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All Blog Posts (19,172)

मुस्कुराना भूल आये हैं

ख़ुशी से हंसते-हंसते लब, मुस्कुराना भूल आये हैं,

आज हम अपने ही घर का, ठिकाना भूल आये हैं,



यादों के सब लम्हे , यादों से मिटाकर हम,

उसके साथ वो गुजरा, जमाना भूल आये हैं,

बुझाकर रख गई जब वो, सुहाने साथ बीते पल,

सुलगता यादों का वो पल छिन, जलाना भूल आये…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 8, 2012 at 1:30pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३८

पुणे से पत्नी को लिखा पत्र

 

प्यारी बिन्नी,

 

वो गांव ही अच्छा था जहाँ हम रहा करते थे

जहाँ के पेड पौधे, खेत खलिहान और

कुत्ते भी हमसे बातें किया करते थे

 

वो गांव क्या था पूरा परिवार था

हर आदमी इक दूसरे के प्रति

कितना जिम्मेवार था

सबकी खुशियाँ हमारी खुशियाँ थीं और

हमारे दुःख में हर कोई हिस्सेदार था

 

गांव के चौधरी यही तो कहा करते थे

वो गांव ही अच्छा था जहाँ हम रहा करते…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 1:00pm — 5 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- २०

पूरा हो या अधूरा अरमाँ निकल ही जाता है

करीब आ के दूर कारवाँ निकल ही जाता है

 

जो न बदलें हालात तो खुद को बदल डालो

जंगलोंसे निकलो आस्माँ निकल ही जाता है

 

रहेंगे कबतक मुन्हसिर गुंचे खिलही जाते हैं

कभीतो ज़िंदगीसे बागवाँ निकल ही जाता है

 

पत्थरोंसे भी मिट जाती हैं इबारतें समय पे

हो गहरा दिल का निशाँ निकल ही जाता है

 

मसीहा आते हैं इम्तेहा-ए-गारतपे हर दौर में

दौरेज़ुल्मियत से ये जहाँ निकल ही जाता…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 12:56pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३७

मरना क्या है?

 

जब मेरे दादा मरे थे तो मैं बहुत छोटा था, मुझे मालूम न हो सका कि मरना क्या है 

कुछ अजीब सा माहौल था मगर फिर सब अच्छा लगा 

घर में भोज हुआ और खाने पीने को अच्छा मिला.

 

जब मेरे चाचा मरे तो मैं कुछ बड़ा हो चुका था, माहौल ग़मगीन था, लोग रो रहे थे, सन्नाटा था 

मगर फिर सब अच्छा लगा 

घर में भोज हुआ और खाने पीने को अच्छा मिला.

 

जब मेरे पिता मरे तो पहली बार दुःख हुआ, लगा…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 12:49pm — 10 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- १९

मैं मंजिल के करीब आकर बिखर न जाऊं

सोचता हूँकि आज रात अपने घर न जाऊं

 

मुझे भी है इन्तेज़ार उम्रदराज़ हो जाने का

दिनभर बेरोज़गार रहूँ और दफ्तर न जाऊं

 

लहरोंको देख तेरी नज़रों की याद आती है

मैंने सोचा हैकि फिर कभी समंदर न जाऊं

 

गली में कुहराम मचा है और मैं बच्चा हूँ

माँ ने कहा है कि मैं घर से बाहर न जाऊं

 

छोड़ गया है अपना कुनबा बीवीकी खातिर 

अब्बा कहतें हैंकि मैं बड़े भाई पर न जाऊं

 

रोक…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 12:32pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३६

....तो तुम होती

 

रातों में तन्हाई नहीं होती

तो तुम होती

दुखों की परछाई नहीं होती

तो तुम होती

ज़िंदगी में बेपर्वाई नहीं होती

तो तुम होती

खुदा ने मेरी किस्मत बनाई नहीं होती

तो तुम होती

ये अयालदारी, ये जीस्तेकुनबाई नहीं होती

तो तुम होती

खामखाह हमने बात बढ़ाई नहीं होती

तो तुम होती

पैदाइशेखल्क के मरकज़ में जुदाई नहीं होती

तो तुम होती

हममें तुममें तश्वीशेआबाई नहीं…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 12:20pm — 2 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ३५

शब्दों में जो लिखा है....

