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मैं झूमता चला हूँ : हरि प्रकाश दुबे

22--22—22--22--22—2

मैं तो हूँ फ़कीर मैं झूमता चला हूँ

आदाब कर खुदा को नाचता चला हूँ

 

मस्त हूँ ख़ुशी मैं कहूं इसे ही जीना

गम के भँवर मैं मस्त तैरता चला हूँ

 

मौत क्या बला है मैंने इसे न जाना

जिंदगी मिली है बस भागता चला हूँ

 

बड़ी ख़ाक छानी पहले हुआ परेशां

नसीब को नाज़ तले रौंदता चला हूँ      (नाज़= कोमलता)

 

शक हो किसी के दिल में तो आजमाले

इस देह को न’अश को सौंपता चला हूँ   (न’अश =…

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Added by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 11:06am — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तपे रोज जितना हम और भी निखरते गये (महिला दिवस पर विशेष ग़ज़ल 'राज')

१२२ १२२ २२१ २१२ २१२

हटाये जो  काँटे तो रास्ते सुधरते गये 

दुआएँ समझ कर हम झोलियों में भरते गये

 

कदम दर कदम जिस जिस मोड़ से गुजरते गये  

बने तल्ख़ियों के घर टूटते बिखरते गये

 

खुदा जाने  कैसे किस कांच के बने थे अजब    

 दरकते रहे  पत्थर आईने सँवरते गये   

 

दबाता रहा हमको झूठ आजमाता रहा   

सदा सच पकड़ हम हालात से उबरते गये  

 

ज़माना कसौटी पे रात दिन परखता रहा

तपे  रोज जितना हम और भी निखरते…

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Added by rajesh kumari on March 8, 2015 at 9:34am — 25 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - पाँव में जंजीर है.... (मिथिलेश वामनकर)

2212 / 2212 / 2212 / 2212----- (इस्लाही ग़ज़ल)

 

दिल खोल के हँस ले कभी,  ऐसी कहाँ तस्वीर है

यारो चमन की आजकल इतनी कहाँ तकदीर…

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Added by मिथिलेश वामनकर on March 8, 2015 at 9:30am — 43 Comments

था सरीफों के लिए वो - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2122    2122   2122   212

*****************************

दुर्दिनों ने आँख का  जब यार  जाला  हर लिया

तब दिखा है मयकशी ने इक शिवाला हर लिया

****

बाँटती थी  कल  तलक तो  वो बहुत ही जोर दे

राह ने किस बात से  अब पाँव छाला हर लिया

****

था  सरीफों  के  लिए  वो  राह  से  भटकें नहीं

कोतवालो चोर  से  पहले  ही  ताला हर लिया

****

टोकता है  कौन  दिन  को  दे  उजाला  कुछ उसे

रात के हिस्से का जिसने सब उजाला हर लिया

****

था पुराना  ही  सही पर मान…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2015 at 5:00am — 14 Comments

तैयारी

रख दिए उसने

छोटी सी अटैची में   

कुछ कपडे सहेज के

जो जरूरी हैं सफ़र के लिए

क्योंकि वह पत्नी है जानती है

मेरी आवश्यकताये  

 

मै जानता हूँ

उसमे क्या होगा

एक जोड़ी कपडे, कच्छा-बनयाईन

परफ्यूम की शीशी, शेव का सामान

एक टूथ-ब्रश, जीभी और पेस्ट

छोटा सा कंघा, फकत एक शीशा

लंच का पैकेट भी  

 

है कुछ मेरी

अपनी भी तैयारियां 

पसंद का रूमाल सादा और…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 7, 2015 at 8:30pm — 14 Comments

