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All Blog Posts (19,173)

बहुत शोर है यहाँ......

बहुत शोर है यहाँ

बहुत ज़्यादा

मैं कैसे वो आवाज़ सुन सकूँ

जो मेरे लिए है

 

कितनी ही देर कानों पर हाथ लगा

सब अनसुना करती रही

लेकिन

शोर इतना है कि मेरी हथेलियों को

भेद कर मेरे कानों पर बरस पड़ता है

मष्तिष्क की हर नब्ज़ थर्राने लगी है

नसों में आक्रोश भर गया है

 

अजीब शोर है यहाँ

जलन, ईर्षा, द्वेष, अपमान का,

भेदभाव का शोर

धधकता, जलाता शोर

इस तरहा बढ़ता जाता है कि

इच्छाशक्ति…

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Added by Priyanka singh on March 12, 2014 at 3:30pm — 18 Comments

ग़ज़ल -जब चने की झाड़ पर हम भी चढ़े थे

२१२१       २१२२       २१२२   

हम भी अखबारों में जब इक दिन छपे थे

दोसतों की शक्ल पर बारह बजे थे

 

अब सुनो मंजिल तुम्हें हम क्या बताएं

इक तुम्हारे वास्ते क्या-क्या सहे थे…

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Added by sanju shabdita on March 12, 2014 at 12:30pm — 6 Comments

कह मुकरियाँ -- अन्नपूर्णा बाजपेई

(1)

गोरा गोरा निर्मल तन है 

उसके बिन सब सूनापन है 

न पाये तो जाएँ बच्चे रूठ

क्या सखि साजन ? ना सखी  दूध !! 

(2)

हर दम उसको शीश सजाऊँ 

पाकर उसको खिल खिल जाऊँ 

अधूरी उस बिन रहूँ न दूर 

क्या सखि साजन ? न सखि सिंदूर !!

(3)

कोमल कोमल तन है प्यारा

मन भावे लागे अति न्यारा

छुप जाये  जो डालूँ अचरा 

क्या सखि साजन ? न सखि गजरा !!

(4)

रूप सलोना…

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Added by annapurna bajpai on March 12, 2014 at 12:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
उन्मत्त परिंदा

तोड़ नीड़ की परिधि

सारी वर्जनाएं

भुला  नीति रीति

लांघ कर सीमाएं

छोड़ संयम की कतार

दे परवाज़ को विस्तार

वशीकरण में बंधा

लिए एक अनूठी चाह

कर बैठा गुनाह

लिया परीरू चांदनी का चुम्बन

जला बैठा अपने पर

उसकी शीतल पावक चिंगारी से

गिरा औंधें मुहँ

नीचे नागफनी ने डसा

खो दिया परित्राण

ना धरा का रहा

ना गगन का

बन बैठा त्रिशंकु

वो उन्मत्त परिंदा

**************

 (मौलिक एवं…

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Added by rajesh kumari on March 12, 2014 at 10:00am — 24 Comments

युवा भारत

युवा भारत
------------

उमंग से भरे चेहरे
पल होंगे तभी सुनहरे
मिले दिशा जब उस ओर
होती है जिधर से भोर
खिलती कली खिलती धूप
बहती नदी खिलता रूप
उन्मुक्त हो गगन उड़ान
नारी स्वयं की पहचान
सफल होय जीवन अपना
शेष रहे न कोई सपना
गीत मिल वो गुनगुनाएं
आओ सब स्वर्ग बनायें
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
मौलिक /अप्रकाशित

Added by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 11, 2014 at 9:56pm — 12 Comments

कुछ दोहे

प्रथम प्रयास ............

1-) देह लता प्रभु दीन्ह है, काहे करत गुमान,

पर सेवा उपकार कर ,तब हीं पावे मान ।

2- ) सुत, दारा अरु बन्धु सब, स्वारथ को संसार,

भज लो साईं राम को, खुद का जनम संभार

3- ) मन मैला तन साफ है, क्यों फैलाये जाल ,

हरी को भावत साफ मन, लिखलो अपने भाल ।

4-) मंदिर, पूजा ,यज्ञ,तप, ऊपर का व्यापार ,

मन मंदिर नित झाढ़ लो, पाओगे प्रभु द्वार

5-) चौरासी…

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Added by kalpna mishra bajpai on March 11, 2014 at 4:30pm — 12 Comments

हर बार - (रवि प्रकाश)

उस पार किनारा होगा,हर बार यही लगता है;

कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है।

मंज़िल पे जा निकलेंगे,ये ऊँचे-नीचे रस्ते;

फिर दौर हमारा होगा,हर बार यही लगता है॥

.

तपती राहों पे चल कर,

सूरज से आँख मिलाना;

रातों की बेचैनी को,शबनम के घूँट पिलाना।

बेकार न होंगे आँसू,नाकाम न होंगी आहें;

हर दर्द सहारा होगा,हर बार यही लगता है।

कुछ दूर नज़ारा होगा,हर बार यही लगता है॥

.

