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रक्त से भीगा है आगन आज तक भी -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

2122-2122-2122
झूठ का  सन्सार  करना  चाहता है
सत्य पर नित वार करना चाहता है।१।
*
जो न रखता वास्ता अपनो से कोई
अन्य का  आभार  करना चाहता है।२।
*
देह को पतवार करके आदमी अब
हर नदी को  पार  करना चाहता है।३।
*
भाव गुणना आज भी आया नहीं पर
शब्द  का  व्यापार  करना  चाहता है।४।
*
भीड़ से लगने  लगा  अब डर बहुत
डर को भी हथियार करना चाहता है।५।
*
तोड़ देता था कभी दिखते ही उसको
अब कलम दमदार करना चाहता है।६।
*
रक्त से भीगा है आगन आज तक भी
हर दिवस  त्योहार  करना  चाहता है।७।
*
है परेशाँ रंजो गम से जो "मुसाफिर"
साँस  को  इतवार  करना  चाहता है।८।
*
(१९-३-२२)
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 15, 2022 at 8:47am

आ. भाई गुमनाम जी सादर अभिवादन। लम्बे अंतराल के बाद मंच पर आपकी उपस्थिति से हर्ष हुआ। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।

निरंतर उपस्थिति बनाये रखने और रचनाएँ प्रस्तुत करने का अनुरोध है। आपका सानिध्य मिलता रहे यही कामना है। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 15, 2022 at 8:43am

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, स्नेह व उत्साह वर्धन के लिए आभार। त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए भी आभार।

 -  "भीड़ से लगने  लगा  अब डर बहुत यूँ "

Comment by gumnaam pithoragarhi on May 14, 2022 at 4:41pm
वाह मुसाफिर साहब शानदार गजल हुई है । बधाई
Comment by Samar kabeer on May 9, 2022 at 6:24pm

जनाब लक्ष्मण धामी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करेंI 

'भीड़ से लगने  लगा  अब डर बहुत'

इस मिसरे की बह्र देखेंI I 

'रक्त से भीगा है आगन आज तक भी'---'आगन' --"आँगन"

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 7, 2022 at 5:52am

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और स्नेह के लिए आभार।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on May 6, 2022 at 9:20pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति। 

"देह को पतवार करके आदमी अब

हर नदी को पार करना चाहता है।३।  इस शे'र के लिए विशेष बधाई स्वीकार करें। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2022 at 9:17pm

आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Sushil Sarna on May 6, 2022 at 8:32pm
वाह आदरणीय लक्ष्मण धामी जी खूबसूरत प्रस्तुति हुई है ।हार्दिक बधाई सर

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