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Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)
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  • Delhi
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Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s Page

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Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) posted a blog post

तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है

ग़ज़ल: तेरी मेरी कहीं कुछ कहानी भी है प्यार में तैरती ज़िन्दगानी भी हैमत डरो देख तुम इस जमन की लहर रासलीला तुम्हीं संग रचानी भी हैआँसुओं से नहाती रही उम्र-भरतू ही चंपा मेरी रातरानी भी हैफूल जब मुस्कुराएँ तो समझा करो इन बहारों में अपनी जवानी भी हैबाँध मत प्यार की बह रही है नदी है रवाँ जिसमें उल्फ़त का पानी भी हैसाथ देता हमेशा रहा हमसफ़रज़िन्दगी इसलिए तो सुहानी भी हैअब न छोड़ेगा तुमको अकेला 'अमर' ज़िंदगी साथ हमको बितानी भी हैअमर पंकज (डाॅ अमर नाथ झा) देहली यूनिवर्सिटीमौलिक और अप्रकाशित See More
Jun 14
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है
"आदरणीय दंडपाणी नाहक साहेब। आपको ग़ज़ल पसंद आई। हमारा आभार स्वीकार करें। धन्यवाद। "
Jun 12
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है
"हार्दिक आभार आदरणीय समर क़बीर साहब, प्रणाम। आपने ग़ज़ल पढ़ी और अपनी बहूमूल्य टिप्पणी दी, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। आपके कहे अनुसार एक शेर के मिसरा- सानी में बदलाव करता हूँ। दूसरा और तीसरा शेर मुझे बहुत प्रिय है, अतः उनमें सुधार की कोशिश करता…"
Jun 12
dandpani nahak commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है
"आदरणीय डॉ अमर नाथ झा जी आदाब बहुत अच्छा प्रयास हुआ है ग़ज़ल का हार्दिक बधाई स्वीकार करें"
Jun 9
Samar kabeer commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है
"जनाब अमर पंकज जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें । दूसरे और तीसरे शैर के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है,उन्हें हटा दें । 'ज़िंदगी अब तलक ये सुहानी भी है' इस मिसरे को यूँ कर लें:- 'ज़िन्दगी इसलिए तो सुहानी भी है'"
Jun 7
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) posted blog posts
Jun 5
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) posted a blog post

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़रअब दरख़्तों से भी हम डरने लगे हैं किस क़दरयूँ मचा कर शोर करते हैं परिंदे अहतिजाजइस जगह पर ही हुआ करता था अपना एक घर'जिस जगह हमने गुज़ारी थी महकती शाम, अबज़ह्र फैला उस जगह  तो कैसे हम रोकें असरफूल भी बेनूर से क्यों दिख रहे हैं बाग मेंख़ूबसूरत से चमन कोतो खा गयी किसकी नज़रवो पुराने दिन हमें जब याद आते हैं कभीढूँढने लगते हैं हम फिर से वही खोई डगरआज बंदिश है हवाओं पर तो वो कैसे बहेंकौन लाएगा यहाँ ख़ुशियों भरी कोई ख़बरकोई भी अब क्या करे हालात ही ऐसे हुएबन गया जो…See More
Jun 3
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र
"आदरणीय नरेंद्र सिंह चौहान जी, दिल से शुक्रिया। "
Jun 2
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र
"आदरणीय समर क़बीर सर, प्रणाम। आपने इतनी तफ़सील से इसलाह करके मेरे तुकबंदियों को ग़ज़ल के रूप में ढाल दिया। मैं कृतज्ञ हूँ। आशा है, हमेशा आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा और मैं भी ग़ज़ल कहना सीख लूँगा। प्रणाम। "
Jun 2
Samar kabeer commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र
"जनाब डॉ. अमर नाथ झा साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,बधाई स्वीकार करें । कुछ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहूँगा । 'अब दरख़्तों से भी डरने लग गए हम किस क़दर' इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं:- अब दरख़्तों से…"
May 31
narendrasinh chauhan commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र
"सुन्दर रचना"
May 29
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) posted a blog post

