For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,172)

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- १०

दिल किसी फूल सा कुम्हला गया हो जैसे. वो खुद तो दिखता नहीं मगर हर शै म्लान और बेरौनक नज़र आती है ऐसे में. आइना भी कह रह था, चेह्रा कितना उतर गया है आज. बेचैनियाँ कहाँ से आईं, ये मालूम नहीं, पर इन्हें दिल ही क्यूँ पसंद है? दिल न होता तो बेचैनियों का क्या होता, क्या बेचैनियों का चैन भी खोता है? रब जाने क्या होता है!

 

© राज़ नवादवी

पुणे, १२/०४/२०१२ 

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 11:01pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ९

मेरी प्यारी,

 

प्यार का रूप चाहे जो भी हो उसकी धुरी आत्मिक और परिधि सार्वभौमिक होती है. और जब धुरी और परिधि आपस में मिल जातीं हैं तो प्रेम परिपूर्ण हो जाता है, एक अपरिभाष्य अस्तित्व जिसमें स्वं के भी होने का ज्ञान नहीं होता, एक गहरी निद्रा सी अवस्था जिसमें हम खो जाते हैं- कहाँ, किधर, क्यूँ, कैसे, किसमें, कुछ भी ज्ञात नहीं होता. सूफियों में इसे ‘हाल’ की कैफियत भी कहतें हैं. लैला-मजनूँ, रोमियो-जुलियट, हीर-रांझा, न जाने कितने ऐसे युगल हैं जिनके इश्क का मेयार कुछ ऐसा ही था. सच्चे…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 11:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- २०

सीमा इक प्यारा शब्द है ...

--------------------------------------

सीमा इक प्यारा शब्द है और उतना ही प्यारा नाम. आदमी का अपने जीवन के हर पहलू में किसी न किसी सीमा से किसी न किसी रूप में साबिका पड़ता है. उसकी इन्तेहाई फितरत जो उसके बनाने वाले से पैदा हुई है उसे हर सीमा के पार जाने को प्रेरित करती है जबकि समाजी ज़िंदगी का तकाज़ा उसे इक सीमा के अंदर रहने की सलाह देता है. और इस तज़ब्जुब और कशमकश से ज़िंदगी अलग अलग ज़ायके में दरपेश होती है.

 

आदम और हव्वा ने भी खुदा की…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 11:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- १९

आज की सुबह भी आई और आ ही गई. नींद भी रुखसत हुई और रात भी. और ख़्वाबों का रेला भी कुछ याद और कुछ मुबहम नींद के साथ गुज़र गया. हकीकत रूबरू थी- रोजाना के गुस्लोफरागेहाज़त और फिर दफ्तर जाने की तैयारी. कितना मशीनी है सब कुछ. ज़िंदगी के इस पहलू की आइंदागोई कितना आसान है- शायद दौर के दौर का एक बुनियादी खाका खींचना किसी एक अदद दिन के फोटोकॉपी करना जैसा हो.

 

अगर ज़िंदगी में दिल और दिल की तमाम उलझनें न हों तो सब कुछ कितना बेरंग, यकसां, और उबाऊ हो जाएगा. तआज्जुब तो ये है कि दिल चाहे सीने…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 11:00pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ८

अपनी सम्पूर्ण असम्पूर्णता में भी कितना पूर्ण हूँ...

----------------------------------------------------------------------

प्रातःकाल की पवित्रता छा जाती है मुझपे और मैं भाव-विभोर होके ध्यानस्थ हो जाता हूँ. दिन भर के काम-काज की भाग-दौड़ और जीवन का दैनिक उतार-चढ़ाव, मैं पक्का गृहस्थ हो जाता हूँ. गोधूलि की परिशांति, दिन और रात का समागम, मैं किसी दार्शनिक सा तटस्थ हो जाता हूँ. संध्याकाल का मनोहारी परिदृश्य और मेरी आतंरिक भोगपरकता का उद्रेक, मैं इन्द्रप्रस्थ हो जाता हूँ. रात्रिकाल…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 10:59pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ७

पुरानी इमारतों, कदीम घरों, और बोसीदा मकानों में.....

