For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

कहानी : रसबतिया

इस बार बारिशें देर से हुई है। हुई भी तो क्या न खेत खलिहान भीगे, न डबडबाया बड़ा बाला ताल । उमगती रह गई घाघरा इधर से उधर। न नानी का कवनों टोटका काम आया न नंग-धरंग बच्चों का अनुष्ठान । कभी उत्तर से तो कभी दक्षिण से, कभी पूरब से तो कभी पश्चिम से रह-रहके एक ही आवाज आती रही ‘‘काल-कलौती-पीयर-धोती मेघा सारे पानी दे’’।  बच्चों के अनुरोध पर पानी तो दिया इंद्र भगवान ने मगर मूत के बराबर । कायदे से न ढोर-डांगर भीगे न ताल-तलैया । चारो तरफ बस कीचड़ हीं कीचड़ । जिस तरह से बादर उमड़ घुमड़ आये थे, लग रहा था झम के बरसेगी बरखा रानी इस बार। फिर क्या अविरल बारिश के बाद पूरे गाँव के साथ मिलकर हम नानी की काली चौरे पर मीठी लपसी और पूरियां जीमेंगे जी भर के । मगर विधाता को यह मंजूर ही नहीं था। ट्यूब बेल के पानी से धनरोपनी का काम कर रहे हैं हम सब । अगर फसल कायदे से नहीं हुआ न त कहीं के नहीं रहेंगे ।

कहते-कहते अचानक चुप हो गयी रसबतिया और माथा ठोकती हुयी बोली ‘‘ओह हम्म भी न....इतने दिनों के बाद मरद आया है गाँव और मैं लगी अपनी राम कहानी सुनाने । खैर छोड़ो ये बताओ खाना कैसा बना है ?’’

‘‘अमृत जैसा ।’’

‘‘धत्’’ कहकर आँचल से मुंह छिपाती हुई मुड़ गयी रसबतिया । कई महीनों के बाद पति को सम्मुख पाकर रसबतिया फुली नहीं समा रही थी । पृथ्वी का सारा स्नेह, प्रेम और समर्पण छलक रहा था उसकी दृष्टि मे ।

गाँव में नौकरी पेशा कम थे या ज्यादातर छोटी-छोटी नौकरी वाले थे। कोई ज्यादा पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी पा लेता वह गाँव को बाय-बाय बोलकर निकल लेता था । बड़ा होकर राम औतार ने भी नौकरी हेतु शहर जाने की इच्छा प्रकट की पर माँ का मन नहीं माना, बहुत रोयी, बहुत चिल्लाई की बेटे को दूर नहीं जाने दूँगी पर आखिरकार राम औतार ने मना ही लिया था माँ को ।

बियाह के तुरंत बाद राम औतार चला गया था शहर कमाने के लिए । एक बरस के बाद लौटा है अपने गाँव । रसबतिया के छेड़ने पर कहता है राम औतार कि जब किसी की कोमल आहट पाकर मन का पोर - पोर झनझना जाता है और डराने लगता है सपना तब याद आता है अपना गाँव । न ससुरी झाल न मजीरा, न गीत न जोगीरा, न सारंगा न सदाबरीक्ष, न सोरठी न बिरजाभार, न आल्हा  न उदल न कजरी कुछ भी नहीं शहर मे । है तो बस भीड़ मे गायब होते आदमी, गायब होती परंपराए।   पॉप की धून पर संगीत के नए- नए प्रयोग.... हाथ का एकतारा छोड़कर बंदूक उठा लेने को आतुर लोकगायक । वातानुकुलित कक्ष में बैठकर मेघ का वर्णन करते कालीदास और बाबा तुलसी गाते हुये ‘‘चुम्मा-चुम्मा।”

कहते-कहते रुक गए अचानक राम औतार के स्वर । ‘‘अरे हम्म भी न बिना मतलब की बात करने लग गए । तू बता कैसी है तू ? गाँव का हाल का है ?’’

‘‘अरे गाँव का हाल पुछौ मत, इधर नहर खुदाई के मसले पर मुखिया जी के मर्डर होई गए उधर सतरोहना ........ ।’’ कहते-कहते घिघघी बंध गयी रसबतिया की ।

‘‘का हुआ सतरोहना को ?’’ रसबतिया को झकझोरते हुये बोला राम औतार ।

इस बार दशहरे की छुट्टी बिताने आया तो चाची ने उसकी शादी कर दी । बढ़ईपुरबा के त्रिलोचन मास्साब की बेटी बुधनी से ।

बियाह का एके सप्ताह गुजारा था, कि सतरोहना का बुलाबा आ गया पल्टन से । टेलीग्राम मे लिखा था जल्दी आओ । कारगिल मे पाकिस्तानी सैनिकों ने धाबा बोल दिया है । चाची बहुत समझाई कि ‘‘बबुआ, होशियारी से रहना, पाकिस्तानी बहुते क्रूर होवत हैं, दया-माया कुछ भी नाही होत उनके पास ।’’

