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मनोरम छंद में मुक्तक ....

मुक्तक

आधार छंद - मनोरम



प्यार का इजहार लेकर ।

   आस का  अंबार लेकर ।

       दे  रहा  आवाज  कोई -

          श्वास का  शृंगार  लेकर ।

           ***

प्रीत  का  संसार  देकर ।

   मौन का  आधार  देकर ।  

       छल गया  विश्वास कोई -

           स्पर्श का अंगार देकर ।

           ***

ख्वाब जो साकार  होते ।

    दर्द  क्यों  गुलज़ार होते ।

        तिश्नगी  को  जीत  लेते -

            आप का हम प्यार होते ।

सुशील…

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Added by Sushil Sarna on May 6, 2022 at 2:18pm — 4 Comments

पश्चाताप

तोड़े थे यकीन मैंने मुहल्ले की हर गली में

चैन हम कैसे पाते इतनी आहें लेकर

मौत हो जाए मेहरबा हमपे नामुमकिन है

ठोकरे हीं हमको मिलेंगी उसके दरवाज़े पर

हर परत रंग मेरा यूँ ही उतरता गया

ज़मी थी सख्त मैं मगर बस धंसता हीं गया

गुनाह जो मैंने किये थे बे-खयाली में

याद करके उन सबको मैं बस गिनता…

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Added by AMAN SINHA on May 6, 2022 at 12:54pm — 1 Comment

मातृ दिवस पर गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

होता न माँ का तुझ पे जो अहसान आदमी

मिलते न राम -श्याम से भगवान आदमी।१।

*

चरणों में माँ के तीर्थ हैं दुनिया जहान के

समझा नहीं है आज भी यह ज्ञान आदमी।२।

*

माता बसी हो मन में तो शौतान मारकर

नारी का जग में करता है सम्मान आदमी।३।

*

गीता कुरान बाँचना तब ही सफल समझ

मन माँ का पढ़के जब हुआ इन्सान आदमी।४।

*

पढ़ने को माँ के रूप में केवल किताब इक

लिखने को लिख ले लाख तू दीवान आदमी।५।

*

चाहे पिता के नाम का सिर पर है ताज…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2022 at 12:31pm — 10 Comments

ग़ज़ल-अपना है कहाँ

2122 2122 2122 212

1

औरों के जैसा मुकद्दर यार अपना है कहाँ

अपने दिल का जोर उसके दिल प चलता है कहाँ

2

रात होती है कहाँ और दिन गुज़रता है कहाँ

मन मुआफ़िक़़ ज़िन्दगी में जीना मरना है कहाँ

3

एक दिन में कुछ नहीं पर एक दिन होगा ज़रूर

आदमी ये सब्र तब तक यार रखता है कहाँ'

4

आज तक कोई नहीं यह जान पाया दोस्तो

इस ज़माने को बनाने वाला रहता है कहाँ

 5

किस तरह भर लूँ उनींदी आँखों में ख़्वाबों के…

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Added by Rachna Bhatia on May 6, 2022 at 10:30am — 8 Comments

दोहा पंचक. . . . .

दोहा पंचक ....

मन में मदिरा पाप की, तन व्यसनों का धाम ।

मानव का चोला करे, मानव को बदनाम ।।

छोड़ो भी अब रूठना, छोड़ो भी तकरार ।

देखे थे जो आपके , स्वप्न करो साकार ।।

लुप्त हुई संवेदना , मिटा खून का प्यार ।

रिश्तों में गुंजित हुई , बंटवारे की रार ।।

दिख जाएगी देख तू , तुझको  अपनी भूल ।

मन के दर्पण से हटा , जमी स्वार्थ की धूल ।।

भेद बढ़ाती प्यार में, बेमतलब की रार ।

खो न दें कहीं रार में, जीवन का…

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Added by Sushil Sarna on May 3, 2022 at 11:58am — 4 Comments

तन-मन के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

तन-मन के दोहे

-------------------

चतुर लालची मन हुआ, भोली देह गँवार

जब तब जैसा मन कहे, होती वह तैयार।१।

*

सहज देह की भूख है, निदिया, रोटी, नीर

जग में पर बदनाम है, मन से अधिक शरीर।२।

*

तन को थोड़ा चाहिए, मन की माग अनंत

कहते मन बस में रखो, इस कारण ही सन्त।३।

*

बढ़े भावना काम की, करें नैन व्यभिचार

केवल साधन देह तो, मन साधक की मार।४।

*

तन से बढ़कर मन रहे, नित्य विषय में लीन

जिस की बातें मानकर, कर्म करे तन हीन।५।

*

विषय मुक्त जो मन…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 2, 2022 at 1:59pm — 8 Comments

ताकत (लघुकथा )

ताकत .....

