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उनको अपने पास लिखूँ क्या?

उनको अपने पास लिखूँ क्या?
वो मेरे हैं ख़ास लिखूँ क्या?

तारीफ़ बहुत कर दी उनकी।
अपना भी उपहास लिखूँ क्या?

संत नहीं वह व्यभिचारी है।
उसका भी सन्यास लिखूँ क्या?

जिसने मेरा सबकुछ लूटा।
उसपे है विश्वास लिखूँ क्या?

जिसकी कोई नहीं कहानी।
उसका भी इतिहास लिखुँ क्या?

बूँद बूँद को तरसा है जो।
उससे पूँछो प्यास लिखुँ क्या?
************************
वज़्न_22 22 22 22
-राम शिरोमणि पाठक
मौलिक।अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2015 at 7:26pm

एक बहुत बढिया ग़ज़ल के लिए दिल से बधाई, भाई रामशिरोमणि.

और,
आखिरी दो शेरों के रदीफ़ का ’लिखूँ’ ’लिखुँ’ हो गया है.
सुधार करवा लें.

Comment by ram shiromani pathak on January 5, 2015 at 10:56am
आदरणीय डॉ विजई जी बहुत आभार आपका।
Comment by ram shiromani pathak on January 5, 2015 at 10:55am
सोमेश भाई बहुत बहुत आभार आपका
Comment by Dr. Vijai Shanker on December 31, 2014 at 10:36am
सुन्दर , बधाई, आदरणीय राम शिरोमणि पाठक जी, सादर।
Comment by somesh kumar on December 30, 2014 at 2:20pm

dusra aur panchva sher zyada achche lge ,bhai

Comment by ram shiromani pathak on December 30, 2014 at 10:48am
आदरणीय खुर्शीद जी हार्दिक आभार आपका।।सादर
Comment by ram shiromani pathak on December 30, 2014 at 10:47am
आदरणीय हरि प्रकाश जी आभार आपका
Comment by ram shiromani pathak on December 30, 2014 at 10:46am
भाई मिथिलेश जी हार्दिक आभार आपका
Comment by ram shiromani pathak on December 30, 2014 at 10:45am
शिज्जू भाई बहुत आभार आपका।।सादर
Comment by khursheed khairadi on December 30, 2014 at 10:36am

आदरणीय शिरोमणि जी उम्दा ग़ज़ल हुई है ,सादर अभिनन्दन |

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