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ग़ज़ल :मीआ़दे उल्फ़त देखिये

2212 2212 2212





मीआ़दे उल्फ़त देखिये पूरी हुई

इतनी सी तब तो बात अब उतनी हुई.



क्या इश्क़ में दुनिया से तू भी तंग है

क्या तंज़ तुझ पे भी मेरे जैसी हुई.



दौरे गुज़श्ता ने असर कुछ यूँ किया

टूटा हुआ मैं,तू भी है टूटी हुई.



पाया है जो मेयार तेरे इश्क़ ने

लो! ज़िन्दगी क्या! रूह भी तेरी हुई.



ऐ चाँद! मुझको खींच ले ख़ुद की तरफ़

देखूं कि छत पे होगी वो आई हुई.



उनसा खिला गमले में इक तो गुल, अरे!

ख़ुशबूू भी… Continue

Added by shree suneel on July 5, 2015 at 5:00pm — 38 Comments

नदी के बीच वाला पाया (लघुकथा)

एक नदी पर एक पुल था , जिसमे सात पाये थे। एक बार सबसे बीच वाले पाए ने सबसे किनारे वाले पाए से कहा “जानते हो यह पुल मेरी वजह से ही है। नदी की जलधारा का सबसे ज्यादा प्रवाह मैं ही झेलता हूँ। मैं हमेशा पानी में डूबा रहता हूँ, तुमलोगों का क्या किनारे खड़े रहते हो, बरसात में कभी कभी नदी की जलधारा तुम तक पहुँचती है वरना सालो भर ऐसे ही खड़े रहते हो, तुम्हारी उपयोगिता ही क्या है। मेरे कारण ही लाखों लोग इस पुल का प्रयोग कर नदी के आर पार जा पाते हैं । “

किनारे वाले पाये ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ…

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Added by Neeraj Neer on July 5, 2015 at 3:00pm — 12 Comments

फ़ैसला

मैं चुप था

मगर शामिल नहीं था

तुम्हारे फासलों के

फ़ैसले में



मेरी चुप्पी का

हर एक अर्थ लगाया था

तुमने अपनी समझ से



मेरे चुप रहने का अर्थ

तुमने उस दिन भी

गलत समझा था

जब कि शिरू हो रही थी

जिन्द्गी की यात्रा



और मेरी चुप्पी का अर्थ

आज भी गलत ही है

जबकि समाप्ति की ओर है

जिन्द्गी की यात्रा



क्योंकि तुमने

मेरी चुप्पी का हमेशा

वो अर्थ लगाया

जो अनुकूल था

तुम्हारे लिये



उमेश… Continue

Added by umesh katara on July 5, 2015 at 12:26pm — 5 Comments

मजहब जिसने इंसानों को आपस में जोड़ा है

मजहब जिसने इंसानों को आपस में जोड़ा है 

आज उसी मजहब ने क्यूँ दिल इंसा का तोडा है 

कितनी सुंदर धरती है ये कितने सुंदर मंजर 

पर राहों में उल्फत की क्यूँ नफरत का रोड़ा है 

जिन की ख्वाइश धन दौलत दुनिया भर की हथिया लें 

गर समझें तो आज समझ लें ये जीवन थोडा है 

राम नाम जिस पाहन पर वो सागर में उतराए 

डूब गया वो राम नाम के बिन जिसको छोड़ा है 

तब तक चैन कहाँ पाया है इस इंसा ने जग में 

जब…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 5, 2015 at 10:34am — 15 Comments

गीतिका- *रंग में जिंदगी को*

बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम

मापनी-212__212__212__212,

समांत-(आते)___पदांत-(चलो)

पूर्णत: हिंदी व्याकरण पर आधारित रचना,

******************************

रंग में जिंदगी को डुबाते चलो।

शब्द मेरे लबों पर सजाते चलो।

------

जख्म रिसते रहें हो तुम्हारे अगर,

दर्द का गीत ही गुनगुनाते चलो।

-------

हो सरस फुल या कुम्हलाई कली,

जो मिले दिल उन्हीं से लगाते चलो।

-------

काँपते पैर हैं ढूँढते मंजिले,

राह में वो गिरें तो उठाते… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on July 4, 2015 at 8:21pm — 9 Comments

सत्ता का विकेन्द्रीकरण (लघुकथा) // -शुभ्रांशु

“तुम लोग बहू से ही ठीक रहती हो. बात-बात पे वो डांटा करती है न, तभी तुम लोगों का दिमाग ठंढा रहता है ! आ रही है न, गर्मी छुट्टी के बाद.. कल-परसों में.... ,” - तमतमाती हुई सुभद्रा महरी पर बरसती जा रही थी.

“माँजी, साफ तो मैं कर ही रही थी.. ” - महरी ने बात सम्भालना चाहा. 