होली का हुड़दंग

होली का हुड़दंग न खेला, तो क्या खेला जीवन मेें,

भौजी के संग रंग न खेला, तो क्या खेला जीवन में।

फगुआ की मदमस्त हवा में, जन-जन है बौराय रहा,

मानव तो मानव है, देखौ पादप भी बौराय रहा।

नगर-नगर और गली गली में होरियारे गोहराय रहे,

होली का हुड़दंग न खेला तो क्या खेला जीवन में।

पप्पू, रामू, मुन्नू, सोनू सबके हाथों में पिचकारी,

घर से निकली बबली गोरी बौछारों के सम्मुख हारी।

ढोल, नगाड़े, ताशे के संग होरियारों की टोली निकली,

रंग गुलाल गाल को रंगो हुड़दंगो की बोली…

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Added by Atul Chandra Awsathi *अतुल* on March 7, 2015 at 11:35am — 4 Comments

दिल से हम असआर पकाया करते हैं - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2222    2112   2222

***************************

पत्थर  पर  भी  प्यार  जताया करते हैं

इक  नूतन  संसार   बसाया   करते  हैं

****

लज्जत  तुमको  यार तनिक तो देंगे ही

दिल  से  हम असआर पकाया करते हैं

****

तनहा  हमको आप  समझना लोगो मत

हम  गम  का  दरवार  लगाया  करते  हैं

****

कुबड़ी  अपनी पीठ हुई  मत पूछो क्यों

यादों  का   हम  भार   उठाया  करते हैं

****

अश्कों से मत पूछ जिगर तक आजा तू

आँसू   केवल   सार   बताया   करते  हैं

****

जीवन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 7, 2015 at 11:03am — 13 Comments

सामने आ रे !

सामने आ रे !

रात्रि-आकाश में अक्सर

तुम्हें निहारे

कहाँ छुपे हो प्रियम्वदा

होकर तारे ?

बचपन से कहते आए हैं

सब प्यारे

इस लोक से जाने वाले हो

जाते हैं तारे !

भीड़ भरे आकाश में नयन

खोज के हारें

शांतिप्रभा आर्त पुकार सुन लो

करो  इशारे |

टूटता विश्वास का पुंज देख के  

टूटते तारे

है व्याकुल हृदय की क्रन्दना

सामने आ रे !

मौलिक एवं अप्रकाशित

 

 

Added by somesh kumar on March 7, 2015 at 9:51am — 7 Comments

होलिका दहन--

अँधेरा डरावना क्यों होता है , अब उसे पता चल गया था | दिन के उजाले में शरीफ दिखने वाला इंसान , अँधेरे में एक घिनौने शख़्श में तब्दील हो जाता था | कई महीने हो गए थे बर्दाश्त करते हुए | पति से बताने की कोशिश भी की थी लेकिन वो तो अपने बड़े भाई के खिलाफ सुनने को भी तैयार नहीं था | कई बार उसने सोचा कि सासू से बता दे लेकिन उसे पता था कि उसकी बात कोई नहीं सुनेगा |

चार साल पहले आई थी वो शादी करके इस घर में | जेठानी बहुत सीधी और समझदार थी पर घर में सिर्फ जेठ का ही हुक्म चलता था | उनके हर निर्णय में…

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Added by विनय कुमार on March 7, 2015 at 2:47am — 12 Comments

पहचान का संकट

(अविजित राय की हत्या जैसे कायरतापूर्ण कृत्य ने दहला दिया...दुनिया भर के अल्पसंख्यकों को समर्पित कविता)

चेहरे-मोहरे

चाल-ढाल से जब 

पहचाना न जा सका 

तब पूछने लगा वो नाम 

और मैं बचना चाह रहा बताने से नाम 

फिर यूँ ही टालने के लिए 

लिया ऐसा नाम 

जो मिलता-जुलता हो उससे कुछ-कुछ 

जिसे कहने से

बचा जा सके पहचान लिए जाने से

लेकिन ये क्या 

अब पूछा जा…

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Added by anwar suhail on March 6, 2015 at 10:03pm — 9 Comments

सपना--

एक बार फिर शर्माजी ने जेब में हाँथ डाल कर चेक किया , गुलाल की पुड़िया पड़ी हुई थी | चटख लाल रंग का गुलाल ख़रीदा था उन्होंने ऑफिस आते हुए और सोच रखा था कि आज तो लगा के ही रहेंगे | उम्र तो खैर उनकी ५५ पार कर चुकी थी लेकिन पता नहीं क्यों इस बार होली खेलने की इच्छा प्रबल हो गयी थी उनकी |

