For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

घनाक्षरी

तोहरे दुआरे मात, खड़े दोउ कर जोरे,

अब तो आप आइके, दरस दिखाइए |

तोहरी शरण आया, तेरा ये कपूत मात,

सेवक को मां अपनी, शरण लगाइए |

इक आस तोरी मात, दूजा को सहाई मोर,

अइसे न आप मोरी, सुधि बिसराइए |…

Continue

Added by बृजेश नीरज on April 17, 2013 at 10:30pm — 14 Comments

ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

हे लक्ष्मण तू बड़भागा है श्री राम शरण में रहता है ,

ये भरत अभागा पापी है प्रभु से वियोग जो सहता है !

 

प्रभु इच्छा से ही संभव है प्रभु सेवा का अवसर मिलना ,

हैं पुण्य प्रताप तेरे लक्ष्मण प्रभु सेवा अमृत फल चखना ,

मेरा उर व्यथित होकर के क्षण क्षण ये मुझसे कहता है !

ये भरत अभागा पापी है प्रभु से…

Continue

Added by shikha kaushik on April 17, 2013 at 10:00pm — 5 Comments

‘‘गजल‘‘

 ‘‘गजल‘‘

एक प्रयास के फलस्वरूप प्रस्तुत है।

वज्न......1222 1222 1222 1222

हमारी जिन्दगी का जब सलीका सादगी नम है।

यहां बन्दे कयामत हैं तभी तो बन्दगी कम है।।1

सुना है शाम से पहले बनायें पाक दामन को।

अभी तो आपका *दम बस यहां शर्मिन्दगी गम है।।2......*अहंकार

कहो तो हम वजू करके नमाजी बन करें सजदा।

खुदा को गर गुनाही का बताओ गन्दगी *थम है।।3.....*रूकना

बने हम पन्च वक्ता पीर समझाए मुहम्मद को।

तभी तो…

Continue

Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on April 17, 2013 at 7:52pm — 9 Comments

कहने से डरते हैं आशिक चाह छुपाए होते हैं

कहने से डरते हैं आशिक चाह छुपाए होते हैं

दिल के इक कोने मे अक्सर आह छुपाए होते हैं

दिखते हैं आज़ाद परिंदे पर लौटें दिन ढलते ही

घर औ बच्चों की वो भी परवाह छुपाए होते हैं

हमको है मालूम जमाना छेड़ेगा इन ज़ख़्मों को

प्यारी सी मुस्कान में उनकी थाह छुपाए होते हैं

मजबूरी में जो तुमसे डंडे खाते हैं मूक बने

भूल नहीं वो तूफ़ानी उत्साह छुपाए होते हैं

दर दर भटके खूब युवा थक हार गये चलते चलते

भ्रष्टाचारी मंज़िल की हर राह…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 17, 2013 at 2:59pm — 8 Comments

गरमी आ गई भाईया

 गरमी आ गई भाईया

सूरज आंखे तरेर रहा ले, हाथो मे अग्नि बाण ।

बिना कवच जो निकले बाहर, ये…

Continue

Added by बसंत नेमा on April 17, 2013 at 2:00pm — 6 Comments

माँ के बिना सब कुछ अधूरा |

जो जग में सब को ले आती , जननी महिमा अपरम्पार  |
जग में यदि माँ ही ना होती , चल ना पाता ये संसार |
जलचर थलचर या नभचर हो , माँ सबकी  है पालनहार |
जननी से ही ये दुनिया है , ना  तो सब कुछ है बेकार |…
Continue

Added by Shyam Narain Verma on April 17, 2013 at 11:41am — 3 Comments

एक बार वो लड़की बनकर तो देखे.....

तेरे सपनो की कोई औकात नहीं 

मेरे सपने हैं बहुत बड़े

मुझसे जब यह बात कही उसने 

मेरे दिल ने बस एक बात कही......

एक बार वो लड़की बनकर तो देखे

खुद- ब- खुद समझ जायेगा मेरी मज़बूरी को

क्यों…

Continue

Added by Sonam Saini on April 17, 2013 at 10:30am — 8 Comments

हास्य - व्यंग . " अंगुली पर नचाती थी "

 हास्य - व्यंग

 "अंगुली पर नचाती थी"

मेरे एक दोस्त ने, किस्सा कुछ यूँ सुनाया ,

एक मामले में बीमा अफ़सर ने , घोटाला था पाया |

बात, इस हद तक थी बिगड़ी ,

इसमें लगी, उन्हें साजिश कुछ तगड़ी |

मामला था, कि एक महिला की अंगुली कटी ,

अंगुली थी मानो , हीरे से पटी |

अंगुली का हुआ लाखों भुगतान…

Continue

Added by अशोक कत्याल "अश्क" on April 17, 2013 at 8:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक कील, एक तसवीर

हक़ीकत की सफेद दीवार पर

तजुर्बों की भीड़ ने,

अहसास नाम की

नन्हीं सी कील ठोक दी थी.