“चुप रहो ! महीने भर का लेना-देना सब बेकार कर दिया. जरा सा कुछ कहा नहीं कि टालना शुरु.. ”



अखबार पर से आँखे उठा कर रमेश ने पत्नी की ओर देखा. इधर तीन-चार दिनों से…

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Added by Shubhranshu Pandey on July 4, 2015 at 8:00pm — 10 Comments

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता © परी ऍम. 'श्लोक'

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २



उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता

मैं तकती हूँ राह मगर क्यूँ शाम नहीं आता



करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे

जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता



होगी कुछ सच्चाई तो कि धुआँ सा उठता है

यूँ ही तो सर पर कोई इल्ज़ाम नहीं आता



तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना

दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता



दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको

हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता



ए इश्क़ तेरी… Continue

Added by Pari M Shlok on July 4, 2015 at 4:19pm — 24 Comments


मुख्य प्रबंधक
लघुकथा : शातिर (गणेश जी बागी)

                      र्षिता क्लास की सबसे खुबसूरत लड़की थी, अधम, रंजित और उसकी मित्र मंडली, सभी उससे दोस्ती के लिए लालायित रहते थे किन्तु वह तो बस अपने काम से काम रखती थी. एक दिन हर्षिता को अकेला देख रंजित उससे बोला,

“हर्षिता मैं तुम्हे अपनी बहन बनाना चाहता हूँ क्या तुम मुझे अपना भाई होने का अधिकार दोगी ?”

माँ बाप की इकलौती बेटी हर्षिता रंजित को भाई के रूप में पाकर बहुत ख़ुश हो गयी. अब उसका उठना बैठना रंजित के साथ-साथ उसके दोस्तों के साथ भी होने…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 4, 2015 at 4:04pm — 30 Comments

अनाथ ( लघुकथा )

पिता की अचानक हुई मौत से वो टूट गया । एकदम ठीक ठाक थे , बस हल्का सा बुखार हुआ और दो दिन में चल बसे । आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही ,पहले माँ और अब पिताजी भी , एकदम से बड़ा हो गया वो । पुरे गाँव में ख़बर हो गयी थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया । चाचा , जो अलग रहते थे घर पर आ गए थे और अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए थे ।

अंतिम संस्कार करके वापस चलते समय मौजूद सभी लोगों को रिवाज़ के अनुसार भरपेट नाश्ता कराकर वो भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा । घर पहुँच कर चाचा ने उसको सारे…

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Added by विनय कुमार on July 4, 2015 at 2:03pm — 22 Comments

आस का सुर्योदय (लघुकथा ) कान्ता राॅय

आस का सुर्योदय ( लघुकथा )





सर पर लकड़ी का गठ्ठर , पसीने से तर- बतर वो घर की ओर चली आ रही थी । माई का डर मन ही मन सता रहा था उसे । कल रात ही माई ने बोल दिया था कि ,



"चुल्हा चौका और घर का काम करके अगर समय मिले तो ही पढना छोरी ! "

माई भी क्या करें .. खेत पर बापू के संग काम पर जाना जो होता है !



आज सुबह सीतो अखबार लेकर आ गई थी ।



" देख तु जिले में प्रथम स्थान पर आई है ! " -- सीतो ने जैसे ही कहा , सुनते ही उसके खुशी से पैर , बदन सब काँप उठे थे… Continue

Added by kanta roy on July 4, 2015 at 1:08pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - फिल बदीह -- सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी ( गिरिराज भंडारी )

122     122     122      122

पियादे से राजा की फिर मात होगी

सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी

 

दिशायें जहाँ पर समझ की अलग हैं

वहाँ अब ठिकाने की क्या बात होगी 

 

समझ कर ज़रा आप तस्लीम करिये

वो देते नहीं हक़ , ये ख़ैरात होगी

 

वही सुब्ह निकली , वही धूप पसरी

नया कुछ नहीं तो , वही रात होगी

 

यहाँ साजिशों में लगे सारे माहिर

सँभल के, यहाँ पीठ पर घात होगी

 

बड़ा ख़्वाब जिसका है, दिल भी बड़ा…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2015 at 7:30am — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
किन्तु इनका क्या करें ? (नवगीत) // -सौरभ

खिड़कियों में घन बरसते

द्वार पर पुरवा हवा..

पाँच-तारी चाशनी में पग रहे

सपने रवा !

किन्तु इनका क्या करें ?



क्या पता आये न बिजली

देखना माचिस कहाँ है

फैलता पानी सड़क…

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Added by Saurabh Pandey on July 4, 2015 at 2:00am — 38 Comments

स्टोरी ( लघुकथा )

" सर , मैं हस्पताल पहुँच गया हूँ , कवर करता हूँ एक्सीडेंट की स्टोरी "|

" अच्छा तो आपने देखा उनको , सामने देखकर कैसा लगा ? रिपोर्टर की आवाज़ ने उसके दर्द में इज़ाफ़ा कर दिया |

" अरे इतने बड़े स्टार से मुलाक़ात तो हो गयी , लोग तो तरसते हैं दूर से भी एक झलक पाने के लिए , कुछ बताईये ", और भी कुछ कह रहा था वो लेकिन दर्द और क्रोध के उबाल में उसने रिपोर्टर का माइक छीन कर फेंक दिया |

" स्टार , स्टार लगा रखा है , मेरी टूटी हड्डियाँ तुम्हे नहीं दिखती , दफा हो यहाँ से "|

मौलिक एवम…

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Added by विनय कुमार on July 3, 2015 at 8:42pm — 10 Comments

मत्तगयन्द सवैया...

