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All Blog Posts

बस जुगनू भर को छोड़ देते

जिस मार्ग पे तुम अब चल निकले हो 

उस मार्ग से परिचय नहीं है  …

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Added by amita tiwari on April 13, 2020 at 2:00am — 1 Comment

मज़ाक था वो मगर हमने प्यार मान लिया(८५ )

 ( 1212 1122 1212 22 /112 )

मज़ाक था वो मगर हमने प्यार मान लिया

कि ख़ुद को तीर-ए-नज़र का शिकार मान लिया

**

ग़मों को क़ल्ब का हमने क़रार मान लिया

ख़िज़ाँ के रूप में आई बहार मान लिया

**

ख़ुशी ने बारहा इतना दिया फ़रेब हमें

ख़ुशी को ज़िंदगी से अब फ़रार मान लिया

**

समझने सोचने की ताब खो चुके हैं हम

दिमाग़ में है हमारे दरार मान लिया

**

पिलाई साक़िया ने चश्म से हमें वो मय

हयात भर को चढ़ा…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 12, 2020 at 9:30pm — No Comments

आइये फिर आरज़ू का जलजला दिल में उठा(८४ )

(2122 2122 2122 212 )

आइये फिर आरज़ू का जलजला दिल में उठा

आइये फिर दिल की वादी में चली बाद-ए-सबा

**

आइये फिर वस्ल का पैग़ाम ले आई हवा

आइये फिर से क़मर भी बादलों में छुप गया

**

आइये फिर से जवाँ है रात भी माहौल भी

आइये फिर आसमाँ पे छा गई काली घटा

**

आइये फिर मरमरी बाँहों में हमको लीजिये

आइये फिर ख़ुशबुओं ने दिल मुअत्तर कर दिया

**

आइये फिर कश्तियाँ ग़म की डुबोने के…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 11, 2020 at 10:00am — No Comments

ज़िन्दान-ए-हिज्र से अरे आज़ाद हो ज़रा (८३ )

( 221 2121 1221 212 )

ज़िन्दान-ए-हिज्र से अरे आज़ाद हो ज़रा 

नोहे* तू क़त्ल-ए-इश्क़ के दुनिया को मत सुना 

**

अक़्स-ए-रुख़-ए-सनम तेरे आएगा रू ब रू

माज़ी के आईने पे लगी धूल तो हटा 

**

दुनिया में जीने के लिए हैं और भी सबब

चल नेकियों के वास्ते कुछ तू समय लगा

**

फिर साज़-ए-दिल पे छेड़ कोई राग पुरसुकूँ

दुनिया के वास्ते नया पुरअम्न गीत गा

**

हैं इंतज़ार में तेरी दुनिया की…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 10, 2020 at 2:00pm — No Comments

दूरियां

जब नहीं था

समय

तब तुम घूमती थी

और मंडराती थी

हमारे इर्द-गिर्द

करती थी परिक्रमा

और मैं देता था झिडक  

 

अब मैं

हूँ घर पर मुसलसल

साथ तुम भी हो

व्यस्तता भी अब नहीं कोई   

कितु मेरे पास तुम आती नहीं

परिक्रमा तो दूर की है बात

ढंग से मुसक्याती नहीं    

 

 

नहीं होता

यकीं इस बदलाव पर  

नहीं आ सकतीं

किसी बहकावे में तुम

और फिर अफवाह की भी बात क्या…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on April 10, 2020 at 1:51pm — 2 Comments

असाधारण सवाल

असाधारण सवाल

यह असाधारण नहीं है क्या

कि डूबती संध्या में

ज़िन्दगी को राह में रोक कर

हार कर, रुक कर

पूछना उससे

मानव-मुक्ति के साधन

या पथहीन दिशा की परिभाषा

असाधारण यह भी नहीं है कि

ज़िन्दगी के पाँच-एक वर्ष छिपाते

भीगते-से लोचन में अभी भी हो अवशेष

नूतन आशा का संचार

चिर-साध हो जीवन की

सच्चे स्नेह की सुकुमार अभिलाषा

पर असाधारण है,…

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Added by vijay nikore on April 10, 2020 at 5:00am — 2 Comments