---------------------------------------------------------------------------

पुरानी इमारतों, कदीम घरों, और बोसीदा मकानों में एक अलग सी जाज्बियत (आकर्षण) महसूस होती है! ऐसा लगता है जैसे ये बीते ज़मानों का लिबास पहने हैं और इनके सीने में न जाने कितने किरदारों (चरित्रों) की कहानियां दफ्न है, न जाने कितनी मुहब्बतों और नफरतों के ये बेज़ुबान गवाह हैं.

 

पुणे शह्र में अंग्रेजों के ज़माने के कई मकान हैं जो आज भी सदियों…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 10:56pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ६

सोचता हूँ.....

 

सोचता हूँ अगर जंगल बात करते तो क्या करते, अगर नदियाँ गातीं तो क्या गातीं, पहाड़ मुस्कराते तो किस तरह, और रास्ते अपनी राह भूल जाते तो किधर जाते.

 

सोचता हूँ अगर जानवर भी बोल पाते तो हमसे क्या शिकायतें करते, दीवारें हमें समझ पातीं तो क्या आसूं न बहातीं? घर की खामोश पड़ी चीज़ों को हमारे आने जाने की खबर होती तो हमें कितना टोकतीं- इनती देर क्यूँ लगाई, कहाँ जा रहे हो, कब आओगे, वगैरह वगैरह....शायद तब पत्नी के दूर होने का एहसास न…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 10:53pm — No Comments

राज़ नवादवी: मेरी डायरी के पन्ने- ५

मैं चिरकाल से अपनी आत्मा में समाधिस्थ हूँ...

----------------------------------------------------------

मैं चिरकाल से अपनी आत्मा में समाधिस्थ हूँ, मुझे सिर्फ इस बात में अटूट विश्वास की आवश्यकता है. शनैः शनैः यह ज्ञान मेरे बाह्य भौतिक जीवन को भी अपने दिव्य आनंद की रसभरी हिलोरों में समा लेगा और मैं सांसारिकता की लहरों पे चढ़ता उतरता भी अपने आदि देव परम पूज्य परमात्मा के अनंत साम्राज्य में ही स्थापित रहूँगा, उसके चिर पुरातन मंदिर के सिंहद्वार की तरह!

 

हे प्रभु! मैं…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 10:50pm — No Comments

गरचे तेरे ख़याल का मेयार हम नहीं

नमस्कार अहबाब, तरही मुशायरा २३ में वक़्त पर मैं कोई ग़ज़ल नहीं कह पाया, क्योंकि तब तक मैं इस परिवार का हिस्सा ही नहीं था. अब उस मिसरे पर ख़ामा घिसाई का मन हुआ तो कुछ अश'आर कह दिए. आपकी नज़्र हैं, कोई ग़लती या ऐब दिखाई दे तो बेशक़ इत्तेला करें

****

गरचे तेरे ख़याल का मेयार हम नहीं

तो क्या तेरी तलब से भी दो-चार हम नहीं

वो चारागर है, सोचके मरता है दिल का हाल

आज़ार तो यही है कि बीमार हम नहीं

ऐ जान-ए-जान ग़ौर से देख इन्तहा-ए-शौक़

ख़ून-ए-जिगर है हम पे,…

Continue

Added by Vipul Kumar on June 29, 2012 at 7:00pm — 14 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३४

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)              

वो रिश्ता भूल आया हूँ............

 

जिस पुरानी कदीम सी जगह से

जन्मों का रिश्ता महसूस करता आया हूँ

उसी, हरे पानी की झील से लगी सीढ़ियों पे

एक रिश्ता भूल आया हूँ अपना.........

एक नामालूम अन्जान सा

बारिश की रात में

बादलों के पीछे छिपे चाँद सा रिश्ता

जिसे आँखों में भरकर अब तक ढोता रहा था

जागते सोते, हर मोड़ पे जिसे

साथ रखता था उम्मीद की तहों…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:39pm — 6 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३३

(आज से बारह वर्ष पूर्व लिखी रचना)              

दिल में बसे अंजान रास्ते..

