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ये "कैसी"... 'होली'...???

 

'हंसी-ठिठोली', मस्तियों की "टोली"... करें 'अठखेली', बन "हमजोली"...

हर 'साल' की तरह... लो फिर आई "होली"... ... ...…

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Added by Julie on March 19, 2011 at 6:30pm — 9 Comments

ऐसे खेलो फाग

ऐसे खेलो फाग, राग -रंग मन में जागे.
नफ़रत रंग से यूँ धुल जाए, बस अपनापन लागे.
बस अपनापन लागे,यही होली का रंग है.
इसे खेलने का सबका,पर अपना -अपना ढंग है.
कोई दूर से भर पिचकारी,गोरा अंग भिंगाये.
कोई गोरे गाल पे मल-मल,लाल गुलाल लगाए.
दूर -दूर से देखके जिनको, थक गए थे ये  नैन.
वही खड़ी थी पास हमारे, होली की थी रैन.
होली की थी रैन, फ़ायदा झट से उठाया.
उनके रुखसारों पे, धीरे -धीरे रंग…
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Added by satish mapatpuri on March 19, 2011 at 2:46pm — 5 Comments

कविता : - रंगों की बूँदें

 

कविता : - रंगों की बूँदें

लाल लाल हरी…

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Added by Abhinav Arun on March 19, 2011 at 1:30pm — 3 Comments

होली आई रे आई रे होली आई रे ,

होली आई रे आई रे होली आई रे ,

लेकर दोस्तों की तकरार ,

संग में चुनावी तेवहार ,

देखो दोस्त करे लड़ाई रे ,

होली आई रे आई रे होली आई रे ,

आगे पार्नव  की पुकार  ,

फिर दीदी का बेवहार ,

करे कभी मिलन कभी जुदाई रे ,

होली आई रे आई रे होली आई रे ,

कांग्रेस में मची हाहाकार ,

लाल भी थोड़ा परेशान ,

हिंदी भासियो की यहा नहीं कोई सुनवाई रे ,

होली आई रे आई रे होली आई रे ,

सबका डंका बाजे यार ,

जीतेगा होगी जय जयकार ,

जित के लिए हैं जरुरी… Continue

Added by Rash Bihari Ravi on March 18, 2011 at 6:09pm — No Comments

holi hai

होली की मुबारकबाद के साथ आप के लिए चन्द दोहे
 
सहजन फूला साजना,महुआ हुआ कलाल
मौसम दारु बेचता,हाल हुआ बेहाल
 
गेंहू गाभिन गाय सा,चना खनकते दाम
महुआ मादक हो गया,बौराया है आम
 
गौरी है कचनार सी,नैनों भरा उजास
पिया बसंती हो गए,आया है मधुमास
 
फगुनाया मौसम हुआ,अलसाया सा गात
चौराहे होने लगी तेरी मेरी बात
 
सतरंगी है…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 18, 2011 at 12:42pm — 4 Comments

इन अकेली वादियों में चले आये

इन अकेली वादियों में चले आये

(मधु गीति सं. १७१७, दि. १० मार्च, २०११)

 

इन अकेली वादियों में चले आये, भरा सुर आवादियों का छोड़ आये;

गान तुम निस्तब्धता का सुन हो पाये, तान नीरवता की तुम खोये सिहाये.…

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Added by GOPAL BAGHEL 'MADHU' on March 17, 2011 at 1:06pm — 2 Comments

ग़ज़ल - उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में

OBO पर आकर बहुत अच्छा लगा. यहाँ पर एक से एक उस्ताद शायर और कवियों की रचनाएं पढ़कर आनंद आ गया.

अपनी एक नयी ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ, आप सब से मार्गदर्शन की आशा है.



अँधेरा है नुमायाँ बस्तियों में

उजाले कैद हैं कुछ मुट्ठियों में



ये पीकर तेल भी, जलते नहीं हैं…

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Added by Saahil on March 16, 2011 at 8:07pm — 11 Comments

ग़ज़ल :- कहीं कोई कमीं है

ग़ज़ल :- कहीं कोई कमीं…

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Added by Abhinav Arun on March 13, 2011 at 1:30pm — 6 Comments

यूँ हुआ क्यूँ कर

 
ज़िक्र बदरंग हर हुआ क्यूँ कर
हर ख़ुशी के लिए दुआ क्यूँ कर
 
नाव कागज़ की खूब तैरे है 
आदमी इस तरह  हुआ क्यूँ कर
 
आज तक धडकनों में तूफां हैं 
आप ने इस क़दर छुआ क्यूँ कर
 
लोग चुपचाप क़त्ल देखे है
कौन पूछे कि ये हुआ क्यूँ कर
 
या कि राजा है या कि रंक यहाँ 
ज़िन्दगी  इस क़दर जुआ क्यूँ कर
 
मैंने रस्ते बनाये आप…
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Added by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 11, 2011 at 12:00am — 6 Comments

ग़ज़ल : हर अँधेरा ठगा नहीं करता

हर अँधेरा ठगा नहीं करता

हर उजाला वफा नहीं करता

 

देख बच्चा भी ले ग्रहण में तो

सूर्य उसपर दया नहीं करता

 

चाँद सूरज का मैल भी ना हो

फिर भी तम से दगा नहीं करता

 

बावफा है जो देश खाता है

बेवफा है जो क्या नहीं करता

 

गल रही कोढ़ से सियासत है

कोइ अब भी दवा नहीं करता

 

प्यार खींचे इसे समंदर का

नीर यूँ ही बहा नहीं करता

 

झूठ साबित हुई कहावत ये

श्वान को घी पचा नहीं…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 8, 2011 at 11:30pm — 6 Comments

'औरत'... "आज"...!!