"क्या बात है रामदेव जी। आज बहुत  उदास लग रहे हो ।"" दीनानाथ जी ने चाय पीते- पीते पूछा ।

"दीनानाथ जी आजकल किसी को कुछ कहने का जमाना नहीं है ।" रामदेव ने कहा ।

"क्या हुआ कुछ बताओ तो।" दीनानाथ जी बोले ।

"अरे कल रात की ही बात है । आधी रात को सड़क बनाने वाले इंजन की आवाज़ सुनकर हमारी नींद उखड़ गई । बाहर  आकर देखा तो रोड रोलर हमारी गली के कोने की दुकान के सामने की सड़क के छोटे से टुकड़े पर डामरीकरण कर रहे थे ।" रामदेव जी बोले जा रहे थे ।

"फिर…

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Added by Sushil Sarna on April 30, 2022 at 8:49pm — 8 Comments

जी चाहता है

है फूलों सी खुशबू तेरे इस बदन में

जी चाहता है मैं साँसों में भर लूँ

अधूरा रहेगा ये इकरार मेरा

पहलू में अपने जो तुझको ना भर लूँ

हंसी से तेरी खिल जाती है कलियाँ

जगमग सी हो जाती है तेरे आने से दुनिया

है किसने मिलाया नशा इस समा में

कदम लड़खड़ाते है देख कर तेरी गालियां

मैं ज़िंदा हूँ साँसे लिए जा रहा…

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Added by AMAN SINHA on April 30, 2022 at 12:01pm — No Comments

रक्त से भीगा है आगन आज तक भी -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

2122-2122-2122

झूठ का  सन्सार  करना  चाहता है

सत्य पर नित वार करना चाहता है।१।

*

जो न रखता वास्ता अपनो से कोई

अन्य का  आभार  करना चाहता है।२।

*

देह को पतवार करके आदमी अब

हर नदी को  पार  करना चाहता है।३।

*

भाव गुणना आज भी आया नहीं पर

शब्द  का  व्यापार  करना  चाहता है।४।

*

भीड़ से लगने  लगा  अब डर बहुत

डर को भी हथियार करना चाहता है।५।

*

तोड़ देता था कभी दिखते ही उसको

अब…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 30, 2022 at 11:00am — 9 Comments

आरज़ू

आरज़ू है ये दिल की इस कदर तुझको चाहूँ

आँखों से तुझको छू लूँ प्यास अपनी बुझा लूँ

तमन्ना है यही तुझको बाहों में भर लूँ

ज़रा ही सही प्यार तुझसे मैं कर लूँ

आशिक़ी में तेरी आज खुदको मिटा दूँ

दिल की जो लगी है आज तुझको बता दूँ

कोई कह सके ना ये मैं हूँ के तू है

आज खुदको तुझी में इस कदर मैं मिला…

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Added by AMAN SINHA on April 29, 2022 at 11:28am — No Comments

अहसास की ग़ज़ल::; मनोज अहसास

नज़र में उलझन भरी हुई है, तमाम रस्ते उजड़ गये हैं ।

सँभलना जितना भी हमने चाहा, हम उतने ज्यादा बुरे गिरे हैं।

हमारे जैसा उदास कोई, हमें कहीं भी नहीं मिला पर,

हमारे दुख से बड़े बहुत दुख ज़माने भर में भरे पड़े हैं।

कभी नहीं वो कहेंगे हमसे, के उनके दिल में है प्यार अब भी,

सकार को भी जिया था हमने नकार को भी समझ रहे हैं।

ये ज़िन्दगी की उदास खुशबू ,जो बस गयी है मेरी रगों में,

ज़रा सा खुश हूँ मैं इसमें क्योंकि तुम्हारें ग़म भी सजे हुए…

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Added by मनोज अहसास on April 28, 2022 at 5:38pm — 6 Comments

कुछ याद सम्हाले रखा है

कुछ याद सम्हाले रखा है,

हमने दर्द को पाले रक्खा है

हँसते चेहरे के आड़ में हमने,

दिल के छालों को रक्खा है

 

सब कहते है हम हँसते हैं,

हम अपने अंदर ही बसते हैं  

अब सबको हम बतलाएं क्या,

हम तनहाई से कैसे बचते है

 

अब रोना धोना छोड़…

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Added by AMAN SINHA on April 28, 2022 at 11:42am — No Comments

गाँव की धरती (कविता)

गाँव की धरती

गाँव की छवि अति निराली

शहर से छटा उसकी है न्यारी

गगनचुंबी से मुक्त धरा है होती

खुले आकाश सँग बातें ज्यादा है होती ।

सुबह सवेरे गाय बैल जगाते

दुग्ध धोने अपने ग्वाल को पुकारते

रुनझुन करती आती श्यामा

खुश हो जाती घर में दादी माँ

हल लेकर खेतो को निकलते

मेहनतकश पुरुष पसीना बहाते

बरगद नीम की छाँव तले बैठकर

खाते रोटी अचार चटनी प्याज मिलकर

हँसी ठट्ठा औ कोलाहल होता

हर घर से अपनापन है मिलता

सब कोई चाचा…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on April 27, 2022 at 10:26pm — 8 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : बँटवारा (गणेश जी बाग़ी)

