह गई/

4

कहीं…

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Added by पं. प्रेम नारायण दीक्षित "प्रेम" on July 28, 2014 at 8:30pm — 4 Comments

गंगा के नाले (लघु कथा) // --शुभ्रांशु पाण्डॆय

"अरे वाह आज तो मजा आ गया", रमेश घर में घुसते ही चहकते हुये बोला, ".. दुकानदार ने सामान का बिल बनाते समय साढ़े पाँच सौ रुपये कम जोड़े !"

“पापा, फ़िर तो आपको वो लौटा देना था न !”, बेटी नेहा ने अपनी आँखो को और बडा़ करते हुये कहा.

“पागल हो क्या ?”, मानों उसकी नादानी पर हँसते हुये रमेश ने कहा, “.... आज हम पार्टी करेंगे…”

 

नेहा के मन में टीचर की बतायी बातें कौंध गयीं, “गंगा में तमाम नदियाँ ही नहीं मिलतीं, शहरों के गंदे नाले भी गिरते हैं.”

उसे लगा, वो गंगा में…

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Added by Shubhranshu Pandey on July 28, 2014 at 8:00pm — 12 Comments

इश्क करना भी हुनर इक हो गया

२१२२  ११२२  २१२

तेरी बातों से बड़ा हैरान हूँ

जिन्दगी मेरी बड़ा परेशान हूँ

क्या खता है, है सही क्या, क्या गलत

बेखबर इन से अभी नादान हूँ

मेरी खातिर है नहीं इक पल उन्हें 

जो कहा करते थे उनकी जान हूँ

इश्क करना भी हुनर इक  हो गया

इस हुनर से तो अभी अनजान हूँ

सांस चलती है तो जिंदा कहते सब

पर खबर मुझको कि मैं बेजान हूँ

है न चाहत का सबब मुझको पता

धड़कने कहती हैं बस  कुरवान…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 28, 2014 at 3:25pm — 10 Comments

दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

दोहे // प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा //

-----------------------------------------

ये मात्र दोहे हैं. चिकित्सा सलाह नहीं .

------------------------------------------

मानस चरचा हो रही सुनो लगा कर ध्यान

भव सागर तरिहो सभी इसको पक्का जान

-------------------------------------------

मटर पराठा खा गये  बैठे जितने लोग

लौकी सेवन नित करें भागें सगरे रोग

--------------------------------------

लौकी रस इक्कीस  दिन प्रातः पी लें…

Continue

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on July 28, 2014 at 1:45pm — 14 Comments

बिल्ली सी कविताएँ --- अरुण श्री !

मैं चाहता हूँ कि बिल्ली सी हों मेरी कविताएँ !

 

क्योकि -

युद्ध जीत कर लौटा राजा भूल जाता है -

कि अनाथ और विधवाएँ भी हैं उसके युद्ध का परिणाम !

लोहा गलाने वाली आग की जरुरत चूल्हों में है अब !

एक समय तलवार से महत्वपूर्ण हो जातीं है दरातियाँ !

 

क्योंकि -

नई माँ रसोई खुली छोड़ असमय सो जाती है अक्सर !

कहीं आदत न बन जाए दुधमुहें की भूख भूल जाना !

कच्ची नींद टूट सकती है बर्तनों की आवाज से भी ,

दाईत्वबोध पैदा कर सकता…

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Added by Arun Sri on July 28, 2014 at 10:47am — 24 Comments

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