आज के दोहे :

कोरोना के चक्र की, बड़ी वक्र है चाल।

लापरवाही से बने, साँसों का ये काल।।

निज सदन को मानिए, अपनी जीवन ढाल।

घर से बाहर है खड़ा ,संकट बड़ा विशाल।।

मिलकर देनी है हमें, कोरोना को मात।

काल विभूषित रात की, करनी है प्रभात।।

निज स्वार्थ को छोड़कर, करते जो उपकार।

कोरोना की जंग के ,वो सच्चे किरदार।।

हाथ जोड़ कर दूर से, कीजिये नमस्कार।

हर किसी पर आपका, होगा ये उपकार।।

सुशील सरना

मौलिक एवं…

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Added by Sushil Sarna on April 9, 2020 at 8:00pm — 2 Comments

संस्कार - लघुकथा -

संस्कार - लघुकथा -

"रोहन यह क्या हो रहा है सुबह सुबह?"

"भगवान ने इतनी बड़ी बड़ी आँखें आपको किसलिये दी हैं?"

रोहन का ऐसा बेतुका उत्तर सुनकर मीना का दिमाग गर्म हो गया। उसने आव देखा न ताव देखा तड़ातड़ दो तीन तमाचे धर दिये रोहन के मुँह पर।सात साल का रोहन माँ से इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं कर रहा था।

वह फ़ट पड़ा और जोर जोर से दहाड़ मार कर रोने लगा। उसका बाप दौड़ा दौड़ा आया।

रोहन को गोद में उठाकर पूछा,"क्या हुआ?"

"माँ ने मारा।"

रोहन के पिता ने मीना…

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Added by TEJ VEER SINGH on April 9, 2020 at 10:47am — 4 Comments

सलाखों में क़फ़स के गर लगा ज़र(८२ )

(1222 1222 122 )

सलाखों में क़फ़स के गर लगा ज़र

रहेंगे क्या उसी में ज़िंदगी भर ?

**

किसी की ज़िंदगी क्या ज़िंदगी है

अगर ता-उम्र उसका ख़म रहे सर ?

**

तुम्हारी ज़िंदगी से कौन खेले

किसानों ख़ुदक़ुशी की रह दिखा कर ?

**

सियासत के मिलेंगे ख़ूब मौक़े

ज़रा हालात को होने दो बेहतर

**

तलातुम आजकल ख़बरों के आते

भरोसा कीजिए मत हर ख़बर पर

**

महामारी सुबूत अब दे…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 9, 2020 at 8:00am — No Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास

2×15

एक ताज़ा ग़ज़ल

मैं अक्सर पूछा करता हूँ कमरे की दीवारों से,

रातें कैसे दिखती होंगी अब तेरे चौबारों से.

सौंप के मेरे हाथों में ये दुनिया भर का पागलपन,

चुपके चुपके झाँक रहा है वो मेरे अशआरों से.

नफरत ,धोखा ,झूठे वादें और सियासत के सिक्के,

कितने लोगों को लूटा है तूने इन हथियारों से.

प्यार, सियासत, धोखेबाजी और विधाता की माया,

मानव जीवन घिरा हुआ है दुनिया में इन चारों से.