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शब्दों में जो लिखा है

अपना भोगा यथार्थ गढ़ा है

तराशी हैं मन की सभी छोटी बड़ी बातें

जो कभी किसी कोने में दुबका सिकुड़ा है

और जो कभी आकाश से भी उन्नत और बड़ा है

शब्दों में लिख लिख के सश्रम

उसके ही परिहास और वंचनाओं को गढ़ा है

 

बदल गए अपनों की व्यथाएं

आँखों से झांकती क्लांत आशाएं

संबंधों की अपरिभाषित सीमाएं

कुछ करने न करने की…

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Added by राज़ नवादवी on July 8, 2012 at 8:30am — No Comments

उन गहन अँधेरे कमरों में ,सन्नाटा ही अब रहता है

बहुत सालों पहले की मेरी डायरी के पन्नो पर अंकित कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष रख रहा हु .भावो को समेटने की कोशिश की है इन शब्दों के गुलदस्ते में, पसंद आये तो सूचित करियेगा और मुझे अवगत करायें मेरी त्रुटियों से । आपका अपना सबका छोटा भाई योगेश... 



उन गहन अँधेरे कमरों में ,सन्नाटा ही अब रहता है

मैं दरवाजे खोलू कैसे .तेरी याद…

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Added by yogesh shivhare on July 8, 2012 at 12:00am — No Comments

थोड़ी दाल थोड़े भात उधार मांगता हूँ

बस नींद भरी रात उधार मांगता हूँ,

दिल के लिए जज़्बात उधार मानता हूँ,

कोई तोड़ जाये जो होंठो से मेरे चुप्पी,

कुछ लफ़्ज़ों की सौगात उधार मानता हूँ,

मुमकिन नहीं है फिर तसल्ली के वास्ते,

गूंगे लबों…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 7, 2012 at 3:39pm — 2 Comments

ग़मगीन

ग़मगीन

तक़दीर ही अपनी ऐसी थी

अपने हिस्से में गम निकले

जब भी कोशिश की हँसने की

आँख से आँसू बह निकले

अतीत नें पीछा छोड़ा न

न अपनों नें ही जीने दिया

खुदा से अब तो यही दुआ है

हँसते हँसते ही दम निकले

दीपक…

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Added by Deepak Sharma Kuluvi on July 7, 2012 at 1:01pm — 3 Comments

ज़रा सी बात

ज़रा सी बात बोलो तो बताना हैं बना लेते,
उठा - गिरा कर पलकें फ़साना हैं बना लेते,

कहानी रच लेते हैं, जुबां से लम्बी चौड़ी वो,
पत्थरों को ज़रा छूकर, खज़ाना हैं बना लेते,

निगाहें रूठ जाएँ तो, बस्तियां लुट जाती हैं,
अपने आगे पीछे इक, जमाना हैं बना लेते,

यादों के बीते पल जब - जब जाग जाते हैं,
मेरी सारी खुशियों का हर्जाना हैं बना लेते.....

Added by अरुन 'अनन्त' on July 7, 2012 at 12:00pm — No Comments

कहानी : रसबतिया

इस बार बारिशें देर से हुई है। हुई भी तो क्या न खेत खलिहान भीगे, न डबडबाया बड़ा बाला ताल । उमगती रह गई घाघरा इधर से उधर। न नानी का कवनों टोटका काम आया न नंग-धरंग बच्चों का अनुष्ठान । कभी उत्तर से तो कभी दक्षिण से, कभी पूरब से तो कभी पश्चिम से रह-रहके एक ही आवाज आती रही ‘‘काल-कलौती-पीयर-धोती मेघा सारे पानी दे’’।  बच्चों के अनुरोध पर पानी तो दिया इंद्र भगवान ने मगर मूत के बराबर । कायदे से न ढोर-डांगर भीगे न ताल-तलैया । चारो तरफ बस कीचड़ हीं कीचड़ । जिस तरह से बादर उमड़ घुमड़ आये थे, लग रहा था झम के…