मैं,

अरमानो की इस टेढ़ी-मेढ़ी गली से

यूँ ही गुजर रहा था –

अटपटा सा लगा

तो सोचा,

क्यों न काँच से मढ़े हुए

इस “ मैं “ को

उस पर टाँग दूँ –

गली में भटकने वालों का

इसे तोड़ने और जोड़ने में

शायद मन बहल जाए.

न जाने उस तसवीर के

कितने ही टुकड़े हो गये होंगे,

कितने ही असावधानी तमाशबीन

उन टुकड़ों की नुकीली धार से,

लहू-लुहान हुए होंगे !

मुझे तो अब…

Continue

Added by sharadindu mukerji on April 17, 2013 at 2:44am — 13 Comments

हमको नवाज़ी ख़ुदा ने मकसूम शख्सियत ,

 

  Thai Massage

फरमाबरदार बनूँ औलाद या शौहर वफादार ,

औरत की नज़र में हर मर्द है बेकार .



करता अदा हर फ़र्ज़ हूँ मक़बूलियत  के साथ ,

माँ की करूँ सेवा टहल ,बेगम को दे पगार .

 

मनसबी रखी रहे बाहर मेरे घर से ,

चौखट पे कदम रखते ही इनकी करो मनुहार .

 

फैयाज़ी मेरे खून में ,फरहत है फैमिली ,

फरमाइशें पूरी करूँ ,ये फिर भी हैं बेजार .



हमको नवाज़ी ख़ुदा ने मकसूम शख्सियत…

Continue

Added by shalini kaushik on April 17, 2013 at 1:36am — 6 Comments

आरती



मैं इतनी धार्मिक प्रवृत्ति की नहीं हूँ लेकिन नास्तिक भी नहीं हूँ . सारे धार्मिक त्योहार पूरी निष्ठा के साथ मनाती हूँ . मुझे भगवान की आरती सुनना बेहद अच्छा लगता है .

पिछ्ले साल की बात है . दिल्ली से हम लखनऊ रहने आ गये . शारदीय नवरात्र चल रहा था . हम पास के एक मंदिर में माँ दुर्गा की पूजा करने गये . आरती जब शुरू हुई तो आँखें बंद कर मैं पूरी तन्मयता से उसमें लीन हो गयी . आरती समाप्त हो गयी लेकिन मैं आँखें मूँदे ध्यानमग्न रही , तभी पण्डाल में हड़कम्प मच गया . मैं कुछ समझ पाती इससे पहले…

Continue

Added by coontee mukerji on April 17, 2013 at 12:14am — 7 Comments

'है पहचानना'

उद्विग्न चित्त
पहचान है
असिद्ध बुद्धि की।
आता कहाँ उबाल
सिद्ध दल में
बटलोई की।
स्वरूप में ही
स्थिति होना
है स्वस्थ होना।
निज मान,अपमान
आनन्द की चाबी
औरों के हाथ
क्या देना।
चिरानन्द है
'स्वयं' में
बस है पहचानना।
-विन्दु
(मौलिक,अप्रकाशित)

Added by Vindu Babu on April 16, 2013 at 11:24pm — 10 Comments

कविता : धर्म की हत्या

हम कहीं भी महफ़ूज नहीं है

वो कभी भी, कहीं भी, हमारी हत्या कर सकते हैं

हम इंसान हैं

वो आतंकवादी

 

पर वो नहीं जानते

कि हम पर चलाई गई हर गोली

उनके धर्म की छाती में जाकर धँसती है

 

हम फिर पैदा हो जायेगें

सौ मरेंगे तो हजार और पैदा हो जायेंगे

 

पर उनका धर्म एक बार मर गया

तो हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जायेगा

 

धर्म जान लेने या देने से नहीं

जान बचाने से फैलता है

 

और ख़ुदा,…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 16, 2013 at 11:08pm — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
तुम कैसे श्रेष्ठ ? // गणेश जी "बागी"

हे पूज्य !

आप ग़लत थे,

मैं सही था |

आप के कहे को

मान दिया था,

अनुचित आदेश को

मान लिया था |

आप पर विश्वास था,

मिला था आशीर्वाद-

एक अफलित आशीर्वाद |

हे पूज्य!

आप ग़लत थे,

मैं सही था |

आपने तोड़ा था विश्वास,

किंचित, मुझे नही मानना था

संकुचित आदेश,

मुझे नही देना था-

अंगूठा,

दिखला देना था-

अंगूठा,



क्या होता ?