सतरोहना पल्टन को लौट गया । सात दिन बाद उसकी चिट्ठी आई कि वह सकुशल पहुँच गया था और उसे अब कारगिल भेजा जा रहा है । बुधनी राहत की सांस ली और देबी मैया की पूजा मे मशगूल हो गयी ।

उधर गाँव मे अलग-अलग तरह की अफवाहें फैलने लगी । कोई कहता कारगिल पर पाकिस्तानियों ने कब्जा कर लिया तो कोई कहता सरकार छुपा रही है पाकिस्तानी बहुत भीतर तक घुस आए हैं ससुर । कोई कहता अपने देश की सेना की खूबई छती हुयी है तो कोई कहता अरे नाही हमारी फौज ने उन्हें खदेड़ दिया है ।

महिना दिन बीत गया, नहीं आई कोई खबर सतरोहना की । बुधनी रात-दिन अपनी बूढ़ी सास की सेवा करती रही, उन्हें खाना पकाकर खिलाती रही । बरम बाबा से लेके सब देवता-पीतर के सुमेरती रही बारी-बारी से । मगर नहीं आया कोई खत सतरोहना की सलामती का ।

काली पूजा के दिन बुधना ने काली मैया को चढ़ाने के लिए पकवान बनाई और बूढ़ी सास को खिलाने के बाद बेचारी स्वयं खाने के लिए बैठी, मगर उसे लगा कि उसके होंठ प्यास और भूख से सूख गए हैं -ठंड से शरीर नीला हो गया है । बुधनी ने मुंह का निवाला वहीं जमीन पर थूक डाला ।

बूढ़ी सास बोली ‘‘ऐसा क्यों कर रही हो बहू, घर की लक्ष्मी होकर तुम्हें इस तरह अन्न नहीं फेंकना चाहिए, अशुभ होता है ।’’

बुधनी का चेहरा लाल हो गया । उसने फिर थाली सरकाकर पकवान का एक टुकड़ा मुंह मे डालकर चबाने का प्रयास करने लगी । लेकिन उसे वह पकवान नीरा स्वादहीन काठ चबाने जैसा लगा । खुद न खाने से पति का अनिष्ट होगा, घर मे अलक्षण होगा सोचकर उसने एक निवाला मुंह मे डाला, कि उसे उल्टी हो गयी । बूढ़ी सास चकित होकर उसका मुंह देखती रह गयी । उसने फिर उसे खाने के लिए जोर नहीं दिया । उसके नारी हृदय ने समझ लिया -खुशबूदार, मशालेदार पकवान का स्वाद उसकी जीभ ने खो दिया है । पंद्रह साल पहले उसने भी तो उसी तरह स्वाद खो दिया था ।

बस कर रसबतिया बस कर, अब और सुनने का मन नहीं कर रहा । केवल इतना बताओ कि बुधनी कहाँ है ? भीतर ही भीतर असीम दर्द से कराहते हुये पूछा राम औतार ।

‘‘पति के मरने के बाद गाँव के लोग उसे चैन से जीने दे तब न । तरह-तरह के फिकरे कसते रहे बड़का टोला के लोग । कहते हैं कुल्टा है, डायन है, पति को खा गयी । बेचारी तब तक जी जबतक उसकी सास की सांस न बंद हो गयी । जैसे ही उसकी सास मरी, उसने भी चूहा मार दबाई खा के अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी ...... ।’’ कहते-कहते रसबतिया की आँखें भर आई और राम औतार से लिपटते हुये बोली । ‘‘तुम मुझे छोडकर अब शहर नहीं जाओगे न ?’’

राम औतार सोचने लगा कि ‘‘रसबतिया सही कह रही है । आखिर मालिक के भय से, महाजन की धमकी से, बनिए के तकादों से कबतक भागता रहेगा शहर की ओर । ’’ तभी उसने दीवार पर बार-बार चढ़ती हुयी चींटियों को देखा, उसे महसूस हुआ कि ‘‘जब नहीं छोड़ती चींटियाँ दीवारों पर चढ़ना दम तोड़ने की हद तक, तो क्यों छोड़े वह अपना गाँव समस्याओं से भागते हुये । लौटेंगे एक दिन जरूर उसके भी सुख के दिन और वह भी करेगा शंखनाद अपनी सफलता का ।’’

वह इन्हीं सोचों मे खोया था कि रसबतिया ने उसे झकझोरा ‘‘ अरे उठो बहुत तेज बारिश हो रही है, चलो घर के भीतर, प्याज और बेसन की पकौड़ियाँ बनाई हूँ तुम्हारे लिए ।’’

() () ()

Views: 1395

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Ravindra Prabhat on July 9, 2012 at 10:28am

कहानी पसंद करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत आभार । 

Comment by आशीष यादव on July 8, 2012 at 12:33pm

कहानी को पढ़कर एक अजीब सी शान्ति मिल रही है जो बेचैन भी कर रही है। पात्रों एवँ दशाओं का सुन्दरता से वर्णन है। सामाजिक स्थिति बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर रही है।
एक सफल कहानी के लिए बधाई स्वीकारें


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2012 at 2:06am

रवीन्द्र प्रभात जी, 

ऐसा भी होता है. कभी-कभी होता है.  जी करता है, देर तक कोई योंही बतियाता रहता. यों ही.  इधर की. उधर की.  दुख की. सुख की. मानी-बेमानी. किसी के कहे में बहाव हो न, तो यही होता है. 

