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April 2012 Blog Posts


मुख्य प्रबंधक
लघु कथा :- गिद्ध

लघु कथा :- गिद्ध…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 25, 2012 at 11:46am — 42 Comments

कौन हूँ मैं... ??

कौन हूँ मैं... 

_______



आज फिर से वो ही ख्याल आया हैं,

आत्मा से उभर के एक सवाल आया हैं,

कि मैं कौन हूँ...??

कौन हूँ मैं... ?



हैं रंगमंच जो दुनिया ये,

क्यूँ अपने किरदार को भूल रहा,

जीना था औरो की खातिर,

क्यूँ अपने दुखों में झूल रहा,

क्यूँ मुझमें हैं अनबुझी प्यास,

क्यूँ खुशियों को मैं ढूँढ रहा,

अनभिज्ञ हूँ…

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Added by praveen on April 24, 2012 at 9:00pm — 10 Comments

निष्काम कर्म

        ज्वालाशर छंद

१६ ,१५ पर यति अंत में दो गुरू (२२)

**********************************************

 

संकीर्णताओं से बचाती, निष्काम कर्म भावना ही.

हो जायें प्रवृत्त मनुज सभी, अधार हो सदभावना ही.

कर्तव्य का बस बोध होवे,इच्छा न कुछ पाने की हो,

संकल्पना कहती सदा ये,आशा सुधर जाने की हो.

 कोई मार्ग खोजें मुक्ति का,आशय जीवन का यही है.

सद्कर्म से सम्भव बने यह,विचार दर्शन का सही…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 23, 2012 at 3:30pm — 14 Comments

आगॆ बढ़ कॆ बता,,,,

आगॆ बढ़ कॆ बता,,,,

------------------------------------

 हिम्मत है तॊ आगॆ बढ़ कॆ बता ॥

बिहार वाली ट्रॆन मॆं चढ़ कॆ बता ॥१॥



बिना टिकट गांव चला जायॆगा,…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 23, 2012 at 1:30pm — 28 Comments

gazal...

पतंगों को यूँ  ढील मत देना.

कभी झूठी दलील मत देना.
हालात बना देंगे मजबूर तुझे.
नादान हांथों में कील मत देना.
 दुनिया है ये ताड़ बना सकती है 
इसकी हथेली पर तील मत देना
जिरह करनी है अपने-आप से गर.
खुद को जज्बातों का वकील मत देना.
तुम्हारे घर भी इज्जत का सामान है!
सरे -राह  इशारे  अश्लील मत देना.
अविनाश बागडे.

Added by AVINASH S BAGDE on April 23, 2012 at 10:10am — 10 Comments

दोहा सलिला: अंगरेजी में खाँसते... --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

अंगरेजी में खाँसते...

संजीव 'सलिल'

*

अंगरेजी में खाँसते, समझें खुद को  श्रेष्ठ.

हिंदी की अवहेलना, समझ न पायें नेष्ठ..

*

टेबल याने सारणी, टेबल माने मेज.

बैड बुरा माने 'सलिल', या समझें हम सेज..

*

जिलाधीश लगता कठिन, सरल कलेक्टर शब्द.

भारतीय अंग्रेज की, सोच करे बेशब्द..

*

नोट लिखें या गिन रखें, कौन बताये मीत?

हिन्दी को मत भूलिए, गा अंगरेजी गीत..

*

जीते जी माँ ममी हैं, और पिता हैं डैड.

जिस भाषा में…

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Added by sanjiv verma 'salil' on April 23, 2012 at 7:10am — 15 Comments

ज़िन्दगी खुद में ही तो एक जंग का एलान है.

ज़िन्दों और परिंदों का बस एक ही पहचान है.
ना ही थकना, ना ही रुकना बस और बस उड़ान है.
एक जगह जो रुक गया तो रुक गया उसका सफ़र.
इसलिए ही अब तो मंजिल रोज़ एक मुकाम है.
कौन कहता है जहां में ज़िंदा रहना है कठिन.
आदमी में है ही क्या एक जिस्म और एक जान है.
मौसमे बारिश गिरा देता है कितने आशियाँ .
हिम्मते मरदा है जो कि हर तरफ मकान है.
ज़िन्दगी में जंग ना तो क्या मज़ा मापतपुरी.
ज़िन्दगी खुद में ही तो एक जंग का एलान है.
          ----- सतीश मापतपुरी

