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सुन री सखी फिर फागुन आयो
याद पिया की बहुत रुलायो
इत उत डोलूँ, भेद ना खोलूँ
बैरन नैना भरि-भरि आयो
सुन री सखी फिर ........


जब से गये परदेश पिया जी
भेजे न इक संदेश जिया की
इक-इक पलछिन गिन के बितायो
सुन री सखी फिर ........

ननदी हँसती जिठनी हँसती
दे ताली देवरनियो हँसती
सौतनिया संग पिया भरमायो
सुन री सखी फिर .....


खूब अबीर गुलाल उड़ायें
प्रेम रंग, सब रंग इतराएँ
बिरहा की अगनी ने मोहे जलायो
का पिया ने मोहे, दिया बिसरायो
सुन री सखी फिर ......


खेलूँगीं ना अब मै होरी
रहिहे सदा ये चूनर कोरी
अब हिय अपने श्याम बसायो
सुन री सखी .......
साँचो अब फागुन आयो ।।

मीना पाठक
मौलिक अप्रकाशित 

Views: 657

Comment

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Comment by Meena Pathak on March 8, 2015 at 8:37pm

प्रिय कल्पना ..सस्नेह आभार 

Comment by Meena Pathak on March 8, 2015 at 8:36pm

आदरणीय हरी प्रकाश जी रचना पर सराहना हेतु बहुत बहुत आभार स्वीकारें | सादर 

Comment by Meena Pathak on March 8, 2015 at 8:35pm

बहुत बहुत आभार प्रिय जितेन्द्र | सस्नेह 

Comment by kalpna mishra bajpai on March 8, 2015 at 4:55pm

मीना दी आप ने मनोहारी चित्र खींचा है इस गीत में आप को बहुत बधाई 

Comment by Hari Prakash Dubey on March 8, 2015 at 12:29pm

आदरणीया मीना पाठक जी ,बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ,बधाई प्रेषित ! सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 8, 2015 at 11:22am

होली पर विरह वेदना को बहुत सुंदर भाव दिए आपने, आदरणीया मीना दीदी. बहुत-बहुत बधाई

Comment by Meena Pathak on March 7, 2015 at 10:19pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्याम नारायन जी | सादर 

Comment by Meena Pathak on March 7, 2015 at 10:19pm

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय गोपाल नारायण जी | सादर 

Comment by Shyam Narain Verma on March 7, 2015 at 5:15pm

बहुत सुंदर रचना बधाई आपको , एवं होली की हार्दिक शुभकामनायें । 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 6, 2015 at 11:26am

आ० मीना जी

अच्छी रचना है i भावपूर्ण i

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