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नव जीवन--

"बाबू, बाबू" , बाबा के मुंह अस्पष्ट सी आवाजें निकल रही थीं | वो अब धीरे धीरे अपनी ऑंखें खोलने का प्रयास कर रहे थे | खून अभी भी उनकी कलाईयों में चढ़ रहा था और मैं उनके सिरहाने बैठा उनको सहला रहा था |

मुझे सुबह का घटनाक्रम याद आ गया जिसके चलते उनको चोट लगी थी | मैं उनका लाडला पोता था और मुझे वो हमेशा बाबू ही बुलाते थे | मैं कल ही गांव आया था और आज मुझसे मिलने गांव के कई लोग आ गए | उसी बीच एक दलित लड़का आ कर दरवाजे पर पड़ी खाट पर बैठ गया | बाबा ने कभी भी दलितों को बराबर नहीं समझा था , शायद यह…

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Added by विनय कुमार on January 4, 2015 at 1:34pm — 8 Comments

एक-एक शून्य(लघुकथा)

"देखिये श्रीमान आपका बेटा फिर से हर विषय में फेल हो गया है, किसी में 5, किसी में 6, किसी में 7 नंबर, इसीलिए आपको बुलाना पड़ा I लीजिये आप खुद ही इसकी सारी कॉपी देख लीजिये I" "

"अरे गुरूजी ये लीजिये, अब लिफाफा पकड भी लीजिये, आपका ही बच्चा है ,बस एक-एक शून्य लगा दीजिये I"

.

© हरि प्रकाश दुबे

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Hari Prakash Dubey on January 4, 2015 at 1:30pm — 12 Comments

"मेरी रचना" (अतुकान्त-कविता )

"मेरी रचना"    

                                                          

देखते-दिखाते

कभी सुनते-सुनाते

चलते –चलाते

कभी पढ़ते-पढ़ाते

कुच्छ करते-कराते

कभी बतियाते

न जाने कब यह  मन

पहुँच जाता कहां है

किसी देवता के

खेल चढ़े गुर की तरह

संबेदनाओं की टंकार से  

हो कर सम्पदित

द्रबित मन

यादों के ढेर पर से

काल की धूली हटाता

चपल भावों की लहरें

शब्दों के पतवार

वाक्यों की…

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Added by कंवर करतार on January 4, 2015 at 1:00pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पाँच दोहे

 

नये साल की ये सुबह, सुन कोयल का गान ।

मन में ऊर्जा भर गई, तन में आई जान ।।

 

सर्द हवा की ले छुअन, मुख से निकले भाप।

भला-भला सा लग रहा, अंगारों का ताप।।

 

समय वक्र की ऊर्ध्व गति, अधो उम्र की चाल।

जीवन जो है हाथ में, गड्ढे में ना डाल।।

 

बीत गया जो वर्ष तो, देखें ना लाचार।

अपने सपनों को मिले, एक नया आधार।।

 

मोहक आँखों को लगे, एक सुहाना दृश्य।

पीछे क्या सौंदर्य के, हो मालूम…

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Added by शिज्जु "शकूर" on January 4, 2015 at 12:30pm — 18 Comments

होगा सबको हर्ष.....

होगा सबको  हर्ष

जब होगा नव वर्ष

होगा सवेरा नवीन

संध्या होगी नवीन

दिवस  भी नया

होगी रजनी नई

गगन  भी नया

निर्मल सरिता नई

हिमांशु  नवीन  

रवि होगा नवीन

मुस्कुराए  वरुण  

रश्मि होगी अरुण

वे उर्मिल  किरण

करें आकांक्षी वरण

कोई हो न संकीर्ण  

होवें  पूर्ण  प्रवीण

आलोकित हो ......

खुशियों  की उमंग

रहे  बजता  मृदंग

बूढ़े बच्चे सब संग

झूमें खेलें नव रंग...

