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कुछ हाइकू

 
मन भ्रमर
उड़ता जाता, पर
पंख हैं कहाँ
 
 
 
सुख हैं कम
अनगिनत दुःख
जीना तो है ही
 
 
 
डूबता सूर्य
चूमता ज्यों धरा को
क्षित्तिज पर
 
 
 
 
सड़क पर
चमचमाती धूप
ज्यों…
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Added by Neelam Upadhyaya on July 6, 2012 at 10:00am — 6 Comments

साथी चल उस देश से

साथी चल उस देश से
जहाँ प्रेम व्यापार
बेच रहे ईमान को
लोग लगा बाज़ार

लोग लगा बाज़ार
मनुजता बेंचे ऐसे
सोने का सामान
बिके दो कौड़ी जैसे

कह 'प्रवीण' कविराय
जहाँ दीया ना बाती
कहाँ उजाला होत
मोह तज चल तू साथी

Added by प्रवीण कुमार श्रीवास्तव on July 6, 2012 at 7:49am — 7 Comments

जो आदमी ज़मीं से जुड़ा रह नहीं सका

जो आदमी ज़मीं से जुड़ा रह नहीं सका।

वो ज़ोर आंधियों का कभी सह नहीं सका॥

 

हिकमत1 से चोटियों पे पहुँच तो गया…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on July 5, 2012 at 11:30pm — 7 Comments

मासूम सी एक सूरत,

मासूम सी एक सूरत,

बन गई वो मेरी जरुरत,

होता है कुछ देखकर उसे,

क्या कहू वो है कितनी खूबसूरत....

........

अब सब कुछ फ़साना एक लगता है,

उसका दूर जाना भी, पास आना लगता है,

सोचा न था, एक दौर ऐसा आएगा,

जब ये दिल, किसी को चाहेगा,

फिर भी चुप रहेगी ये जुबाँ, ऐसी कोशिस है,

आँखों से समझे वो प्यार, ये साजिस है,

अब समझाना है उसको इन आँखों की भाषा,

वो होगी मेरे रूबरू,है इस दिल को आशा,

पा लेंगे उसको खुदपर विस्वास है,

मिलेगी वो, क्योकि वो…

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Added by Pradeep Kumar Kesarwani on July 5, 2012 at 11:30pm — 3 Comments

मै ने ही दलाली खायो

भैय्या मोरे मैन हीं दलाली खायो ...भैय्या मोरे मै नहीं दलाली खायो

ये पार्टी और वो पार्टी मिलकर ...म्हारे मुख लपटायो ..

रे भैय्या मोरे मैनहीं दलाली खायो

देश को ऊंचो नाम करन को

भाइयो के पेट भरण को

कामन वेल्थ करवायो .. रे भैय्या मोरे मैन हीं घपलों करवायो

उनकी गाड़ी पेट्रोल पियत है

म्हारी तो मुफ्त मा चलत है

म्हारी बहु ने पुत्र वधु कह कर

ठेकों मैंने दिलवायो .....पर भैय्या मोरे मै नहीं  दलाली खायो

जब जब जरुरत उनको पड़ी…

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Added by UMASHANKER MISHRA on July 5, 2012 at 10:25pm — 7 Comments

बेवफाई

जिनके लिए हमने दिल औ जान लुटाई .

मिली  सिर्फ  उनसे हमको है  बेवफाई |
...............................................
सजदा किया उसका निकला वो हरजाई ,
मुहब्बत के बदले पायी  हमने रुसवाई |
...............................................
धडकता है दिले नादां सुनते ही शहनाई,
पर तक़दीर से हमने तो  मात  ही खाई |
................................................
न भर नयन तू आग तो दिल ने…
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Added by Rekha Joshi on July 5, 2012 at 8:30pm — 14 Comments

दो कवितायेँ

(१)

मोहब्बतों से विनती



मोहब्बतों से विनती दिलों से निवेदन,

नहीं दिल्लगी में मिले, कोई साधन,



नाजुक बहुत हैं ये रिश्तों के धागे,

नहीं फिर जुड़ेगा, जो टूटा ये बंधन,



संभालेंगे कैसे लडखडाये कदम जब,

फ़िसलेंगे हाथों से अपनों के दामन,



पनप नहीं पाते ज़ज्बात फिर दिलो में,

सूना हो गया जो निगाहों का आँगन,



आँखों का बाँध छूटा तो कैसे बंधेगा,

अश्को से हो जायेगी इतनी अनबन,



(२)

मैं तो…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 1:30pm — No Comments

चेहरा है तलाशा

हो गयी चाँद को हैरानी, सागर हुआ है प्यासा,
निगाहों ने मेरी खातिर ऐसा चेहरा है तलाशा,

उजड़े हुए चमन में फिर से फूल खिल गया हो,
मेरे रब ने, जैसे खुद किसी, हीरे को हो तराशा,

यारों दिन में भी हो जाए अंधेरों का इजाफा,
उसकी सूरत जो न दिखे तो बढ जाती है निराशा,

ये पहाड़ सी जिंदगानी चुटकी में गुजर जाए,
तेरा साथ जो मिले, मुझको राहों में जरा सा,

तू ही दिल की आरजू, तू ही प्यार की परिभाषा,
तूफाँ में बुझ रहे चरागों की तू है आशा.......