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़रअब दरख़्तों से भी हम डरने लगे हैं किस क़दरयूँ मचा कर शोर करते हैं परिंदे अहतिजाजइस जगह पर ही हुआ करता था अपना एक घर'जिस जगह हमने गुज़ारी थी महकती शाम, अबज़ह्र फैला उस जगह  तो कैसे हम रोकें असरफूल भी बेनूर से क्यों दिख रहे हैं बाग मेंख़ूबसूरत से चमन कोतो खा गयी किसकी नज़रवो पुराने दिन हमें जब याद आते हैं कभीढूँढने लगते हैं हम फिर से वही खोई डगरआज बंदिश है हवाओं पर तो वो कैसे बहेंकौन लाएगा यहाँ ख़ुशियों भरी कोई ख़बरकोई भी अब क्या करे हालात ही ऐसे हुएबन गया जो…See More
May 29
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May 28
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) joined Admin's group
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May 28
Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha) commented on Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s blog post ग़ज़ल:: सब ग़मों को भुला दिया जाए
"दिल से शुक्रिया आदरणीय सुशील शर्मा जी। "
May 28

Profile Information

Gender
Male
City State
Delhi
Native Place
Deoghar, Jharkhand
Profession
Research and Teaching
About me
I am still a learner.

काशी भी अब मुझको काबा लगता है
दीवाने का दावा सच्चा लगता है

उजले कपड़े दिल का काला लगता है
बनता अपना पर बेगाना लगता है

कब तक झूठे सपने यूँ भरमाएँगे
झूट नहीं अब सच पर ताला लगता है

पास नहीं फिर भी क्यों तुझसे प्यार हमें
"चाँद बता तू कौन हमारा लगता है"

पीकर ज़ह्र ग़ज़ल तुम कहते हो कैसे
हम को तो मुश्किल हर मिसरा लगता है

तूफ़ाँ में जब फँस जाती है नाव "अमर"
तब तो रब ही एक सहारा लगता है

मौलिक व अप्रकाशित 

Amar Pankaj (Dr Amar Nath Jha)'s Blog

तेरी मेरे कहीं कुछ कहानी तो है

ग़ज़ल:



तेरी मेरी कहीं कुछ कहानी भी है

प्यार में तैरती ज़िन्दगानी भी है

मत डरो देख तुम इस जमन की लहर

रासलीला तुम्हीं संग रचानी भी है

आँसुओं से नहाती रही उम्र-भर

तू ही चंपा मेरी रातरानी भी है

फूल जब मुस्कुराएँ तो समझा करो

इन बहारों में अपनी जवानी भी है

बाँध मत प्यार की बह रही है नदी

है रवाँ जिसमें उल्फ़त का पानी भी है

साथ देता हमेशा रहा…

Continue

Posted on June 4, 2019 at 7:30pm — 4 Comments

सफर बाकी है अभी

सफर बाकी है अभी 

अभी बाकी है

जिंदगी से अभिसार

कह रहा हूं

तुम्हीं से

बार-बार

सुन रही हो न

ऐ मृत्यु के आगार।…

Continue

Posted on June 4, 2019 at 7:22pm

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

वादियाँ ख़ामोश ख़ामोशी भरा है ये सफ़र

अब दरख़्तों से भी हम डरने लगे हैं किस क़दर

यूँ मचा कर शोर करते हैं परिंदे अहतिजाज

इस जगह पर ही हुआ करता था अपना एक घर'

जिस जगह हमने गुज़ारी थी महकती शाम, अब

ज़ह्र फैला उस जगह  तो कैसे हम रोकें असर

फूल भी बेनूर से क्यों दिख रहे हैं बाग में

ख़ूबसूरत से चमन कोतो खा गयी किसकी नज़र

वो पुराने दिन हमें जब याद आते हैं कभी

ढूँढने लगते हैं…

Continue

Posted on May 28, 2019 at 1:00pm — 4 Comments

ग़ज़ल:: सब ग़मों को भुला दिया जाए

सब ग़मों को भुला दिया जाए

थोड़ा सा मुस्कुरा दिया जाए

अश्क़ मैं पी चुका बहुत यारो
जामे उल्फ़त पिला दिया जाए

.

लो सियासत बदल गयी अब तो
हुक़्म उनका सुना दिया जाए

आँधियाँ तेज जब चलें, खुद को
अपने घर में बिठा दिया जाए

अब जलाकर 'अमर' बसेरा तुम
कह रहे ग़म भुला दिया जाए

"मौलिक और अप्रकाशित"  

Posted on May 27, 2019 at 6:00pm — 4 Comments

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At 12:54pm on May 26, 2019, dandpani nahak said…
आदरणीय डॉ. अमर नाथ झा जी आदाब और बहुत बहुत शुक्रिया आपकी हौसला अफ़ज़ाई का
 
 
 

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