न…

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Added by anand murthy on January 4, 2015 at 12:30pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल --- ज़रा सा बाज़ आ जाओ

1222 / 1222 / 1222 / 1222

-

ग़ज़ल ने यूँ पुकारा है मेरे अल्फाज़, आ जाओ 

कफ़स में चीख सी उठती, मेरी परवाज़ आ जाओ

 

 

चमन में फूल खिलने को, शज़र से शाख कहती है 

बहारों अब रहो मत इस कदर नाराज़ आ जाओ





किसी दिन ज़िन्दगी के पास बैठे, बात हो जाए

खुदी से यार मिलने का करें आगाज़, आ जाओ





भला ये फ़ासलें क्या है, भला ये कुर्बतें क्या है

बताएँगे छुपे क्या-क्या दिलों में राज़, आ जाओ





हमारे बाद फिर महफिल सजा लेना…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 3, 2015 at 11:51pm — 61 Comments

नया साल आया

बीते वर्षों में जो भी मिला है मुझे

नहीं उससे कोई गिला है मुझे

नयन नीर मिले कुछ पीर मिले

दिल के राजा हैं ऐसे फ़कीर मिले

इन्हें राजा बना दें नया साल आया

खुशियाँ बिछा दें नया साल आया|

टुकड़े-टुकड़े किये जिनके सपनों को मैंने

खंडित किया जिनके अपनों को मैंने

व्यतित वर्ष में जिनका भी दिल दुखाया

हँसता हुआ मैंने जो महफ़िल जलाया

हँसी…

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Added by maharshi tripathi on January 3, 2015 at 6:51pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - बुलावा आज भी आता है, नदियों कोहसारों से ( गिरिराज़ भंडारी )

१२२२     १२२२     १२२२     १२२२२

कभी  आवाज  की  सूरत , कभी केवल  इशारों से

बुलावा  आज  भी  आता है , नदियों  कोहसारों से   

 

मैं प्यासा  तो  नहीं  हूँ पर  सराबों  से ये  पूछूंगा   

कि  बदली  क्यूँ  गुजरती ही  नहीं  है रेगजारों से

 

बड़ी   बेताब  सी  लहरें  बढ़ी  तो  हैं  ज़रा  देखें

वो  कहना  चाहती है क्या, अभी जाकर किनारों से

 

अभी  मायूसियाँ  छाई  हुयी हैं दिल में अन्दर तक

अभी कुछ दिन न आये घर , कोई कह दे बहारों…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 3, 2015 at 6:30pm — 19 Comments

गज़ल ~ मयकदे मेँ

212 212 212 2



आके ठहरा सफर मयकदे मेँ ।

अब तो होगी गुज़र मयकदे मेँ ।



उम्र भर की खलिश हम भुलाकर ,

हो गये बेखबर मयकदे मेँ ।



सुर्ख पैमाने छलका रहे हैँ ,

अब तो शामो सहर मयकदे मेँ ।



साकिया तेरा रहमो करम हैँ ,

बस गया मेरा घर मयकदे मेँ ।



मुद्दतोँ बाद हम पे हुयी है ,

वो नशीली नजर मयकदे मेँ ।



सुबह तक ये न उतरेगी मस्ती ,

झूम लो रात भर मयकदे मेँ ।



ऐ खुदा तेरी जन्नत मेँ क्या है ,

देख ले इक नजर… Continue

Added by Neeraj Nishchal on January 3, 2015 at 3:30pm — 8 Comments

गजल - मेरा दिल है कि गम का कारखाना है!

१२२२ १२२२ १२२२

मेरा दिल है कि गम का कारखाना है!
जगह यह अब सनम का कारखाना है!!

वे आँखे जुल्फ़,पलकें, रंग,लब,भौंहे!
वो चहरा है कि बम का कारखाना है!!

नहीं है सच यहाँ कुछ भी जो दिखता है!
ये दुनिया बस वहम का कारखाना है!!

गई है माँ तु जिस दिन से खुदा के घर!
ये घर तब से सितम का कारखाना है!!