घोर अंधेरा करके घर में…

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Added by मनोज अहसास on April 8, 2020 at 12:04am — No Comments

ग़ज़ल: अमर नाथ झा

चाहते हो तुम मिटाना नफ़रतों का गर अँधेरा

हाथ में ले लो किताबें जल्द आएगा सवेरा

है जहालत का कुआँ गहरा बहुत मत डूबना तू

लोग हों खुशहाल गुरबत ख़त्म हो ये काम तेरा

ज़ह्र भी अमृत बने जो प्यार की ठंढी छुअन हो

नाचती नागिन है बेसुध जब सुनाता धुन सपेरा

गुफ़्तगू के चंद लमहों ने बदल दी ज़िंदगी अब

बन गया सूखा शजर फिर से परिन्दों का बसेरा

आग का मेरा बदन मैं आँख में सिमटा धुआँ हूँ

इश्क़ में अब बन गया सुख चैन का ख़ुद मैं…

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Added by Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) on April 7, 2020 at 9:00pm — No Comments

क्षणिकाएँ :

क्षणिकाएँ :

थरथराता रहा

एक अश्क

आँखों की मुंडेर पर

खंडित हुए स्पर्शों की

पुनरावृति की

प्रतीक्षा में



बहुत सहेजा

अंतस के बिम्बों को

अंतर् कंदरा में

जाने

किस बिम्ब के प्रहार से

बह निकला

आँखों के

स्मृति कलश से

गुजरे पलों का सैलाब

तुम्हें

पता ही नहीं चला

तुम जन्मों से

कर रहे हो

वरण

सिर्फ़

मृत्यु का

हर कदम से पहले

हर कदम के बाद

सुशील सरना…

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Added by Sushil Sarna on April 7, 2020 at 7:23pm — 1 Comment

संकट इस वसुंधरा पर है...

विश्व आपदा में ईश्वर से प्रार्थना

हे मनुष्यता के पृतिपालक हे प्रति पालक हे मनुष्यता

क्या भूल हुई क्या गलती है अब क्षमा करो हे परमपिता।

अब राह दिखाओ दुनिया को मुश्किल सबकी आसान करो

हे कायनात के संचालक सारे जग का कल्याण करो।

ये कैसी विपदा है भगवन कैसा ये शोर धरा पर है

जो सदियों से जीवित है अब संकट उस परम्परा पर है।

जग त्राहि माम कर बैठा है नेतृत्व विफल है प्राणनाथ

शाखों के परिंदों को अपने इन्द्रियातीत मत कर…

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Added by atul kushwah on April 6, 2020 at 10:30pm — No Comments

एक ग़ज़ल

आज आंखें नम हुईंं तो क्या हुआ

रो न पाए हम कभी अर्सा हुआ



आपबीती क्या सुनाऊंगा उसे

आज भी तो है गला बैठा हुआ



ढूंढता हूँ इक सितारे को यहाँ

दूर तक है आसमां फैला हुआ



क्यों  क़रीने से रखें सामान को

घर को रहने दीजिये बिखरा हुआ



नींद  पलकों  पर  कहीं ठहरी हुई

ख़्वाब आंखों में वहीं सहमा हुआ



जी  रहा  हूँ  बस  इसी उम्मीद से

लौट  आएगा  समय  बीता हुआ



हादसे  ऐसे   भी  तो   होते   रहे…

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Added by सालिक गणवीर on April 6, 2020 at 8:29pm — 4 Comments

ग़ज़ल (अन्दाज़ ए नज़र )

रौशनी दिल में नहीं हो तो ख़तर बनता है,

आग सीने में लगी  हो तो शरर  बनता है।

जिसको ढाला न गया हो किसी भी साँचे में, 

इब्ने आदम यूं ही हरगिज़ न बशर बनता है। 

टूट  जाते  हैं कई  रिश्ते  ग़लत  फ़हमी  से,

रंजिशें ख़ुद ही भुला दे जो, बशर बनता है।

बात जो निकली ज़बां से न वो फिर रुकती है,

राज़  हो जाए  अ़यां  गर, तो ज़ह'र  बनता है।

अदबियत जिसको विरासत में ही मिल जाती हो,

तब कहीं  जा के  'अ़ली'  कोई  'जिगर'…

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Added by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on April 6, 2020 at 6:26pm — 5 Comments