Added by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 1:00pm — No Comments

बिखरे हुए पन्ने

बिखरे हुए पन्ने किताबों के आगे,
जिंदगी रुक गयी हिसाबों के आगे,

सवालों के पीछे सवालों के तांते,
उलझी जवानी जवाबों के आगे,

जीने में जद्दोजहद हो गयी है,
सुधरे हुए हारे खराबों के आगे,

कोई चोट देकर कोई चोट खाकर,
सब लेटे पड़े हैं शराबों के आगे,

आँखों में सजाये जिसे बैठे सभी हैं,
मंजिल नहीं है उन ख्वाबों के आगे.......
-------------------------------------------------------



Added by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 12:00pm — 5 Comments

प्यार पूज्य हो जायेंगा

हे जलधि, जब कोई ग़ोताखोर
तुम्हारे गर्भ में घुस,
मोती चुग-
दूर हो जायेंगा,
प्यार को वासनामयी
आँखों से देखा जायेंगा |
अगर- ग़ोता लगा,
गर्भ में ही लीन हो जायेंगा,
प्यार पूज्य हो जायेंगा |
फूल-सा चेहरा खिलेगा(जन्मेगा)
चमन में खुशबु महकेगी
किसी को कोई
आपत्ति नहीं होगी |

- लक्ष्मण लडीवाला, जयपुर

Added by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 5, 2012 at 11:30am — 5 Comments

छोटी सी दुनिया में खुशी की तलाश

हर इंसान की अपनी एक छोटी सी दुनिया है। जिसमें वह अपनी हैसियत के मुताबिक रहता है। एक खुशी की तलाश में वह यहां-वहां भटक रहा है। खुशी भी क्या, बस वह जी-तोड मेहनत के बाद मालूम चलता है कि आज यह कमी है, कल को इसका पूरा करना है। अगले दिन कोई और ही दुख सामने खड़ा दिखाई देता है। सिर्फ कहने भर की बातें होती है हम तुम्हारे साथ है, हम सब एक है। सच्चाई यह है कि कोई किसी के साथ नहीं है यहां तक कि वह भी जो उसके अपने होते है, जिनके साथ वह बचपन से खेलता-कूदता हुआ बड़ा हो जाता है। वह भी अपनी-अपनी छोटी दुनिया…

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Added by Harish Bhatt on July 5, 2012 at 10:45am — 4 Comments

तेरी भीगी निगाहें

तेरी भीगी निगाहों ने जब-जब छुआ है मुझे,
तेरा एहसास मिला तो कुछ-कुछ हुआ है मुझे,

फिसल कर छूट गया तेरा हाथ मेरे हाथों से,
सितम गर ज़माने से मिली बददुआ है मुझे,

लगी है ठोकर संभालना बहुत मुश्किल है,
घूंट चाहत का लग रहा अब कडुआ है मुझे, 

तरसती- बेबाक नज़रें ताकती हैं रास्तों को,
दिखा तेरी सूरत के बदले सिर्फ धुँआ है मुझे....

Added by अरुन 'अनन्त' on July 5, 2012 at 10:30am — 4 Comments

मृगनयनी कैसी तू नारी ??

मृगनयनी कैसी तू नारी ??

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मृगनयनी कजरारे नैना मोरनी जैसी चाल

पुन्केशर से जुल्फ तुम्हारे तू पराग की खान

तितली सी इतराती फिरती सब को नाच नचाती

तू पतंग सी उड़े आसमाँ लहर लहर बल खाती

कभी पास में कभी दूर हो मन को है तरसाती

इसे जिताती उसे हराती जिन्हें 'काट' ना आती

कभी उलझ जाती हो ‘दो’ से महिमा तेरी न्यारी

पल छिन हंसती लहराती औंधे-मुंह गिर जाती

कटी पड़ी भी जंग कराती - दांव लगाती

'समरथ' के हाथों में पड़ के लुटती हंसती…

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Added by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 5, 2012 at 6:30am — 25 Comments

प्राण प्रिये

वेदना संवेदना अपाटव कपट

को त्याग बढ़ चली हूँ मैं

हर तिमिर की आहटों का पथ

बदल अब ना रुकी हूँ मैं

साथ दो न प्राण लो अब

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।



निश्चल हृदय की वेदना को

छुपते हुए क्यों ले चली मैं

प्राण ये चंचल अलौकिक

सोचते तुझको प्रतिदिन

आह विरह का त्यजन कर

चलने दो मुझे ओ प्राण प्रिये ।



अपरिमित अजेय का पल

मृदुल मन में ले चली मैं

तुम हो दीपक जलो प्रतिपल

प्रकाश गौरव  बन चलो अब

चलने दो मुझे ओ प्राण…

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Added by deepti sharma on July 5, 2012 at 1:00am — 49 Comments