कि इंसां तो ख़ताओं का है इक पुतला!
खुदा 'राहुल' रहम का कारखाना है!!

मौलिक व अप्रकाशित!

Added by Rahul Dangi Panchal on January 3, 2015 at 11:00am — 21 Comments

सिपाही (मत्तगयंद सवैया)


प्राण निछावर को तुम तत्पर,
भारत के प्रिय वीर सिपाही।
दुश्मन को ललकार अड़े तुम
अंदर बाहर छोड़ कुताही ।।
सर्द निशा अरू धूप सहे तुम,
देश अखण्ड़ सवारन चाही ।
मस्तक उन्नत देश किये तब,
मंगल जीवन लोग निभाही ।।
.................................
मौलिक अप्रकाशित

Added by रमेश कुमार चौहान on January 2, 2015 at 10:09pm — 10 Comments

गरीबी - एक विषय : डॉo विजय शंकर

कवि थे ,

गरीबी बहुत है ,

अच्छे वाक-जाल में

बयान की , कविता अच्छी बनी ,

मित्रों ने चाय-वाय की फरमाइश की ,

खूब वाह-वाही मिली ,

चाय-वाय रात भर चली ||



लेखक थे ,

गरीबी पर लेख छपा था ,

दिन भर बधाईयाँ आती रहीं ,

बहुत खुश थे , आग्रह भी था ,

ख़ास मित्रों ,पत्नी और बच्चों को ,

मंहगे रेस्त्रां में डिनर पर ले गए ,

गरीबी पर डिस्कशन खूब हुआ ,

खाना - पीना देर रात तक हुआ ,

देर हो ही गयी , रात देर से लौटना हुआ ॥



फ्री… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on January 2, 2015 at 8:23pm — 20 Comments

तरही गजल

1212-1122-1212-112

" ये सच है काम हमारा तो बेमिसाल नहीं "

मिला सुकून जो दिल को तो अब मलाल नहीं



बिना क़सूर ही मैं बज़्म से निकाला गया

गज़ब के पूछा किसी ने कोई सवाल नहीं



मैं अपने खुद के ही दम पर जहाँ में जी लूँगाा

जो हौंसला हो अगर कुछ भी फिर मुहाल नहीं



वफ़ा की राह पे चल कर किसी को कुछ न मिला

मगर मैं ज़िन्दा हूँ अब तक ये क्या कमाल नहीं



तमाम रात अंधेरे से वो मुकाबिल था

थका थका सा लगे है, दिया निढ़ाल नहीं…



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Added by दिनेश कुमार on January 2, 2015 at 8:22pm — 20 Comments

"पीपल वही पुराना हो"

नवजीवन में नव आशा से

नव नूतन कुछ कर्म करें

नव भक्ति से नव शक्ति से

शुभ नया वर्ष प्रारम्भ करें !

नयी सोच हो नए इरादे

नव सरिता की गागर हो

लक्ष्य नए आयाम नए

नव अभिलाषा का सागर हो !

नव बातें नव किस्सें हो

पर पीपल वही पुराना हो

हो ताल नयी हो राग नए

पर मन में वही तराना हो !

हो नया जोश हो नया सफ़र

नव नौका हो नव धारा हो

नव रिश्तें हों नव जीवन के

पर प्रेम पुरातन प्यारा हो…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 7:00pm — 20 Comments

आँधियों में ही दीपक जलाते हैं हम

२१२/  २१२/    २१२   /२१२

आँधियों में ही दीपक जलाते हैं हम

आहिनी हैं इरादे दिखाते हैं हम

 

आपको देखते देखते क्या हुआ!