इक देश बनाएं सपनों का

सुख-दुख में साथ निभाएं अपनों का |

आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||

फसलों पर, ना मौसम की मार पड़े |

कृषि हो उन्नत, ना हों परिवार बड़े |

घर-घर नलका, बिजली, शौचालय हो |

गाँव-गाँव रुग्णालय, विद्यालय हो |

तजि कुरीति, संग धरें नव चलनों का |

आओ, इक गांव बसाएं सपनों का ||

जन-जन को, उपयुक्त रोजगार मिले |

जीवन को, सुरभित स्वच्छ बयार मिले |

सुलभ निवास, सुविधाजनक प्रवास हो |

धवल सादगी का बिखरा प्रकाश हो |

फीकी जो करे चमक, नव…

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Added by Dharmendra Kumar Yadav on April 6, 2020 at 4:00pm — 4 Comments


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : निर्लज्ज (गणेश बाग़ी)

अतुकांत कविता : निर्लज्ज

=================

उसने कहा,

मेरे पास गाड़ी है, बंगला है

बैंक बैलेंस है

तुम्हारे पास क्या है ?

मैने कहा,

मेरे पास हैं...

फेसबुकिये दोस्त

जो नियमित भेजते रहते हैं

गुड मॉर्निंग, गुड इवनिंग,

गुड नाईट, स्वीट ड्रीम वाले संदेश

उसने कहा,

मूर्ख हो तुम

निपट अज्ञानी हो

मैंने कहा,

हाँ, हो सकता है मैं हूँ

किंतु...

सक्रिय हो जाती है छठी इंद्रीय

जब…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 6, 2020 at 12:30pm — 2 Comments

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख (८१ )

(1212 1122 1212 22 /112 )

जुबान इतनी तेरी दोस्त आतिशीं मत रख

कि जिसमें मार* पले ऐसी आस्तीं मत रख (*सॉंप )

**

मैं तज़र्बें की बिना पर ये बात कहता हूँ

बहुत दिनों के लिए कोई दिलनशीं मत रख

**

सजाने ज़ुल्फ़ को कुछ देर यासमीं काफ़ी

तवील वक़्त की ख़ातिर तू यासमीं*मत रख 

**

फिसलते दस्त हैं जब हमकिनार करता हूँ 

क़बा पहन के नई यार रेशमीं मत रख

**…

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Added by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on April 5, 2020 at 5:30pm — 2 Comments

मीठे दोहे :

मीठे दोहे :

चौखट से बाहर नहीं, रखना अपने पाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना गाँव।

मीठे रिश्तों की यहाँ, मीठी लगती छाँव।।

मीठे रिश्तों की यहां,मीठी लगती छाँव।

बार-बार मिलती नहीं,ऐसी मीठी ठाँव।।

बार बार मिलती नहीं, ऐसी मीठी ठाँव।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।।

अंतस की दूरी मिटे, नफ़रत हारे दाँव।

घर के अंदर स्वर्ग से, सुंदर अपना…

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Added by Sushil Sarna on April 4, 2020 at 4:54pm — 4 Comments

मृदु-भाव

मृदु-भाव

प्रात की शीतल शान्त वेला

हवा की लहर-सी तुम्हारी मेरे प्रति

मृदु मोह-ममता

मैं बैठा सोचता मेरे अन्तर में अटका

कोलाहल था बहुत

क्यूँ किस वातायन से किस द्वार से कैसे

चुपके से आकर मेरे जीवन में

घोल दिए सरलता से तुमने मुझमें

प्रणय के पावन गीत

किसी सपने की मधुरिमा-सी

सच, प्यारी है मुझको तुम्हारी यह प्रीत

नए प्यार के नवजात गीत की नई प्रात

तुम आई,…

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Added by vijay nikore on April 4, 2020 at 4:31pm — 4 Comments

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