 

दिल में भी हैं बसे

कई अंजान रास्ते

जिनकी वाक़िफ़त शायद

इक उम्र ले लेगी मेरी हैरान आँखों से चुराकर।

 

अच्छे, बुरे-जैसे भी हैं लोग गिर्दोपेश में

जो हमसाये हैं या हमसफ़र

या जो गुज़र गये बहुत पास आकर

सब, कहीं न कहीं बसे होतें हैं

इन्हीं अन्जान रास्तों पर

जो दिल में बसे तो होते हैं मगर

जिनके…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:27pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३२

(आज से सोलह वर्ष पूर्व लिखी रचना)              

फकत मैं और ये आलम.....

 

ये कैसी ख़ामोशी है मेरे बिस्तर पे

मेरे पास बैठी दम-ब-दम

ये कैसे हैं अजनबी साये

मेरी हर सम्त मेरे बाहम

ये कौन है जो रुक गया

मेरे नज़दीक आके  दफ्अतन

ये क्या शय है जो बिखर गई सरेदामन

ये कैसी तनहाई है जो

दुखा गई जीवन

ये कैसे हैं वीरानों के  नशेमन 

रात अफ्सुर्दा,

सियाह, मुस्तहकम

कितना अजीब है ये…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:12pm — 3 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३१

(आज से सोलह वर्ष पूर्व लिखी रचना)              

किधर हैं वो ज़ंदगी के  मोड़.....

 

कहाँ है मेरी आँखों का

वो नीला समंदर

जिसमें तुम डूब जाना चाहते थे

कहाँ हैं मेरी कुर्बत के  वो खुनक साये

जिसके  तुम शैदाई थे

कहाँ है मेरे सीने में धड़कता

वो उदास दिल

जिसके  हासिल का तुम्हें नाज़ था

कहाँ है वो मेरी तक़रीर-ए-बिस्मिल

जिसके  तुम कायल थे

कहाँ है वो कूचा-ए-लड़कपन

जहाँ हम मिले थे पहली बार

कहाँ है वो…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:10pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३०

(आज से दस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

जी चाहता है...

 

आज गमों में डूबा-डूबा है

मेरे एहसास का हर गोशा

भीगी-भीगी हैं पलकों पे

थके -थके  तसव्वुर की बूँदें

रुका-रुका सा है जाता हुआ

इमरोज़ का साया

बुझे-बुझे से हैं बर्ग दरख्तों पे

और धूप के साये दीवारों पे

हर तरफ गुमशुदगी है नुमायाँ

और उदासी है निगाहों में

जी चाहता है आज कहीं न जाऊँ

कुछ न करूँ,

देर तलक बैठा…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:06pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २९

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

तेरे शहर की सब अलामतें......

 

ये तेरे शहर की तमाम अलामतें

अजनबी हैं मेरे लिये

ये तेरे शहर की दूर तक फैली

अहलेज़र की पुरनूर बस्ती

ये आलीशान मकानों का हुस्नख़ेज़ तसल्सुल

ये ज़ुल्फेसियह सी बेनियाज़

आवारामनिश राहगुज़र

ये रौशनियों की दिलावेज़ जल्वागाह

ये ख़ला-ए-फैज़बख्श

ये फज़ा-ए-तमकनत

ये कारों की होशकुन तग़ोदौ

ये होटलों की रौनक़ोरौ

ये…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 6:00pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २८

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

हम तो गिर्दाबेतमन्ना हैं.......

 

ख़ाम रहने दो मेरी रग़बते उलफ़त को अभी

टूट जाने दो मेरे ख़्वाब के  शीराज़े को

जाँबहक हो भी गये इश्क़ में

तो कुछ भी नहीं

मिट गये काविशे बेसूद में

तो ये भी सही

जो भी अंजामेवफ़ा होगा देखा जायेगा

हश्र बर्बादी-ए-हस्ती का सोचा जाएगा

हम तो यूँ भी

बेदस्तो पा-ए-ज़िन्दगी थे बहुत

रंज में डूबे थे, अस्ना-ए-बेबसी थे बहुत

जी…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 5:58pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २७

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

यूँ ही, फकत यूँही......