अक्सर कच्ची नींदों में,टूटे हैं बहुत से सपने;

उलझे हैं कहीं पे नाते,छूटे… Continue

Added by Ravi Prakash on March 11, 2014 at 2:33pm — 10 Comments

ग़ज़ल - हमें ही वोट दो कहकर वो पास आने लगे - इमरान

जो पाँच साल दहाड़े थे गिड़गिड़ाने लगे,

हमें ही वोट दो कहकर करीब आने लगे।



तुम्हारी ज़ात के नेता हैं हम तुम्हारे हैं,

ग़रीबों को ये बताकर गले लगाने लगे।



तुम्हारा हाल बदल देंगे एक मौका दो,

गली गली उसी ढपली को फिर बजाने लगे।



जो भीड़ आई है रैली में, है किराये की,

वो जिसके ज़ोर पे क़द को बड़ा दिखाने लगे।



बहा के ख़ून के दरिया सभी सियासतदां,

हर एक ख़ून के क़तरे से फ़ैज़ उठाने लगे।



ये देस लूट रहे हैं हमारे नेता जी,

जिसे आज़ाद कराने…

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Added by इमरान खान on March 11, 2014 at 1:30pm — 20 Comments

सार ललित छंद (कल्पना रामानी)

छन्न पकैया, छन्न पकैया, दिन कैसे ये आए,

देख आधुनिक कविताई को, छंद,गीत मुरझाए।

 

छन्न पकैया, छन्न पकैया, गर्दिश में हैं तारे,

रचना में कुछ भाव हो न हो, वाह, वाह के नारे।    

 

छन्न पकैया, छन्न पकैया, घटी काव्य की कीमत,

विद्वानों को वोट न मिलते, मूढ़ों को है बहुमत।

 

छन्न पकैया, छन्न पकैया, भ्रमित हुआ मन लखकर,

सुंदरतम की छाप लगी है, हर कविता संग्रह पर।

 

छन्न पकैया, छन्न पकैया, कविता किसे पढ़ाएँ,

पाठक भी…

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Added by कल्पना रामानी on March 11, 2014 at 9:30am — 20 Comments

होली [कुण्डलिया]

होली के दिन सब मिलो लेकर सारे रंग
गाओ मिलकर फाग को सब यारों के संग /
सब यारों के संग धूम तुम खूब मचाओ
नीला पीला लाल हरा गुलाबी लगाओ
शिकवे सारे भूल चले आओ हमझोली

रंगों का त्योहार ,आ गया है अब होली //

.............मौलिक व अप्रकाशित............

Added by Sarita Bhatia on March 11, 2014 at 9:00am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
“ कह मुकरियाँ “ – प्रथम प्रयास ( गिरिराज भन्डारी )

कह मुकरियाँ – पाँच

*******************

मुझे छोड़ वो कहीं न जाये

इधर उधर की सैर कराये

साथ रहे जैसे हो  धड़कन

क्या सखि साजन , नहीं सखि मन

 …

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Added by गिरिराज भंडारी on March 10, 2014 at 9:00pm — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल- शिज्जु शकूर

2122/ 2122/ 2122/ 212

कातिलों के शह्र में अहले जिगर आते नहीं

भीड़ से होकर परे चहरे नज़र आते नहीं

 

मेरे चारों ओर किस्मत ने बना दी बाड़ सी

हाल ये है अब परिन्दे तक इधर आते नहीं

 

वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़

गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं

 

ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है

क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं

 

नक्शे-माज़ी देखने को आते तो हैं रोज़-रोज़

खण्डहर…

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Added by शिज्जु "शकूर" on March 10, 2014 at 9:00am — 30 Comments

होली की विरह कविता (ओमप्रकाश क्षत्रिय ''प्रकाश'')

मन तरसे

------------------------

तन तरसे मन तरसे .

होली का रंग बरसे .

मै हो गई प्रेम दीवानी

मुझे देख मधुकर हरषे .



फूल गई सब कालिया

मै सुखी निकली घर से .

कोयल कूके पपीहा गाए

भटकी मै बावरी घर से .

लगी हुई विरह वेदना

इलाज नहीं होता हर से .

मेरे प्रियत्तम आ जाओ

मिटे वेदना उस पल से .

=============

मौलिक व अप्रकाशित"

ओमप्रकाश क्षत्रिय…

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Added by Omprakash Kshatriya on March 10, 2014 at 7:00am — 18 Comments

रसिया- - आज होली मनाओ रे रसिया

रसिया       

आज होली मनाओ रे रसिया

रंग में भीग जाओ रे रसिया  

दिल से दिल को मिलाओ रे रसिया 

दुश्मनी भूल जाओ रे रसिया.

 आज होली मनाओ रे रसिया........

