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गीतिका

गीतिका, आधार छंद- वाचिक महालक्ष्मी

(212 212 212)



शब्द अब गीत रचने लगे,

राज़ दिल के बिखरने लगे। /1/

दोस्त दुश्मन सभी दूर हैं

अब स्वयं को समझने लगे। /2/



नौकरी रिश्वतों से मिली,

आज अक्षम चमकने लगे। /3/



ठोकरें दीं सभी ने हमें,

पैर रखकर कुचलने लगे। /4/



प्रेम, दोस्ती रही आज तक,

शक हमें दूर रखने लगे। /5/



युग्म जुड़ कर करेंगे भला,

गीतिका-भाव भरने लगे। /6/



(मौलिक व अप्रकाशित)

_शेख़…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 8, 2015 at 8:07am — 9 Comments

नन्हें दिल की जीत (लघु कथा)

“बेटे सुजित, कहाँ हो” शर्मा जी अपनी चाबी से मुख्य दरबाजा खोलते ही अंदर अँधेरा देख बोले Iआबाज लगाते लगाते ही घर की बत्तियाँ जलाने लगे Iज्यों ही बेटे वाले कमरे की बत्ती का बटन दबाया, कक्षा दो  में पढ़ने बाले बेटे को मोबाइल पर अपने नन्हें दोस्तों से व्हाट्स एप पर चैटिंग करते देख डांटते  हुए बोले, “हर समय बस चैटिंग-चैटिंग, कुच्छ होम वर्क कर लेते I उठो, जाओ अपना होम वर्क करो I”

     “आइ एम सॉरी पापा --” रुआंसा हुआ सुजित बोला, “ पर पापा --आप सुवह मेरे स्कूल जाने से पहले आफिस निकल जाते हो और…

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Added by कंवर करतार on October 7, 2015 at 10:00pm — 6 Comments

लघुकथा तीसरी सवारी

"जल्दी करो भाई, देर हो  हो रही मुझे , आज तुझे छोड़, तेरी माँ को अस्पताल  भी दिखा कर फिर ड्यूटी जाऊँगा ” महिंद्र ने नवीन की तरफ देखते हुए कहा । मुश्किल से  दो घंटे की छुट्टी मिली थी ,जल्दी  चलें, तीनों बाहर आए और  मोटर साईकल पर सवार हो  घर से निकल पड़े, अभी चोंक पर आ के रुके तो ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम ने रोक कर एक तरफ मोटर साईकल खड़ा करके कागज़ दिखाने के लिए कहा, तब महिंद्र ने  धीमी आवाज़ से  कहा “मुलाज़िम हूँ । बीवी ठीक नहीं है इसे अस्पताल दिखाने जा रहें हैं ।”  मगर ट्रैफिक पुलिस के मुलाज़िम…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 7, 2015 at 9:30pm — 2 Comments

पुनर्जीवन (लघुकथा-3)

"गृहस्थी को ठीक ठाक से चलाते हुए कई बार दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।"

मनोज के मन में भारी द्वन्द्व चल रहा था।

अचानक पड़ी कठिनाई को हल कर पाने में स्वयम् को असमर्थ और असहाय महसूस कर रहा था वह।गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में दिमाग़ में आया अभी ही का विचार उसकी पीड़ा से धुन्धला हुआ जा रहा था।और उसने इह लीला समाप्ति को ही सभी समस्याओं का एक मात्र एवम् सम्पूर्ण हल समझ लिया।गहन गर्मी की उस दोपहर में मनोज सिर से सापा खोल अपने इरादे पर मुहर लगाने के लिए उसे हाथ में ले पेड़ पर चढ़ने… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 7, 2015 at 8:23pm — 6 Comments

"प्रत्युत्तर पैरोडी पर" - [लघु कथा]

क्रिकेट मैच जीतने के बाद मोहल्ले के लड़के जश्न मनाते हुए एक टीले पर बैठे हुए थे। मोटू सोनू ने अपनी टाइट शर्ट के बटन सही करते हुए कहा- "अब मैं करता हूँ आमिर खान की नकल ! टी.वी. पे वो नया विज्ञापन देखा है न....