५ महीना पहले ही ट्रांसफर होकर आये थे इस ऑफिस में | आते ही देखा कई नयी उम्र की लड़कियां थीं यहाँ | कहाँ पिछला ऑफिस , जहाँ सिर्फ पुरुष ही थे और वो भी काफी खडूस किस्म के | लेकिन यहाँ , एक तो उनके विभाग में भी थी |…

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Added by विनय कुमार on March 6, 2015 at 1:26pm — 12 Comments

ये नाम-करण कैसे हुआ -- डॉo विजय शंकर

नाम , नाम , नाम ,

नाम से तो यश है,

गौरव है , शान है,

व्यक्ति यशस्वी है,

जीते जी महान है ,

तदोपरांत पूज्य है,

वंदन है , गान है |

कितने नाम हमने दिए ,

कितने महान पैदा किये ,

देव है, पिता है, चाचा है,

भाई जी,ताऊ ,अम्मायें हैं

देवता कितने संख्य हैं,

नेता कितने असंख्य हैं ,

हम सर्वत्र नतमस्तक हैं ,

पर कितने नगणय हैं ,

सब नाम हमारे अपने हैं ,

नामकरण सब अपने हैं ,

मदर इंडिया फिल्म बनी ,

इंडियाज़ डॉटर कौन बनी… Continue

Added by Dr. Vijai Shanker on March 6, 2015 at 1:09pm — 16 Comments

अभिव्यक्तियाँ

अभिव्यक्तियाँ

किस्से कहानी कविताएँ 

सब अभिव्यक्तियाँ जीवन की 

कहाँ तक साधू अपेक्षायें 

गुरुजन गुणीजन की ?

मन की बेकली है 

लिखने का प्रथम उदेश्शय 

हो जाऊ सफल जो मानकों

पर चलूँ /दूँ गहन संदेश |

बिन पथों से डिगे 

होंगी कैसे राहे प्रशस्त 

नव सृजन की ?

अलंकारों से छंदों को साधना 

क्या संकुचित बस यहीं तक 

साहित्य की आराधना 

अर्थ क्या रह जाएगा 

जो ना हो इनमें 

जीवन-तत्व अवशिष्ट…

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Added by somesh kumar on March 6, 2015 at 8:54am — 5 Comments

होली है

आओ होली मिलन कर लें
जला बुराईयों को
अच्छाईयों को दिल में भर लें
मगर देखो तुम
होली की हुड़दंग में
रंग मुहब्बत का
ना इस तरहां लगाया करो
खेलो होली रंगों से
मगर दिल तक
ना आया करो
भांग का नशा है
थोड़ा संभल जाया करो
होली तो भूल जाओगे
अगले दिन
मगर दिल पे लगे रंगों को
जन्म भर ना भुला पाओगे
और हमें यूँ हीं ताउम्र
बे-वजह तड़पाओगे !!

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 6, 2015 at 4:48am — 6 Comments

सुन् री सखी ....

सुन री सखी फिर फागुन आयो

याद पिया की बहुत रुलायो

इत उत डोलूँ, भेद ना खोलूँ

बैरन नैना भरि-भरि आयो

सुन री सखी फिर ........



जब से गये परदेश पिया जी

भेजे न इक संदेश जिया की

इक-इक पलछिन गिन के बितायो

सुन री सखी फिर ........

ननदी हँसती जिठनी हँसती

दे ताली देवरनियो हँसती

सौतनिया संग पिया भरमायो

सुन री सखी फिर .....