आईये दिल की धड़कन सुनाते हैं हम

 

चाँद के सामने चाँद कैसा लगे

सोच कर भी न कुछ सोच पाते हैं हम

 

आईने पर हमारी नजर जब पडी

सोच कर हंस दिए क्या छुपाते हैं हम

 

बेबफा ही सही प्यार तो प्यार है

याद आता है जितना भुलाते हैं हम

 

दोस्तों पे यकी आज भी है हमें

दोस्ती की…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 2, 2015 at 5:39pm — 23 Comments

कुछ नये काफ़िये --- ग़ज़ल धार समय की --३

किस सागर में जान मिलेगी धार समय की

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की

तेरी यादों की बूबास घुलेगी ज्यूं ज्यूं

बढ़ती जाएगी त्यूं त्यूं महकार समय की

वक़्त कहाँ मिलता है दुनियावी पचड़ों से

मेरी ग़ज़लें सारी है बेकार समय की

वक़्त सिकंदर विश्व-विजेता सदियों से है

सुल्तानी लाफ़ानी है सरदार समय की

चंदा-सूरज गगन-पवन सब मौन खड़े हैं

आयु कौन बतलायेगा सुकुमार समय की

बैर भूलकर मीत बनें  सब  एक…

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Added by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 2:43pm — 18 Comments

नव वर्ष कहलायेगा.............

नव वर्ष कहलायेगा.......

ऐ भानु

तुम न जाने

कितनी सदियों को

अपने साथ लिए फिरते हो

सृजन और संहार को

अपने अंतःस्थल में समेटे

खामोशी से

न जाने किस लक्ष्य की प्राप्ति में

प्रतिदिन स्वयं की आहुति देते हो

आश्चर्य है

धरा के संताप हरने को

अपने सर पर ताप लिए फिरते हो

आदिकाल से

प्रतिदिन अपनी केंचुली बदलते हो

हर आज को काल के गर्भ में सुलाते हो

फिर नए कल के लिए

नए स्वप्न लिए भोर बन के आते हो…

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Added by Sushil Sarna on January 2, 2015 at 1:00pm — 14 Comments

"घर जला अपना जश्न कब तक मनाओगे"

राजा बहुत हैं, शतरंज के इस खेल में,

इनक़लाब का शोर कब तक मचाओगे ?

 

अभाव बहुत हैं, अंधेरों के इस खेल में ,

गीत उजियारो के कब तक सुनाओगे  ?

 

तलवारें बहुत हैं, अधर्म के इस खेल में,…

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Added by Hari Prakash Dubey on January 2, 2015 at 3:10am — 17 Comments

ग़ज़ल- भाग २ धार समय की 8 + 8 + 8 (रोला मात्रिक)

किस सागर में  जान मिलेगी  धार  समय की 

कौन पकड़ पाया जग में रफ़्तार समय की 

युगों युगों तक फैला है कुहसार  वसन  का                       कुहसार =पर्वतांचल 

कौन अज़ल से  बाँध रहा  दस्तार  समय की                    दस्तार = पगड़ी 

नोक कलम की  पर रखते हैं  काल तीन हम 

केवल हमने  स्वीकारी  ललकार  समय की 

ख़ार दर्द के  चुनकर गीत  उगायेंगे  हम 

कर जायेंगे  वादी  हम गुलज़ार  समय की 

तू  ऊषा की लाली   मैं संध्या  का…

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Added by khursheed khairadi on January 2, 2015 at 1:28am — 11 Comments

बिना तुम्हें बताए

बिना तुम्हें बताए

अजीब प्रश्न हैं तुम्हारे

यूँ जैसेकि चक्रव्यूह

दिल-दिमाग भिड़ गए

बोलो किस माध्यम से उत्तर दूँ|

सच है! तुम्हारा जाना खलेगा

क्योंकि तुम्हारे जाने से बनेगा

एक शून्य |

जिसे सिर्फ़ तुम भर सकती हो

और मेरे आस-पास जो उदासी है

उसमें कलरव कर सकती हो||

पर तुम्हारा जाना भी बुरा नही है

क्योंकि मैं इससे व्यर्थ के सपने

देखने से बच सकता हूँ

अपनी दुनिया नए ढंग से रच सकता…

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Added by somesh kumar on January 1, 2015 at 11:30pm — 4 Comments

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