गाँव के एक दबंग व्यक्ति ने दादा जी के भोलेपन का फ़ायदा उठाकर ज़मीन और घर के एक भाग पर अवैध कब्ज़ा कर लिया था । दादा जी तो अब रहे नही किन्तु तीन दशकों की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद ज़मीन और घर वापस मिले । आपसी सहमति से बँटवारा हुआ । पूरी संपत्ति पिता जी और चाचा जी के बीच बराबर-बराबर बाँट दी गई । दोनों ने ख़ुशी-ख़ुशी अपना-अपना हिस्सा स्वीकार किया । सहसा पिता जी ने चाचा जी से कहा,

"देख छोटे, ज़मीन और घर का बँटवारा तो हो गया । किन्तु भविष्य में कभी तुझे रहने के लिए घर छोटा पड़े…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 27, 2022 at 8:20pm — 7 Comments

पहचाना सा एक चेहरा

वर्षों हुए

एक बार देखे उसको

तब वो पूरे श्रृंगार में होती थी

बात बहुत

करती थी अपनी गहरी आँखों से

शब्द कहने से उसे उलझने तमाम होती थी

इमली चटनी…

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Added by AMAN SINHA on April 27, 2022 at 11:30am — 1 Comment

लघुकथा

लिपस्टिक  
मैं जैसे ही गेट के पास पहुँची पड़ोसन तुरन्त मेरे पास आ मुँह बनाती हुई बोली
" ये किसे काम पर रख लिया है तुमने "
" चाँदनी नाम है ,उस लड़की का क्यूँ  कुछ हुआ क्या ?" मैंने बात आगे बढ़ाई 
" अरे अभी तो कुछ नही हुआ मगर हो सकता है " उसने फिर अजीब मुँह बना कर कहा
" क्या हो सकता है ? मैंने जिज्ञासा जाहिर की
" कैसे सज संवर कर…
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Added by Deepalee Thakur on April 25, 2022 at 5:46pm — 3 Comments

सत्य (आधार छंद रोला)

सुख-दुख हैं दो तीर , साँस की बहती धारा ।
जीवन  का  संघर्ष , अन्त  में  जीवन  हारा ।
बचा न कुछ भी शेष,
रही बस शेष कहानी ।
काया  के  अवशेष ,

ले  गया  गंगा  पानी  ।

अटल सत्य जब श्वास, छोड़ कर जाती काया ।
कुछ  न  आता काम , व्यर्थ हो जाती माया ।
वक्त  गया   जो   बीत,
कभी न लौट कर आए ।
शून्य  व्योम  ये  सत्य ,
बार -  बार   दोहराए  ।

सुशील सरना / 26-4-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on April 25, 2022 at 12:00pm — 2 Comments

दोहावली ....

दोहावली......

जग के झूठे तीर हैं, झूठी है पतवार ।

अवगुंठन में जीत के, मुस्काती है हार ।।

कुदरत ने सबको दिया, जीने का अधिकार ।

धरती के हर जीव को, बाँटो अपना  प्यार ।।

छाया देती साथ जब, होता प्रखर प्रकाश ।

विषम काल में ईश ही , काटे दुख के पाश ।।

दो साँसों के तीर में, सुख -दुख का है नीर ।

भज दाता के नाम को, जब तक चले शरीर ।।

काया की प्राचीर में, साँसें खेलें खेल ।

इसकी हर दीवार पर, इच्छाओं की…

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Added by Sushil Sarna on April 24, 2022 at 12:10pm — 2 Comments

(पुस्तक दिवस पर ) कैदी. . . .

पुस्तक दिवस पर )

कैदी......

पहले कैद थे
लफ्ज़
अन्तस की गहन कंदराओं में
फिर कैद हुए
मोटी- मोटी जिल्दों में सोये पृष्ठों में
फिर कैद हुए
लकड़ी की अलमारियों में
आओ
मुक्ति दें इन अनमोल कैदियों को
जो बैठे हैं
उन कद्रदानों के  इन्तिज़ार में
जो पहचान सकें
लफ्जों में लिपटे मौसम के
अनबोले अहसासों के

सुशील सरना / 23-4-22

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on April 23, 2022 at 10:26pm — 4 Comments

ग़ज़ल-जल उठा

2122       2122       2122       212

नफ़रतों की  आग भड़की भाईचारा  जल उठा

ख़ौफ़ इतना है कि दरिया का किनारा जल उठा



भीड़  ने  पकड़ा  किसी  को, देखते  ही  देखते

अम्न की उम्मीद उल्फ़त का सितारा जल उठा
 

वहशियों ने  वहशतों की तोड़  दी हर एक  हद

फिर कोई अरमान,आँखों का सहारा जल उठा


आह ये  नफ़रत  नगर  से  गाँव  कैसे आ  गई

खेत झुलसे हैं  कहीं खलिहान सारा जल…
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Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 22, 2022 at 8:24pm — 2 Comments

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