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था सरीफों के लिए वो - लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

2122    2122   2122   212
*****************************
दुर्दिनों ने आँख का  जब यार  जाला  हर लिया
तब दिखा है मयकशी ने इक शिवाला हर लिया
****
बाँटती थी  कल  तलक तो  वो बहुत ही जोर दे
राह ने किस बात से  अब पाँव छाला हर लिया

****

था  सरीफों  के  लिए  वो  राह  से  भटकें नहीं
कोतवालो चोर  से  पहले  ही  ताला हर लिया

****
टोकता है  कौन  दिन  को  दे  उजाला  कुछ उसे
रात के हिस्से का जिसने सब उजाला हर लिया
****
था पुराना  ही  सही पर मान रखता था तनिक
आप की  इस  खींचतानी ने दुशाला  हर लिया
****
माँ खिला लेती थी  जूठन बाप  गुजरे बाद भी
साहुकारों की  हवस ने  पर निवाला हर लिया
****
मौलिक और अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

Views: 642

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:47am

आ० भाई श्याम  जी , उत्साहवर्धन के लिय हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:46am

आ० भाई महर्षि जी , हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:46am

आ० भाई धर्मेन्द्र जी , ग़ज़ल की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:45am

आ० भाई कृष्णा मिश्रा जी , उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार .

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 11, 2015 at 10:44am

आ० भाई गिरिराज जी अपनी उपस्थिति से ग़ज़ल का मन बढ़ने के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by Shyam Mathpal on March 9, 2015 at 9:23pm

Aadarniya Dhami Ji,

Aapne bahut sudar tarike se ek chitarn kiya hai. Niche likhi panktiya man ko choo gaee.

माँ खिला लेती थी  जूठन बाप  गुजरे बाद भी
साहुकारों की  हवस ने  पर निवाला हर लिया

Bahut badhai.

Comment by maharshi tripathi on March 9, 2015 at 6:12pm

वाह !!क्या लाजवाब गजल है ,,,ढेरों बधाई आ.धामी जी |

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 9, 2015 at 6:10pm

था पुराना  ही  सही पर मान रखता था तनिक
आप की  इस  खींचतानी ने दुशाला  हर लिया  ,,,,,,,,,,,,, लाजवाब शे र ! बधाई

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 8, 2015 at 6:29pm

दुर्दिनों ने आँख का  जब यार  जाला  हर लिया
तब दिखा है मयकशी ने इक शिवाला हर लिया

मत्ला जबरदस्त हुआ है! गजल की जान बन गया है!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 8, 2015 at 3:59pm

था पुराना  ही  सही पर मान रखता था तनिक
आप की  इस  खींचतानी ने दुशाला  हर लिया  ,,,,,,,,,,,,, लाजवाब शे र ! आदरणीय लक्ष्मण भाई ,एक और अच्छी गज़ल के लिये बधाइयाँ 

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