"हम अब भी वहीं के वहीं खड़े हैं, न हम बदले, न हम मोटे हो रहे हैं।

ये तो कमबख़्त कपड़ों की है शरारत, जो अपने आप छोटे हो रहे हैं! "

"वाह, क्या बात है, इसी पे पैरोडी हो जाये। बोल संजू अब तू बोल "- उनमें से एक ने कहा।

संजू शुरू हो गया- "हम अब भी वहीं खड़े हैं, न हम बदले,…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 7, 2015 at 11:00am — 6 Comments

''फ़लक पे सितारे चमक करके रोये'' (गज़ल)

१२२  /१२२  /१२२  /१२२

उजाले बहाये धधक करके रोये

फ़लक पे सितारे चमक करके रोये।

 

कोई चाँदनी बेवफ़ा तो थी वर्ना

क्यूँ सीना जलाये दहक करके रोये।

 

नमक इश्क का पी बहुत थीं ये आँखें

अदा अब ये सारे नमक करके रोये।

 

जो गम हम मिटाने चले जाम उठाने  

तो पैमाँ भराये छलक करके रोये।

तेरी खुश्बुओं से घर आँगन भराया

शजर फूल सारे महक करके रोये।

 

सलामत रहे तू दुआ है  हमारी

ये सुन गम…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 9:24am — 11 Comments

गजल(मनन)

गजल

2212 2212 2212

कुछ कुछ उठा कर कब्र से लाया गया

बिसरा हुआ संगीत सुनवाया गया ।

मतदान की होते यहाँ पर घोषणा

फिर कुंद वह हथियार चमकाया गया।

देते रहे गाली परस्पर थे बहुत

मिलकर गले उनके लिपट जाया गया।

देते रहे थे घाव अबतक तो वही

फिर से सभी जख्मों को' धुलवाया गया।

कितने अपावन हो गये जो साथ थे

जो था अपावन नेह नहलाया गया।

हम-तुम हमेशा साथ थे आगे रहें

ऐसा अभी फरमान चिपकाया गया।

घर-घर लगायी आग सब सोये रहे

संपर्क कर फिर वर्ग… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 6, 2015 at 11:09pm — 3 Comments

तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे .....

तुम न समझ पाओगे

मुहब्बत की ज़मीन पर

कतरा कतरा बिखरते

रूमानी अहसासों के सायों का दर्द

तुम तो बुत हो

सिर्फ बुत

जिसपर कोई रुत असर नहीं करती

तुम से टकराकर

हर अहसास संग -रेज़ों में तक़सीम जाता है

और साथ चलते साये का वज़ूद

सिफर में तब्दील हो जाता है

रह जाते हैं बस शानों पर

स्याह शब में गुजरे चंद लम्हे

जो आज मुझे किसी माहताब में

लगे दाग़ की तरह लगते हैं

तुम्हारी याद का हर अब्र

मेरी चश्म…

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Added by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 9:42pm — 10 Comments

कस्तूर हो गयी हो

2212 122 2212 122



क्या आदतों से अपनी, मज़बूर हो गयी हो।

आँखों से मेरी काहें, तुम दूर हो गयी हो।।



सपनों में उनसे मिलता, कुछ हाल चाल कहता।

लेकिन बहुत बुरी हो, मग़रूर हो गयी हो।।



आती नहीं कभी भी, मिलने तू हमसे निदिया।।

यूँ छोड़ कर हमें तुम, मफ़रूर हो गयी हो।।



जगता रहा हूँ कब से, बीती हैं कितनी रातें।

पंकज से दुश्मनी कर, मशहूर हो गयी हो।।



तुझमें मेरे सनम में, कुछ साम्य लग रहा है।

सच सच बता रहा हूँ, कस्तूर हो गयी… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 6, 2015 at 6:13pm — 9 Comments

ममत्व -विस्तार/लघुकथा

'ममत्व-विस्तार'

'कितने दिन हो गए बेटा .....तुम्हे ...घर को छोड़े हुए।",बहुत दिन बाद मिले अपने बेटे को बूढ़ी माँ ने याचना पूर्वक कहा।

"बेटे! तुम्हे पढ़ाया-लिखाया,काबिल बनाया ताकि तुम ठीक प्रकार से अपनी गृहस्थी और काम सम्भाल सको।पर तुम पर पता नहीं किस पागलपन की धुन सवार है।जो किसी के बारे में नहीं सोचते और किसी कई भी नहीं सुनते।"

"ऐसा क्यों कहती हो माँ कि मैं किसी के बारे में कुछ नहीं सोचता?"

"सोचते तो ,ऐसा बर्ताव करते?कभी घर की सुध लेते हो?"