 

यूँ ही

किसी राहगुज़र सा मुड़ गया है वक्त

एक लकीर पे चलते चलते.....

मैंने सोचा है इस मोड़ से आगे

वो जगह होगी शायद

जहाँ अपने माज़ी के  हर एहसास को

गहरे दफ्न कर दूँ

और उसपे नामालूम सी तारीख का हवाला लिख दूँ

ताकि मैं खुद भी चाहकर कभी

अपनी माज़ूरियों की इबारत पढ़ न सकूँ

और सोच लूँ

मैंने जो ख्वाब कभी देखे थे नीम आँखों…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 5:54pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २६

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

कभी-कभी.....

 

कभी-कभी मेरे दिल में

ऐसे खयाल से क्यों आते हैं

कि मैं कब से उस दरिया के किनारे बैठा हूँ

जिसकी मौजें उठती गिरती

अपनी ही अथाह गहराइयों में खो गयी हैं

और कागज़ की वो कश्ती भी

जिसे भेजाना चाहा था उस पार

अनजान अपरिचित से देश में

अपनी अनबुझी तृषाओं का बोझ देकर

इस उम्मीद से शायद

कि पेड़ों और पहाड़ों के पीछे

जो क्षितिज हर सुबह रौशनी के…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 5:50pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २५

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

इंसाफ....

 

जिस किसी दयार में बसना चाहा

अजनबी दीवार के  सायों ने घेर लिया मुझे

जिस किसी की ऑख से रिश्तों के नक्श चुराये

तेज़ हवाओं ने मिटा दिया उसे

जब कभी अॅधेरी रात में उम्मीदों की शमा रौशन की

मेरी खुद की बीनाई जाती रही

जिस किसी की सम्त रफाकत का इख्दाम किया

हाथों में खार निकल आये अपने

 

ज़िन्दगी,

अगर यही तेरा इंसाफ है

तो पहले बता दिया होता…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 5:46pm — No Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- २४

(आज से उन्नीस वर्ष पूर्व लिखी रचना)

पहले भी कई बार...

 

पहले भी कई बार

जब चाँद का शिकारा

आस्मान से उतर चुका हो

और तारे भी लौट चुके हों घर को

दूर... बाद्लों के  पहाड़ के  पीछे चिनार की बस्तियों में

जब दूर दूर फैली लबबस्ता खलाओं में

रात ने लिख दी हो ज़िन्दगी की शबनमी नज़्म

जब आहटों से बसी गलियों में

खुलने को हो आये हों

कायनात के  सुफैद दरीचे

जब दरख्तों से हवा की सरगोशियों का…

Continue

Added by राज़ नवादवी on June 29, 2012 at 5:44pm — No Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

pratibha pande replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद _______ बाँध साइकिल लकड़ियाँ, जाता घर की ओर। ख़त्म हो गई गैस है,पेट मचाए…"
17 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,    आग बुझाने पेट की, जूझ रहा दिन-रात  बुरे किये …"
32 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अखिलेश भाईजी, आपकी दोहावली आजके माहौल को समेटते हुए प्रदत्त चित्र के आलोक में हुई…"
1 hour ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"आ. भाई अखिलेश जी, सादर अभिवादन। प्रदत्त चिचानुरूप उत्तम दोहावली हुई है। पर्यावरण, युद्ध के कारण गैस…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद********आग बुझाने पेट की, जूझ रहा दिन-रातबुरे किये  हैं  युद्ध ने, गैस  बिना…"
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"क्या हो विकल्प गैस का   [ पढ़िए ] "
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"दोहा छंद ++++++++++++ वार्ता निष्फल  शांति की, जारी है फिर युद्ध। कमी तेल औ’ गैस की,…"
23 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"सादर अभिवादन"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम् "
yesterday
Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा दशम. . . . . उम्र
"आदरणीय विजय निकोर जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
Friday
Admin added a discussion to the group चित्र से काव्य तक
Thumbnail

'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 178

आदरणीय काव्य-रसिको !सादर अभिवादन !!  ’चित्र से काव्य तक’ छन्दोत्सव का यह एक सौ…See More
Wednesday
amita tiwari posted a blog post

गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी…See More
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service