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Added by Ravindra Prabhat on July 7, 2012 at 11:26am — 5 Comments

हाइकू-बरखा के

१.
मेघ बरसे
विरह में पिय के
नयन से भी
२.
लाया सावन
अतुल उपहार
सुधा फुहार
३.
बरखा संग
निकली बाल-टोली
कीचड़-होली
४.
मयूर नाचा
हृदय ने भी किया
मयूर नृत्य

Added by प्रवीण कुमार श्रीवास्तव on July 6, 2012 at 11:25pm — 2 Comments

हाइकु.

 
हाइकु.
-----------
पाली बेशक…
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Added by AVINASH S BAGDE on July 6, 2012 at 8:40pm — 5 Comments

कुछ शेर

समाधान चाहिए

बढ़ती हुई समस्याओं का, समाधान चाहिए,

इंसान के अवतार में, फिर भगवान चाहिए,

मुश्किलों से घिरी हुई है,अपनी जन्म-भूमि,

अब एक जुझारू योद्धा,बड़ा बलवान चाहिए, 

बैठे हैं भ्रष्ठाचारी, हर मोड़ हर कदम पर,

अब इनकी खातिर,एक नया शमशान…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2012 at 5:30pm — No Comments

"दीपदान"

रात आई

काली चुनरी ओढ़ के

नीले व्योम को ढँक लिया

घुप्प अँधेरा,

सन्नाटे बातें करते हैं

हवाओं से

दूर से आती हैं कुछ आवाजें

डरावनी सी भयानक सी

कानों में खुसफुसाती…

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Added by SANDEEP KUMAR PATEL on July 6, 2012 at 3:30pm — 5 Comments

रात के तेवर

रात के तेवर जब - जब बदले नज़र आये,

तेरी यादों के मौसम बड़े उबले नज़र आये,

 

तसल्ली दे रहे हैं, हालात मुझे लेकिन,

आँखों से सारे मंजर दुबले नज़र आये,

 

भभकते अश्कों को कोई साथ न मिला,

न रुके और न…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2012 at 12:44pm — 8 Comments

मुकम्मल हो नहीं पाए

ख्वाब आँखों के कोई भी मुकम्मल हो नहीं पाए,

खाकर ठोकर यूँ गिरे फिर उठकर चल नहीं पाए,

खिलाफत कर नहीं पाए बंधे रिश्ते कुछ ऐसे थे,

सवालों के किसी मुद्दे का कोई हल नहीं पाए,

बड़े उलटे सीधे थे, गढ़े रिवाज तेरे शहर के,

लाख कोशिशों के बावजूद हम उनमे ढल नहीं…

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Added by अरुन 'अनन्त' on July 6, 2012 at 12:09pm — 6 Comments

पर्यावरण पर कुछ हाइकु

 नीर भरी थी 

विष्णुपदी  निर्मल 

क्लांत  है अब । 
 
***************
पेड़ों को काटा 
छीना था सरमाया 
धरती…
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Added by sangeeta swarup on July 6, 2012 at 10:45am — 4 Comments

दोहा सलिला: संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:



संजीव 'सलिल'

*

कथ्य, भाव, रस, शिल्प, लय, साधें कवि गुणवान.

कम न अधिक कोई तनिक, मिल कविता की जान..

*

मेघदूत के पत्र को, सके न अब तक बाँच.

पानी रहा न आँख में, किससे बोलें साँच..



ऋतुओं का आनंद लें, बाकी नहीं शऊर.

भवनों में घुस कोसते. मौसम को भरपूर..



पावस ठंडी ग्रीष्म के. फूट गये हैं भाग.

मनुज सिकोड़े नाक-भौं, कहीं नहीं अनुराग..



मन भाये हेमंत जब, प्यारा लगे बसंत.

मिले शिशिर से जो गले,…

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Added by sanjiv verma 'salil' on July 6, 2012 at 10:20am — 5 Comments

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