"माँ!तेरा ये लाल समाज और देश… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2015 at 6:02pm — 2 Comments

औपचारिकता – ( लघुकथा )

 औपचारिकता –  ( लघुकथा )  

 शहर के मशहूर,युवा व्यवसायी और समाजसेवी राहुल जी का सडक हादसे में निधन हो गया!पार्थिव शरीर घर आ गया था!सारा शहर उमड पडा था!कोठी में पैर रखने को जगह नहीं थी!मातम का माहौल  था!औरतों के रोने  के अलावा अन्य कोई आवाज़ नहीं आरही थी! करीबी  लोग दाह संस्कार की व्यवस्था में लगे थे!

राहुल जी के बहनोई विनोद जी भी मौजूद थे!मगर वे जब से आये थे , तभी से अपने मोबाइल को कान से लगाये हुए थे!अन्य सभी उपस्थिति लोगों ने माहौल की नज़ाकत को देखते हुए अपने मोबाइल बंद कर दिये…

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Added by TEJ VEER SINGH on October 6, 2015 at 5:25pm — 6 Comments

जोड़ का तोड़ / लघुकथा

पूरे पच्चीस हजार ! ठीक से गिनकर रूपये पर्स में रखे उसने ।

किटी पार्टी खत्म होते ही उमंग भरी तेज कदमों से पर्स को हाथों में भींच घर की तरफ निकल पड़ी ।

पच्चीस महीने में एक बार ये अवसर आता है । हर महीने घर- खर्च से बचा - बचा कर ही यहाँ पैसे भरती रही है ।



" माँ ,आ गई तुम , क्या इस बार भी नहीं खुली तुम्हारी किटी ? "



" खुल गई , देख ! "



" अब तो मेरा कम्प्यूटर आ जायेगा ना ? "



" हाँ , अब उतावली ना हो ,आ जायेगा । "



" देखना माँ ,अबकी बार… Continue

Added by kanta roy on October 6, 2015 at 4:00pm — 12 Comments

"मिथ्या अतिविश्वास" -- [लघु कथा -12]

"मिथ्या अतिविश्वास" - (लघु कथा)



"आप लोग मुझ पर क्यों बरस रहे हैं ? आपसे ज़्यादा पढ़ा-लिखा हूँ।अख़बार और क़िताबें ही नहीं पढ़ता, इन्टरनेट तक खंगाल डालता हूँ !"



रूपेश के ये शब्द सुनकर पड़ोसी शर्मा जी ने उसे समझाया- " अच्छी बात है, लेकिन जो तुमने किया, उसे सही नहीं कह सकते। क्या ज़रूरत थी अपने मन से दवाओं में कटौती करने की और दवायें खुद ही बदलने की ? आखिर तुमने अपने पिताश्री को इतनी कम उम्र में इतनी सीरियस कन्डीशन में पहुंचा ही दिया न ! साइड इफेक्ट्स के बारे में अपने डॉक्टर… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 12:07pm — 4 Comments

"कड़वी याद" -- [लघु कथा-11]

"कड़वी याद"--(लघु कथा)



ख़ूबसूरत पूजा ने बुरा सा मुँह बनाकर डैडी को कोहनी मार के सामने बैठे श्रीमान की तरफ संकेत किया। डैडी ने इसी तरह अपनी पत्नी को इशारा किया, तो होंठ भींचते हुए उन्होंने इशारे से उन दोनों को शान्त रहने को कहा। कुछ सकपकाते-घबराते से श्रीमान अपनी पत्नी से धीमे स्वर में बोले- "चलो शालू, आगे वाली बोगी पूरी खाली हो गई है, वहां अच्छी सीट मिल जायेगी ।"

"क्यों भला, यहीं तो ठीक है ?"

"मैंने कहा न, उठो"- पत्नी का हाथ खींचते हुये शर्म से आँखें झुकाये श्रीमान वहां से… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 8:29am — 3 Comments

"माया और काया" -- [लघु कथा-10]

"माया और काया" - (लघु कथा)



"वाकई बहुत अच्छा गुजरा यह एक घंटा पार्क में ... पर अब तो बताओ, तुम ने लेगी-जीन्स वगैरह छोड़ कर आज मेरी पसंद की ये साड़ी क्यों पहनी ?"-अपने पति के इस सवाल को अनसुना सा कर मालती उसे काफी दिनों बाद एक टक देख रही थी।



"पीयूष, तुम सचमुच सुंदर हो, सूरत से ....और... सीरत से भी !" अपना सिर उसकी गोदी में रखकर वह बोलती गई-"मेरे बिना मेकअप वाले सादे रूप में जिस सहजता से मुझे निहारते हुये जब तुम मुझसे बातें करते हो न, तो... तो पता नहीं क्यों मुझे अजीब सी सुखद… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 6, 2015 at 7:31am — 6 Comments