मस्तों की रंग - भंग है टोली 

नैनों से मारे रंगों की गोली 

छोड शर्मो हया मेरे हमजोली 

आओ खेलेंगे मिल के हम होली...

दोस्तों को मिलाओ रे रसिया ..

प्यार दिल से जगाओ रे रसिया..

आज होली मनाओ रे रसिया..

रंग में भीग जाओ रे…

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Added by सूबे सिंह सुजान on March 9, 2014 at 11:00pm — 16 Comments

चलो यूँ ही समझा लें मन को …

मैं गिड़गिड़ाता रहा हूँ

रात दिन

तुम सबके सामने

जितने भी सम्बन्ध हो

कल आज और कल के

इस उम्मीद के साथ /कि

तुम थोड़ा पिघलोगे

भले ही अनिच्छा से

मेरा मान रखोगे

यह भ्रम /जीवन भर

साथ चलता रहा है

इसीलिये सब सहा है

यह सुनते ही तुम

मेरे विरोध में

खड़े हो जाओगे

और शायद फिर

मुझे गिड़गिड़ाता पाओगे

मैं अपना वक्तव्य बदलता हूँ

और इसे सार्वभौम /करता हूँ

फिर तुम्हारी और अपनी

ओर से कहता हूँ

मैं

मुझे…

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Added by dr lalit mohan pant on March 9, 2014 at 10:23pm — 14 Comments

होली दोहावली



फाग मास की पूर्णिमा रंगों का त्योहार

सरसों खिलती खेत में फाल्गुन बाँटे प्यार /



पहला दिन है होलिका दूजा है धुरखेल

भारत औ' नेपाल में खेलें हैं यह खेल /

आओ यारो सब मिलो लेकर रंग गुलाल 

नीला पीला औ' हरा गुलाबी संग लाल /



सब करें होलिका दहन फिर लगाएं गुलाल

फाग से है धमार का मिला ताल से ताल /



काम महोत्सव तुम कहो या राग रंग पर्व

होली दिन है मेल का करते सारे गर्व /



आया है अब फाग जो रंगीन है फुहार

भूलो…

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Added by Sarita Bhatia on March 9, 2014 at 9:02pm — 10 Comments

होली के हुड़दंग - अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

अब के बरस की होली में, कुछ ऐसा  रंग जमाएंगे।                                                                

भ्रष्ट को कालिख पोतेंगे, सज्जन को गुलाल लगाएंगे।।                                    

 

 

काले धन वालों को काला, और सभी को सतरंगी।                                                   

पिचकारी की तेज धार से, बदन सभी का भिगाएंगे।।                                                   

अब के बरस  की होली में, कुछ ऐसा  रंग…

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Added by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 9, 2014 at 6:30pm — 15 Comments

आत्मा अमर है

आत्मा अमर है
जीवन नश्वर है

संसार कुरक्षेत्र
जीवर समर है

कल क्या होगा,
किसे खबर है ?

ज्ञान ही अमृत
अज्ञान ज़हर है

श्रद्धा से देख तू
कण-२ ईश्वर है

मुकेश इलाहाबादी ---

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by MUKESH SRIVASTAVA on March 9, 2014 at 11:30am — 7 Comments

नारी [अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक नारी विषयक कविता]

मेरा परिचय क्या है?

क्या एक मानवी का ?

अथवा किसी की दासी का,

क्या मेरा परिचय यही है?

कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं है।

मैं बहुत कुछ होकर भी,

स्वयं में कुछ नहीं हूँ।

क्या पुरुष की सहचारिणी

होने के कारण,मैं अस्तित्वहीन हूँ?

क्या एक स्त्री होने के कारण,

मैं केवल अबला,असहाय हूँ?

क्या पत्नी होना कोई अभिशाप है,

जो स्त्री को पुरुष की दासी बना देता है,

अथवा पुरुष सर्वश्रेष्ठ है,

जो स्त्री और प्रकृति सबका

अधिकारी बन जाना चाहता है।

जो…

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Added by Savitri Rathore on March 9, 2014 at 12:06am — 9 Comments

सीमाओं मे मत बांधो

   सीमाओं मे मत बांधो

 

सीमाओं मे मत बांधो, मैं बहता गंगा जल हूँ ।  

गंगोत्री से गंगा सागर

गजल  सुनाती  आई

गंगा की लहरों से निकली –

मुक्तक  और   रुबाई ।                                

भावों मे डूबा उतराता , माटी का गीत गजल हूँ

सीमाओं मे मत बांधो , मैं बहता गंगा जल हूँ ।

यमुना की लहरों पर –

किसने प्रेम तराने गाये ?

राधा ने  कान्हा संग –

जाने कितने रास रचाए ?

होंगे महल दुमहले कितने, मैं…

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Added by S. C. Brahmachari on March 8, 2014 at 5:14pm — 15 Comments

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