Added by satish mapatpuri on April 23, 2012 at 3:58am — 10 Comments

इतनी रात गयॆ,,,,,,,,,,

इतनी रात गयॆ,,,

-------------------

इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं, एकांकी आना ठीक नहीं ॥

आयॆ हॊ तॊ ठहरॊ रात गुज़रनॆ दॊ, अब वापस जाना ठीक नहीं ॥



मिलना चाहा तुमसॆ पर,आस अधूरी रही…

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Added by कवि - राज बुन्दॆली on April 22, 2012 at 6:30pm — 12 Comments

"बनारस"

कुछ दिनों पहले घाट पर अपने मित्र मनोज मयंक जी के साथ बैठा था| रात हो चली थी और घाटों के किनारे लगी हाई मॉइस्ट बत्तियाँ गंगाजल में सुन्दर प्रतिबिम्ब बना रही थीं और मेरे मन में कुछ उपजने लगा जो आपके साथ साझा कर रहा हूँ| इस ग़ज़ल को वास्तव में ग़ज़ल का रूप देने में 'वीनस केसरी' जी का अप्रतिम योगदान है और इसलिए उनका उल्लेख करना आवश्यक है| ग़ज़ल में जहाँ-जहाँ 'इटैलिक्स' में शब्द हैं वे वीनस जी द्वारा इस्लाह किये गए हैं| ग़ज़ल की बह्र है…

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Added by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on April 22, 2012 at 4:00pm — 28 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
प्रथ्वी दिवस हाइकु

पृथ्वी दिवस हाइकु 

(१ )
धन्य धरित्री 
बचाओ अभियान 
करो संकल्प  
(२ )
सुकृति धरा 
मात्र सम वन्दिता 
जल संचय
(३ )
पूज्य धरिणी
सुमणित प्रकृति 
वन्य रक्षण 
(४ )
सुढर भूमि 
ब्रह्माण्ड गौरव 
शीश नमन
(५ )
भू संरक्षण 
प्रदूषण मिटाओ 
धरा बचाओ 
(६…
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Added by rajesh kumari on April 22, 2012 at 2:30pm — 10 Comments

बच्चों की फरियाद



बंजर धरती दूषित हवा - जल, जंगल कटते जायेंगे.

 ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम बच्चे पायेंगे.

हरी - भरी धरती को आपने, बिन सोचे वीरान किया.

मतलब की खातिर ही आपने, वन - जंगल सुनसान किया.

नहीं बचेगा इन्सां भी, गर जीव - जंतु मिट जायेंगे.

ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम बच्चे पायेंगे.

ऐसे पर्यावरण में कैसे, कोई राष्ट्र विकास करेगा.

अब भी गर बेखबर रहे तो, माफ नहीं इतिहास करेगा.

रहते समय नहीं चेते तो, कर मलते रह जायेंगे.

ज़ख़्मी पर्यावरण आपसे , क्या हम…

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Added by satish mapatpuri on April 22, 2012 at 2:45am — 7 Comments

कुछ हाइकु ....

१. बौराया आम

चहका उपवन

आया बसंत



२. गरजे घन

नाच उठा किसान

बुझेगी प्यास



३.दहेज़ भारी

कुरीतियों की मारी

वधु बेचारी



४.अंकुर बनी

अभी नहीं खिली थी

भ्रूण ही तो थी



५.शोर है कैसा

कुर्सी पे तो है बैठा

अपना नेता



६ धर्म की आड़

बाबाओ का व्योपार

दुखी संसार



७. ठाट बाट में

कानून की आड़ में

कैदी दामाद



८. टूटे सपने

डिग्रियां बनी भार 
 बेरोजगार



९.व्याकुल…
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Added by MAHIMA SHREE on April 21, 2012 at 5:30pm — 18 Comments

सज़ा

शब्दों की जुगाली
करत रहा मनवा ये मवाली
लुच्चे से ख़यालात
लफंगे से अहसास
बदमाश जज़्बात
सोच रहा हूँ
सुना दूं इन्हें
उम्रकैद की सज़ा
डायरी के पन्नों में