नालायक कहलाता !

अल्प काल के…

Continue

Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 16, 2013 at 8:30pm — 23 Comments

"हास्य घनाक्षरी"

1-

लड़ती पीट तालियाँ, हज़ार देती गालियाँ,

अच्छे भले दिमाग का, दही कर देती है |

हर पल तंग करे, उल्टे पुल्टे कर्म करे,

मंगल जैसे ग्रह को, शनि कर देती है |

यदि देख लिया पैसा, पूछे नही कि है कैसा,

झट-पट बटुए को, खाली कर देती है…

Continue

Added by ram shiromani pathak on April 16, 2013 at 6:13pm — 6 Comments

किसका दोष है ??

रोज़ होती सड़क दुर्घटनायें

कभी ये, कभी वो…

Continue

Added by नादिर ख़ान on April 16, 2013 at 5:52pm — 5 Comments

एक नन्हीं प्यारी चिड़िया...गजल

गजल...        

 

एक नन्हीं प्यारी चिड़िया, आज देखी बाग में।

चोंच से चूज़े को भोजन, कण चुगाती बाग में।

 

काँप जाती थी वो थर-थर, होती जब आहट कोई,

झाड़ियों के झुंड में, खुद को छिपाती बाग में।

 

ढूंढती दाना कभी, पानी कभी, तिनका कभी,

एक तरु पर नीड़ अपना, बुन रही थी बाग में।

 

खेलते बालक भी थे, हैरान उसको देखकर,

आज ही उनको दिखी थी, वो फुदकती बाग में।

 

नस्ल उसकी देश से अब, लुप्त होती जा रही,

बनके…

Continue

Added by कल्पना रामानी on April 16, 2013 at 5:30pm — 5 Comments

नेह की पाती

मेरी नींदों मे ख्वाब बन कर रहते थे,

वो तुम ही तो थे ,

जिसके सपने मेरी आँखों ने सँजोये थे,

वो तुम ही तो थे ,

जो रहता था मेरे दिल की किसी ,…

Continue

Added by annapurna bajpai on April 16, 2013 at 4:00pm — 8 Comments

बनारस में एक नयी पहल " सुखनवर "

वैसे तो ग़ज़ल का अपना स्वर्णिम इतिहास रहा है , परन्तु आज हिंदी जनमानस में भी ग़ज़लों ने अपनी गहरी पैठ बना ली है । ग़ालिब , मीर , फैज़ , दाग जैसे नाम आज ग़ज़ल को पसंद करने वाले के लिए अनजाने नहीं । साहित्य में भी ग़ज़लों ने नए पुराने लेखकों को अपनी और आकर्षित किया है । आज समकालीन ग़ज़ल लेखन में एक उर्जावान पीढी सक्रिय है । बनारस में नजीर बनारसी हुए तो जयशंकर…

Continue

Added by Abhinav Arun on April 16, 2013 at 3:00pm — 13 Comments

दो घनाक्षरियां / संदीप कुमार पटेल

(1)

सुनो मृगनयनी है चाँद जैसा मुख इसे,

ओढनी ओढ़ा के आज, थोडा शरमाइए

घूरते क्यूँ हमें ऐसे, मैं हूँ जानवर जैसे

लोग सब देख रहे, नज़रें हटाइए

ऐसे ही खड़ी हो काहे, गघरी झुलात कहो

प्रेम है यदि तो फिर, उसे न छुपाइए

और यदि है नहीं तो, काम एक कीजिए जी

मुझे घूरने से अच्छा, नीर भर लाइए । 

(2)

मिले कल नेता जी तो , पूछ लिया हमने ये

कद्दू जैसी तोंद का ये, राज तो बताइए

दुबले थे आप कुर्सी मिलने से पहले तो

हुआ ये कमाल कैसे,…

Continue

Added by SANDEEP KUMAR PATEL on April 16, 2013 at 12:30pm — 14 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14
Chetan Prakash commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय,  अशोक  रक्ताले साहब, नमस्कार  !  लेकिन  यह कैसी "रिमझिम…"
Jul 14
Profile IconShyamsundar Chatterjee , Alamseti ajita kumar and Dr. Mohd Israr joined Open Books Online
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत रचना की सारगर्भित समीक्षा कर आपने मेरे सृजन कार्य को सार्थकता…"
Jul 11
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"परम आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम - सर सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"वायव्य दशा के प्रस्तुतीकरण के क्रम में बना विश्वास प्रस्तुति की शाब्दिकता को स्थापित करता हुआ सफल…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा सप्तक. . . .मंच
"संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.  कई…"
Jul 10

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा…"
Jul 10

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service