रसबतिया और रामऔतार के सुभाव के मध्य क्षेपक के तौर पर सतरोहना और बुधनी का प्रसंग. ओह !

भाईजी, कारगिल के मौका पर बरखा हुई भी थी क्या ? छोड़िये, जरूर बदरियाया रहा होगा.  मन पर जो घन छा जायँ तो आँखों से बेमौसम की बरखा हुआ करती है. और वो दीखती भी है. 

जाने क्यों बहुत दिनों बाद सुखांत के प्रति दिल इतना जिदियाया हुआ था. आभार. ऐसा होता नहीं कि जैसा हुआ है. अंत सुखांत है, सो सुख से आँखें नम हैं. चलो इनके दिन बहुरे, रसबतिया और रामऔतार के, तो सबके बहुरें. उनको मन से आशीष. पर जो होनी है न  --हक़ीक़त--  वो अँकुठाई रीढ़ तक को बर्फ़ानी बना देती है. बेचारी फिर भी काँप नहीं पाती, बस जम जाती है.

रवीन्द्र भाईजी,  आपकी किस्सागोई दिल में हिलोर मचा गयी है.

दिल से बधाई, भाई.  साथ बना रहें और आप बस सुनाते रहें.

Comment by Rekha Joshi on July 7, 2012 at 6:55pm

आदरणीय रविन्द्र जी ,

 लौटेंगे एक दिन जरूर उसके भी सुख के दिन और वह भी करेगा शंखनाद अपनी सफलता का ।’’,बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई 
Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 7, 2012 at 6:33pm

जब किसी की कोमल आहट पाकर मन का पोर - पोर झनझना जाता है और डराने लगता है सपना तब याद आता है अपना गाँव । न ससुरी झाल न मजीरा, न गीत न जोगीरा, न सारंगा न सदाबरीक्ष, न सोरठी न बिरजाभार, न आल्हा  न उदल न कजरी कुछ भी नहीं शहर मे । है तो बस भीड़ मे गायब होते आदमी, गायब होती परंपराए।

‘‘पति के मरने के बाद गाँव के लोग उसे चैन से जीने दे तब न । तरह-तरह के फिकरे कसते रहे बड़का टोला के लोग । कहते हैं कुल्टा है, डायन है, पति को खा गयी । बेचारी तब तक जी जबतक उसकी सास की सांस न बंद हो गयी । 

प्रिय रवीन्द्र प्रभात जी मन को छू गयी आप की कहानी गाँव के जीवंत दृश्य, शहर में भीड़ और प्राथमिक रिश्तों की कमी  , दर्द किसान का,  गाँव की कुछ कुरीतियों को दर्शाती बहुत ही प्रभावी रचना ...बधाई हो 

भ्रमर ५ 
भ्रमर का दर्द और दर्पण 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity

Sushil Sarna commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी सृजन के भावों को मान देने का दिल से आभार आदरणीय "
51 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

तब मनुज देवता हो गया जान लो,- लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२/२१२/२१२/२१२**अर्थ जो प्रेम का पढ़ सके आदमीएक उन्नत समय गढ़ सके आदमी।१।*आदमीयत जहाँ खूब महफूज होएक…See More
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Sushil Sarna's blog post दोहा पंचक. . . . रिश्ते
"आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। सुंदर दोहै हुए हैं। हार्दिक बधाई।"
8 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्तेमिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर…See More
22 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post देवता क्यों दोस्त होंगे फिर भला- लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
"आ. भाई सौरभ जी, सादर अभिवादन व आभार।"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post सच काफिले में झूठ सा जाता नहीं कभी - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
"आ. भाई रवि जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सुंदर सुझाव के लिए हार्दिक आभार।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"बेशक। सच कहा आपने।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"मेरा प्रयास आपको अच्छा और प्रेरक लगा। हार्दिक धन्यवाद हौसला अफ़ज़ाई हेतु आदरणीय मनन कुमार सिंह जी।"
yesterday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ नववर्ष की पहली गोष्ठी में मेरी रचना पर आपकी और जनाब मनन कुमार सिंह जी की टिप्पणियों और…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"प्रेरक रचना।मार्ग दिखाती हुई भी। आज के समय की सच्चाई उजागर करती हुई। बधाइयाँ लीजिये, आदरणीय उस्मानी…"
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"दिली आभार आदरणीया प्रतिभा जी। "
yesterday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-130 (विषय मुक्त)
"हार्दिक आभार आदरणीय उस्मानी जी। "
yesterday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service