 

(("महिला-दिवस" पर महिलाओं को 'समर्पित'...))

----…

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Added by Julie on March 8, 2011 at 8:38pm — 9 Comments

मैं और आगे बढ़ते जाती हूँ

दिन-प्रतिदिन स्वयं में ही ध्वस्त हो

विच्छेद हो कण-कण में बिखर जाती हूँ

आहत मन,थका तन समेटे दुःसाध्यता से…

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Added by Venus on March 8, 2011 at 5:30pm — 3 Comments

महिला दिवस पर विशेष

सृष्टि की अनमोल कृति
कभी दुलारती मां बन जाती
कभी बहन बन स्नेह जताती
बेटी बन जब पिया घर जाती
आँसू की धारा बह जाती
कभी पत्नी बन प्यार लुटाती
बहु बन घर को स्वर्ग बनाती
नारी तेरे बहुविध रूपों से
यह संसार चमन है
महिला दिवस पर हर नारी को बारम्बार नमन है
दुष्यंत...

Added by दुष्यंत सेवक on March 8, 2011 at 12:00pm — 5 Comments

एक कविता: धरती _____ संजीव 'सलिल'

एक कविता

धरती

संजीव 'सलिल'

*

धरती काम करने

कहीं नहीं जाती

पर वह कभी भी

बेकाम नहीं होती.

बादल बरसता है

चुक जाता है.

सूरज सुलगता है

ढल जाता है.

समंदर गरजता है

बँध जाता है.

पवन चलता है

थम जाता है.

न बरसती है,

न सुलगती है,

न गरजती है,

न चलती है

लेकिन धरती

चुकती, ढलती,

बंधती या थमती नहीं.

धरती जन्म देती है

सभ्यता को,

धरती जन्म देती है

संस्कृति को.

तभी ज़िंदगी

बंदगी बन पाती है.

धरती… Continue

Added by sanjiv verma 'salil' on March 7, 2011 at 5:38pm — 2 Comments

मुक्तिका: बड़े नेता... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

बड़े नेता...



संजीव 'सलिल'

*
बड़े नेता.

सड़े नेता. .



मरघटों में

गड़े नेता..



स्वहित हेतु

अड़े नेता..



जड़, बिना जड़

जड़े नेता..…





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Added by sanjiv verma 'salil' on March 7, 2011 at 5:30pm — 3 Comments

वक़्त कुछ बहका है ऐसे

कल ही था कि जब छिपाकर, फेंक देते थे हम दातुन,

नीम क़ी कड़वी तबीयत, अब दवाई हो गयी है;

कल ही था जब जेठ क़ी, दुपहरी में हम गुल खिलाते,

गर्मियों क़ी दोपहर, अब बेईमानी हो गयी है;

आमों क़ी वे अम्बियाँ, थे हम कल जिनको चुराते,

बिकती हैं बाज़ार में वो, मेहरबानी हो गयीं हैं;

और ईखों की बदौलत, राब थे हम कल बनाते,

ताज़े गुड़ की भेलियाँ अब इक कहानी हो गयीं हैं.



वक़्त कुछ बदला है ऐसे,

जैसे फ़िल्मी गीतों में अब, नृत्य के अंदाज़ बदले;



कल तक लिखे जिन खतों… Continue

Added by neeraj tripathi on March 7, 2011 at 5:48pm — 12 Comments

अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी!

8 मार्च -अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष



जंग ए आजादी के दौर में राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने आंख के आंसूओं में अपनी कलम डूबाकर इन पंक्तियों की रचना की थी

अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी !

आंचल में है दूध और आंखों में पानी

आज़ादी के दौर में यह कहानी बहुत कुछ बदल चुकी है। देश की महिलाएं  सातवें आसमान में देश का झंडा गाड़कर कल्पना चावला बन रही हैं। किरन बेदी बनकर अपराधियों से लोहा ले रही हैं। अरुणा राय और मेधा…

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Added by prabhat kumar roy on March 7, 2011 at 7:00am — No Comments

मै तो एक पागल कवि हूँ

                                                        मै  तो एक पागल  कवि हूँ
क्या फर्क पड़ता है 
मै तो एक पागल कवि हूँ 
तम को काटता रवि हूँ
कौन किसलिए जीता है 
कौन किसलिए पीता है 
ज़िन्दगी तो सीता है 
कर्मो की गीता है 
भाग्य विपरीता है 
यहाँ तो हर कोई 
बस अपने लिए जीता है  
मै तो राम की सीता हूँ 
गीतों की गीता हूँ 
पर…
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Added by arvind yogi on March 5, 2011 at 11:43pm — 3 Comments

ताकि गुजर ना जाए गोधरा



दोस्तों, गुजरात में 2002  में हुए गोधरा काण्ड में विशेष अदालत ने 11  लोगों को मौत और 20 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई  है. आप सब जानते हैं तब गोधरा और गुजरात में क्या हुआ था. इसी विषय पर मेरी अभिव्यक्ति गौर फरमाएं :  
 …


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Added by Akhileshwar Pandey on March 1, 2011 at 4:30pm — 3 Comments

भूले से भी नहीं !!!



तुम मुझसे ज़िन्दगी के गीत सुनना चाहते हो
चाहते हो मैं सबकुछ भूलकर सहज हो जाऊँ
हंसाऊं ... एक गुनगुनाती शाम ले आऊं ...
तुम्हें पता है
ज़िन्दगी मेरे पास है
गुनगुनाती लहरें…
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Added by rashmi prabha on February 28, 2011 at 7:30pm — 18 Comments

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