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इक देश बनाएं सपनों का

सुख-दुख में साथ निभाएं अपनों का |
आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||

फसलों पर, ना मौसम की मार पड़े |
कृषि हो उन्नत, ना हों परिवार बड़े |
घर-घर नलका, बिजली, शौचालय हो |
गाँव-गाँव रुग्णालय, विद्यालय हो |
तजि कुरीति, संग धरें नव चलनों का |
आओ, इक गांव बसाएं सपनों का ||

जन-जन को, उपयुक्त रोजगार मिले |
जीवन को, सुरभित स्वच्छ बयार मिले |
सुलभ निवास, सुविधाजनक प्रवास हो |
धवल सादगी का बिखरा प्रकाश हो |
फीकी जो करे चमक, नव रतनों का |
आओ, इक शहर सजाएं सपनों का ||

भेद-भाव, मन के भीतर न द्वेष हो |
धर्म-जाति, भाषा या अलग वेष हो |
नई चेतना, अब नई रवानी है |
प्रेम-भाव से, इक कुटी बनानी है |
अहंकार तोड़ सके जो, भुवनों का |
आओ, इक देश बनाएं सपनों का ||

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Manoj Yadav on April 6, 2020 at 8:35pm
बहुत अच्छी रचना !!!!!
Congratulation
Comment by Dharmendra Kumar Yadav on April 6, 2020 at 6:13pm
आप सभी को सप्रेम धन्यवाद।
Comment by Samar kabeer on April 6, 2020 at 6:08pm

जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Shyam Narain Verma on April 6, 2020 at 6:01pm
नमस्ते जी, बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, हार्दिक बधाई l सादर

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