खूब अबीर गुलाल उड़ायें

प्रेम रंग, सब रंग इतराएँ

बिरहा की अगनी ने मोहे जलायो

का पिया ने मोहे,…

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Added by Meena Pathak on March 5, 2015 at 11:42pm — 10 Comments

रंगों के पर्व होली पर

रंगों के पर्व होली पर सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनायें -जगदीश पंकज

उड़ने लगा गुलाल,

अबीर हवाओं में

रंगों का त्यौहार

रंगीली होली है

मस्त हवा के

झोंकों ने अंगड़ाई ले

अंगों पर कैसी

मदिरा बरसाई है

मौसम की रंगीन

फुहारों से खिलकर

बजी बावरे मन में

अब शहनाई है

लगा नाचने रोम-रोम

तरुणाई का

मौसम ने मस्ती की

गठरी खोली है

रंगों की बौछारों ने

संकेत किया

रिश्तों की अनुकूल

चुहल अंगनाई में

जीजा-साली ,कहीं…

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Added by JAGDISH PRASAD JEND PANKAJ on March 5, 2015 at 11:20pm — 5 Comments

होली.....(गंगा धर शर्मा 'हिंदुस्तान')

......होली......



होली है त्यौहार रंगों का , 

आओ तन मन रंग लें .

हो खुशियों की बौछार , 

आओ तन मन रंग लें.



सबका हो हर अरमान पूरा 

ना सपना रहे अधूरा



जिसकी जितनी चाहत हो

उतना उसको मिल जाये

बस खुशियों की बारिस हो

और तन मन खिल जाये



प्यार प्यार बस प्यार रहे 

सारी दुनिया के भीतर

और किसी भी भाव का 

हो ना पाए असर



इस होली पर इसी भाव को

बस अपने मन में पालें 

प्यार छोड़ कर…

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Added by Ganga Dhar Sharma 'Hindustan' on March 5, 2015 at 10:30pm — 3 Comments

होली आई होली आई.....

मधुशाले भी बोल रहे.... होली आई होली आई

भंग घुटेगी रस गन्ने में होली आई होली आई

है सरकारी फ़रमान ....

प्यारे बन्द रहेगी दुकान

साकी अकेली प्याले अकेले

हथ जोड़ करें आह्वान

आजा ..आ जाओ श्रीमान 

बोतल... अद्दी पउआ ले जा

रम भिस्की ए दउआ ले जा

भर लो... सारो मकान

ओ बन्द रहेगी दुकान

मयखाने भी बोल रहे होली आई होली आई

रंग घुलेंगे दंग रहेंगे होली आई होली आई

इक दिन पहले प्यारे ले जा

ज़ाम जहां के न्यारे ले जा

बम भोले का प्रसाद…

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Added by anand murthy on March 5, 2015 at 10:08pm — 3 Comments

होली है

आया फ़ाग का मौैसम मुझे सपने सजाने दो

दिल के पास जो रहता उसी के पास जाने दो

तू मेरे रंग में रंग जा मैं तेरे रंग को पा लूँ

प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

अधूरा श्याम राधा बिन ,राधा श्याम की हो ली

दिलों में प्यार भरने को आयी आज फिर होली

होली की असीम शुभकामनायें

तन से तन मिला लो अब मन से मन भी मिल जाये

प्रियतम ने प्रिया से आज मन की बात खोली है

ले के हाथ हाथों में, दिल से दिल मिला लो आज

यारों कब मिले मौका अब छोड़ों ना कि होली…

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Added by Madan Mohan saxena on March 5, 2015 at 5:27pm — 2 Comments

मनहरण घनाक्षरी - "होली"

रंग की उमंग देखो होली हुडदंग देखो ,
लाल लाल रंग डाल सखी सारी लाल हैं |

राग फाग छेड़ कर भाभी आई झूम झूम
पल में ही रंगी सखी मुख पे गुलाल हैं |

पीली पीली पिचकारी रंग हरा खूब डारी
भागी सखी घूम घूम हमको मलाल है |

अब नहीं दिख रही होली वह भोली भाली
मन मेरे बार बार उठता सवाल है |

(मौलिक अप्रकाशित)

Added by Chhaya Shukla on March 5, 2015 at 1:27pm — 6 Comments

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