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ज़िक्र बदरंग हर हुआ क्यूँ कर
हर ख़ुशी के लिए दुआ क्यूँ कर
 
नाव कागज़ की खूब तैरे है 
आदमी इस तरह  हुआ क्यूँ कर
 
आज तक धडकनों में तूफां हैं 
आप ने इस क़दर छुआ क्यूँ कर
 
लोग चुपचाप क़त्ल देखे है
कौन पूछे कि ये हुआ क्यूँ कर
 
या कि राजा है या कि रंक यहाँ 
ज़िन्दगी  इस क़दर जुआ क्यूँ कर
 
मैंने रस्ते बनाये आप यहाँ
आप मेरे हैं रहनुमा क्यूँ कर
 
यूँ न होता तो यूँ नहीं होता
यूँ न हो कर ये यूँ हुआ क्यूँ कर  
 
 

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Comment

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Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on April 5, 2011 at 9:30am
thanx for liking preetam ji
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 13, 2011 at 5:31pm
arun ji,shukriya
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 13, 2011 at 5:31pm
vandana ji aap ki daad har baar mili hai ab main aap ko sirf abhaar hi kah sakata hun,ek baar punah abhaar
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on March 13, 2011 at 5:29pm
ganesh ji shukriya,abhaar
Comment by Abhinav Arun on March 13, 2011 at 12:39pm
अच्छी गज़ल -
लोग चुपचाप क़त्ल देखे है
कौन पूछे कि ये हुआ क्यूँ कर
बहुत बढियां बधाई

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2011 at 9:14am
आज तक धडकनों में तूफां हैं 
आप ने इस क़दर छुआ क्यूँ कर
वाह वाह , बहुत बढ़िया , पहली छुवन का एहसास और वो भी तूफ़ान की तरह , बहुत बढ़िया कहन , बधाई |

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