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ये कैसी डोरी बंधन की,  है जैसे कच्चे रेशम की..
डर लगता है टूट न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
इस से मन के तार जुड़े हैं, सपनों के संसार जुड़े हैं..
सप्त सुरों में इसकी लय है, हर सावन इस की ही शय है..
 
गुँथे हुए सतरंगी धागे, थाम जिसे धड़कन भी भागे..
जीवन में हर रंग इसी से, श्वांसों घुले तरंग इसी से..
 
थाम इसे  छू लूँ मैं अंबर, पार करूँ मैं गहरा सागर..
अग्नि समंदर भी तैराए, अच्युत अजय पद हस्त सजाए..
 
अटल ये आँधी तूफानों में,  संग हमेशा वीरानों में..
ये मरुधर में सावन भर दे, अन्धकार को ज्योतित कर दे..
 
इसमें रब की बसी दुआ है, जैसे खुद ये एक खुदा है..
रब मुझसे ये रूठ न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
हाथ उठा कर नयन बसा कर, है वंदन तेरा करुणाकर..
चेतनता की हर मंजिल में, संग बसे ये मेरे दिल में..
 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 2, 2012 at 9:08pm

आ. सुरेन्द्र कुमार शुक्ला जी, इस रचना को सराहने हेतु आपका ह्रदय से आभार

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 1, 2012 at 11:44pm

इसमें रब की बसी दुआ है, जैसे खुद ये एक खुदा है..

रब मुझसे ये रूठ न जाए, साथ कहीं ये छूट न जाए..
 
हाथ उठा कर नयन बसा कर, है वंदन तेरा करुणाकर..
चेतनता की हर मंजिल में, संग बसे ये मेरे दिल में..
आदरणीया डॉ प्राची सिंह जी ..बहुत सुन्दर छंदोबद्ध रचना ये डोरी बंधन की ...ये बंधन हमारे अंतर में और प्रगाढ़ हो ..प्रेम उपजे और प्रभु सदा इस पर कृपा बरसाते रहें सब सरस हो जाए ..
 ..जय श्री राधे 
भ्रमर ५ 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 1, 2012 at 5:44pm

 

आदरणीय सौरभ जी,
आपका हार्दिक आभार इस कृति को सराहने के लिए व चौपाई छंद पर प्रकाश डालने के लिए.
जितने नियम इन छंदों के स्थूल व दृश्य हैं, उनसे कहीं ज्यादा सूक्ष्म हैं...
जिन्हें सिर्फ सतत अभ्यास व स्वाध्याय  से ही साधा जा सकता है.
एक विशिष्ट मात्रिक विन्यास ही हिन्दी छंदों में सरस गेयता व माधुर्य लाता है.
आपके द्वारा  विधाओं पर सतत मार्गदर्शन हमारी रचनाओं को आवश्यक तत्व  जरूर प्रदान करेगा.
आपका पुनः आभार.  

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 1, 2012 at 3:55pm

रचना बहुत ही सुन्दर बन पड़ी है, डा. प्राची.  उच्च बंधन को साधती जिस ’डोरी’ का आपने वर्णन किया है वह अंतर में अटूट विश्वास के उपजने का कारण होती है. यह विश्वास ही एक मुग्धा की अस्मिता को विस्तार देता है.  इस आध्यात्मिक तथ्य का भरपूर हामी भरती इस रचना के लिये आपको हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ.  

सोलह की मात्रा के चरण हों, और पद बनें तो छंद चौपाई कहलाते हैं.  किन्तु, छंद मात्राओं की गिनती मात्र पर नहीं साधे जाते बल्कि उनका अपना सुर हुआ करता है. 

उस हिसाब से पहली पंक्ति का पहला पद कुछ यों लिखा जाय तो चौपाई के सुर के अनुरूप दोनों चरण होंगे -

ये कैसी बंधन की डोरी । रेशम-रेशम कच्ची कोरी ॥

या इसी तरह से कुछ.  ..

आपकी इस भावप्रवण रचना के लिये पुनः बधाइयाँ

कृपया ध्यान दे...

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