साहस

नीले नभ पर .,

उड़ चले पंछी ,
इक लम्बी उड़ान,
संग साथी लिए ,
निकल पड़े सब,
तलाश में अपनी ,
थी मंजिल अनजान .
अनदेखी राहों में 
जब हुआ सामना, 
था भयंकर तूफ़ान 
घिर गए चहुँ ओर से , 
और फ़स गए वो सब ,
इक ऐसे चक्रव्यूह में ,
अभिमन्यु की तरह ,
निकलना था मुश्किल ,
पर बुलंद…
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Added by Rekha Joshi on July 4, 2012 at 2:56pm — 19 Comments

आँखों से मौत के निशाने निकल पड़े



आँखों से मौत के निशाने निकल पड़े,

दिल पे चोट खाए दिवाने निकल पड़े,



बसती है तेरी चाहत सनम मेरी रूह में,

सूखे लबों की प्यास बुझाने निकल पड़े,



चाहतों के मामले फसानों में कैद है,

इल्जामों का पिटारा दिखाने निकल पड़े,



यादों का तेरे मौसम जब - जब आया है,

अश्को में बीते सारे ज़माने निकल पड़े,



होता है दर्द अक्सर तेरे बदले मिजाज़ से,

आज अपने साथ तुझको मिटाने निकल पड़े,



उल्फत की जिंदगी मैं जी-जी कर हारा हूँ,

समंदर में…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 4, 2012 at 11:00am — 9 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
चेतना के कदम....

ओढ़ शून्य का झीना आँचल
बढ़ चलें अनायास ही...
शून्य में समेट लेने
प्रकृति का अनंत विस्तार
या फिर,
रचने शून्य से ही
सृजन के अनंत तार...  
जिसमे,
वक़्त का दरिया
हो लय,
रहे मात्र क्षण...
मीलों लम्बा फासला,  
मुकाम, 
डग भर,
तत्क्षण...
नील सागर निहित  
रत्न…
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Added by Dr.Prachi Singh on July 3, 2012 at 3:00pm — 17 Comments

माज़रा क्या है? (कुछ सवालो कि दुनिया में चला जाए)

सदा हिजाब में रहते हो माज़रा क्या है?

बड़े रुबाब में रहते हो माज़रा क्या है?





बना दिया आखिर मुझे गुलशन पसंद....

हरेक गुलाब में रहते हो माज़रा क्या है?



हुदूद कोई बना लो हुस्न-ए-शबनम की....

खुले शबाब में रहते हो माज़रा क्या है?



कभी दुआ कभी मुराद में महसूस किया....

कभी अज़ाब में रहते हो माज़रा क्या है?



शकाफत भरा है तुम्हारा कोहिनूर बदन....

हया-ओ-आब में रहते हो माज़रा क्या है?



जबसे दीदार…

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Added by Shayar Raj Bajpai on July 3, 2012 at 12:48pm — 7 Comments

वक़्त-ए-फुरकत

मरासिम उनसे था मेरा सूफियाना सा

गा भी लेते थे हम

सुना भी लेते थे हम

इबादत उनकी किया करते थे

खुदा से रूठ जाते थे

मना भी लेते थे हम

वक़्त-ए-फुरकत

उनसे वादा किया था

एक कतरा न गिरेगा कभी

ये आब-ए-जमजम

मेरी आँखों से

तो पाकीजा आब से भरे ये प्याले

रोज भरते तो हैं

पर छलकते कभी नहीं

और लोग हमें संगदिल सनम कहते हैं

ये कैसा वादा लेकर वो गए हैं

उस दिन से लेकर आज तक…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 2, 2012 at 5:37pm — 5 Comments


प्रधान संपादक
शिल्पकार (लघुकथा)

जिस प्रकार के भवन की कल्पना बादशाह ने की थी यह भवन उससे भी कहीं अधिक सुन्दर बना था, जिसकी भव्यता देखकर बादशाह की आँखें चौंधिया सी गईं थीं. चहुँ ओर भवन निर्माण करने वाले शिल्पकार की मुक्तकंठ से प्रशंसा हो रही थी. जिसे सुनकर शिल्पकार भी फूला नहीं समा रहा था. लेकिन तभी अचानक बादशाह ने शिल्पकार के दोनों हाथ काट देने का आदेश दे दिया ताकि शिल्पकार पुन: ऐसी…

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Added by योगराज प्रभाकर on July 2, 2012 at 11:47am — 31 Comments

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