Added by दुष्यंत सेवक on April 21, 2012 at 5:27pm — 9 Comments

भूल नहीं पाया अभी तक

बात कुछ ज्यादा पुरानी नहीं है . आंदोलित कर्मचारी संगठनों द्वारा अपनी मांगों को शासन तक ज्ञापन के माध्यम से पहुँचाने हेतु निर्णय लिया गया कि सर्व प्रथम सभी कर्मचारी अपने - अपने कार्यालय में एकत्रित होंगे. फिर कार्यक्रम स्थल पर अपने -अपने बैनर के साथ जलूस के रूप में पहुचेंगे जहाँ पर मानव श्रखला बनाकर प्रदर्शन किया जायेगा. सवेरे से ही विभिन्न कार्यालयों के कर्मचारी अपने-अपने कार्यालय से एक जलूस के रूप में अपनी मांगों के समर्थन में नारे लगाते हुए पहुँचने लगे और मानव…

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Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 21, 2012 at 2:30pm — 2 Comments

जिससे इंसां का भी दर्जा नहीं पाया हमने......

जिनसे इंसां का भी दर्जा नहीं पाया हमने,

मुद्दतों ऐसे ही इंसानों को पूजा हमने.

.

प्यार की पौध के मिटने से तो मर जायेंगे,

खून के अश्क से बागान को सींचा हमने.

.

हाँ उजाला नहीं होना मेरी इन राहों में,

शम्स ए पुरनूर से पाया ये अँधेरा हमने.

.

हमने मुंसिफ के भी हाथों में जो खंजर देखे,

कांपता दिल था मुक़दमा नहीं डाला हमने.

.

वहशी लोगों में किसी कांच से नाज़ुक हम थे,

हुज्जतों से बड़ी दामन ये बचाया…

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Added by इमरान खान on April 21, 2012 at 1:30pm — 8 Comments

पटना यात्रा ...

मौका था गुरु भाई प्रकाश सिंह 'अर्श' की शादी का, और शहर था पटना

तो ऐसा कैसे होता कि गणेश जी से मुलाक़ात न हो ...

१८ अप्रैल को शादी और १९ अप्रैल को  गणेश जी से मुलाक़ात ...…

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Added by वीनस केसरी on April 21, 2012 at 3:12am — 9 Comments

परछाईयाँ

माँ तुम्हारी वंदना में गुन गुनाना चाहते हैं .

आरती के दीप नूतन फिर सजाना चाहते हैं.

छल छलाती जाह्नवी अमृत परसने फिर लगे.

मोक्ष की अवधारणा का सच बताना चाहते हैं.

जल नहीं अमृत समझकर पान नित करते रहें.

फिर वही पावन धरोहर हम बनाना चाहते हैं.

तट तुम्हारे तीर्थ पावन क्यों बदल इतने गए.

फिर वही गौरव पुराना हम दिलाना चाहते हैं.

धन्य उद्गम धाम गोमुख धन्य हिम मंडित शिलाएं.…

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Added by Daya Shanker Pandey on April 20, 2012 at 9:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल : है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ

है मरना डूब के मेरा मुकद्दर भूल जाता हूँ
तेरी आँखों में भी है एक सागर भूल जाता हूँ

ये दफ़्तर जादुई है या मेरी कुर्सी तिलिस्मी है
मैं हूँ जनता का एक अदना सा नौकर भूल जाता हूँ

हमारे प्यार में इतना तो नश्शा अब भी बाकी है
पहुँचकर घर के दरवाजे पे दफ़्तर भूल जाता हूँ

तुझे भी भूल जाऊँ ऐ ख़ुदा तो माफ़ कर देना
मैं सब कुछ तोतली आवाज़ सुनकर भूल जाता हूँ

न जी सकता हूँ तेरे बिन, न मरने दे तेरी आदत
दवा हो या जहर दोनों मैं रखकर भूल जाता हूँ

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 20, 2012 at 9:04pm — 11 Comments

मुठभेड़

ताजगी का आलम

बसंत की बौछार

कोयल की कुहूक

मंजरों की मादक खूशबू

चांदनी बहती रात

मनोहर एकांत वह क्षण.

परन्तु,

बेचैन-दुःखी-निराश

वह नौजवान.

इन्तजार करता किसी के आने का

शायद किसी बहार का

प्रेम का मारा

बिचारा.

टिक....टिक...

समय बीतती रही,

पर लगे पंक्षी की तरह

जैसे कोयल की कुहूक

पत्तों की सरसराहटें...

चेहरे पर जमाने भर की खुशियाँ समेटे

मुड़ा ही था वह नौजवान कि

तीन गोलियाँ एक-एक कर

सीधा दिल…

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Added by Rohit Sharma on April 20, 2012 at 6:00pm — 4 Comments

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