पुरस्कार ( लघुकथा )// शशि बंसल

चिर प्रतीक्षित पत्रिका का अंक हाथ में आते ही कुसुम ने जल्दी-जल्दी पन्ने पलटने शुरू कर दिए । उसकी दृष्टि विशेष पृष्ठ पर जाकर ठहर गईं । हर्षातिरेक से दौड़कर पापा के पास पहुँची।" पापा , आज मैंने आपका सिर गर्व से ऊँचा कर दिया ।ये देखिये इस प्रतिष्ठित पत्रिका द्वारा आयोजित आलेख प्रतियोगिता में मुझे प्रथम पुरस्कार मिला है और आप हो कि सदा ही मुझे लिखने - पढ़ने से डाँटते रहते हैं । ये तो मम्मी है जो मुझे सदैव प्रोत्साहित करती हैं और लिखने में सहायता करतीं हैं ।"



उन्होंने कुसुम के हाथों से… Continue

Added by shashi bansal goyal on October 5, 2015 at 8:44pm — 7 Comments

चाक है हमारी पृथ्वी

कुम्हार हैं हम
सपनों को दीयों
हंडियों
और गुल्लकों की
शक्ल देते हुए
समय और बाज़ार से बेख़बर
चाक के साथ
घुमाते हैं अपनी ज़रूरतें
नही जानते
कि चाक है हमारी पृथ्वी
और बदलने के लिए
समय और मौसम
पृथ्वी का अपने अक्ष पर
घूमना आवश्यक है......

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Jayprakash Mishra on October 5, 2015 at 4:27pm — 5 Comments

ब्लैकमेल(लघुकथा)

'ब्लैकमेल'

"अब तो बस करो। पहले ही लाखों रूपए दे चुका हूँ तुम्हें इस मामले को निपटाने के।"

"हा हा....बस दस लाख और।...... उन लोगों को भी तो देने हैं..........जिन्होंने......पूरी योजना बनाई....और उसे..... सफल बनाने में हमारा साथ दिया।"

"देखो इतना ब्लैकमेल करना ठीक नहीं है।किसी शरीफ़ आदमी को झूठे छेड़-छाड़ के मामले में फंसाना और उससे लाखों ऐंठ कर भी उसे चैन से न जीने देना बहुत गलत और बुरा है।और तुम ख़ुद को समाजसेवक कहते हो।"

"ऎसे ही तो समाज सेवा करती है हमारी संस्था 'प्रयास-एक… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 5, 2015 at 9:26am — 8 Comments

उलटी गंगा (लघुकथा )

  

उलटी गंगा

बात जब तक  घर में  थी, सभी परिवार के मैंबर  उसे समझा रहे थे । ये तुम  गलत कर रहें हो ,रौशनी का ख्याल हमें पहले रखना चाहिए था, न कि अब हमसाया के  घर की तरफ खिड़की रख कर । मगर वह अपनी फौजियों सी  ज़िद छोड़ नहीं  रहा था ।

पड़ोसी तो इस कि बारे पहले ही विरोध दर्ज करवा चुके थे, “क्योंकि कि बिल्डिंग के पीछे कोई अधिकारित रास्ता न होने की वजह से अपना हक भी नहीं बनता है” उसकी घर वाली ने कहा।  पड़ोसी  के  पास अब क़ानूनी करवाई कि सिवाए कोई चारा नहीं रहा था ।  पर फिर…

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Added by मोहन बेगोवाल on October 4, 2015 at 7:30pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ ( गिरिराज भंडारी )

1222    1222    122 

बहुत बेकार सा चर्चा रहा हूँ

मैं सच हूँ, आँख का कचरा रहा हूँ

 

बहा हूँ मै सड़क पर बेवजह भी

लहू इंसाँ का हूँ , सस्ता रहा हूँ

 

जो समझा वो सदा नम ही रहा फिर

मै आँसू ! आँखों से बहता रहा हूँ

 

महज़ इक बूँद समझा तिश्नगी ने

भँवर के वास्ते तिनका रहा हूँ

 

जलादूँ एक तो बाती किसी की   

इसी उम्मीद में दहका रहा हूँ   

 

मुझे मानी न पूछें ज़िन्दगी का

अभी…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 4, 2015 at 10:43am — 28 Comments

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