मत्तगयन्द सवैया. (सात भगण और दो गुरु )

1.

वक्त बली अति सौम्य तुला रख नीति- सुप्रीति सदा पगता है.

काल अकाल  विधी - विधना  सबके  सब  मूक  बयां करता है.

मीन - नदी  अति व्यग्र  रहें, बगुला नित शांत मजा चखता है.

वक्त  समग्र  विकास  करे  पर,  मानव  सत्य  नहीं  गहता है.

2.

स्नेह  मुहब्बत  संग  दया  समता,  करुणाकर  ही  रखते  हैं.

क्रूर  कठोर  अघोर  सभी  जन  में, सदबुद्धि  वही  फलते  हैं.

रावण  कौरव  कंस  बली  हिरणाक्ष,…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 3, 2015 at 8:30pm — 4 Comments

लेपटॉप ( लघुकथा )

" अम्मा , दद्दा , छुटके ! ई देखो , नए फिसनवा की पेटी । ऊ सहर की सड़क पे मिळत रही । "

" तनिक खोल तो मुनिया , कउनो गहना- जेबर भए तो दरोग़ा के बुलवाई के पड़ी ।"

" खोलत हैं अम्मा , ई का ? भीतर तो दर्पन चिपकत रही , वो भी ठुस्स भेसईंन रंगत ।"

" का कहत है ? फैंक अबहीं । जुरूर ई सुसरा सहर वाले कौनों जादू-टोना करके पटकत गईल ।"

" पर दद्दा , ई के भीतरे जो ढेर डिबियाँ जमत रहि , ऊ का , का ? "

" जिज्जी , तनक उहे बी तो .....का पता , कौनो गोली- बिस्किट ही धरें हों । "

" सैतान !…

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Added by shashi bansal goyal on July 3, 2015 at 8:00pm — 9 Comments

अजनबी लाशें..

अजनबी लाशें..

पाठशाला में  पढाती  

आँंखें खोल कर,

सृ-िष्ट की सबसे सुन्दर कृति

नारी का हृदयंगम पाठ

अक्षर-अक्षर निर्वस्त्र, लिजलिजा भाव

भाषा नि:शब्द!

पर, संवेदना के पहाड़े याद नहीं होते।…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on July 3, 2015 at 7:30pm — 4 Comments

चेप्टर -1 - दोहे

चेप्टर -1 - दोहे

निंदा को आतुर रहें, करें नहीं गुणगान
मैल हिया में देख के ,रूठ गए भगवान

मालिक कैसा हो गया ,  तेरा ये इंसान
बन्दे तेरे लूटता , बन  कर वो भगवान


तेरा  अजब  संसार  है,हर  कोई  बेहाल
हर मानव को यूँ लगे, जग जैसे जंजाल


संस्कार  सब  खो गए ,  बढ़ने  लगी  दरार
जनम जनम के प्यार का, टूट गया आधार

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on July 3, 2015 at 4:01pm — 22 Comments

अपने अपने दर्द ( लघुकथा )

" आजकल इंडस्ट्री लगाना और उसे चलाना आसान नहीं रहा " कहते हुए उनके चेहरे का दर्द टपक गया |

" क्यों , क्या हो गया ऐसा ", आश्चर्य से पूछा उसने |

" अरे ये मनरेगा जो आ गया , अब जिसको अपने गाँव , घर में ही काम मिल जा रहा है , वो क्यों आएगा दूर काम करने "|

" और रही सही कसर ये शॉपिंग माल वाले पूरी कर दे रहे हैं | बढ़िया ए सी में काम मिल जा रहा है उनको "|

उसे अपना गाँव याद आ गया जहाँ ग्राम प्रधान और अधिकारी मिल कर मनरेगा का आधा से ज्यादा पैसा फ़र्ज़ी नाम से हड़प जाते हैं |

मज़दूर को…

Continue

Added by विनय कुमार on July 2, 2015 at 10:42pm — 12 Comments

परपोते की चाह (लघुकथा)

बुढ़िया दादी बिस्तर पर पड़ी-पड़ी अपनी अंतिम साँसें गिन रही है. डॉ. साहब आते हैं, देखते हैं दवा देते हैं, कभी कोई इंजेक्शन भी चढ़ा देते हैं. डॉक्टर से धीरे धीरे बुदबुदाती है. – “बेटा, बंटी  से कहो न, जल्द से जल्द ‘परपोते’ का मुंह दिखा दे तो चैन से मर सकूंगी. मेरी सांस परपोते की चाह में अंटकी है."

बच्चे की जल्दी नहीं, (विचार वाला) बंटी अपनी कामकाजी पत्नी की तरफ देख मुस्कुरा पड़ा. …

Continue

Added by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 8:48pm — 5 Comments

चुप्पी

कभी किसी की चुप्पी

कितना उदास कर जाती है।

साँसे  भी भारी होती जाती है।

मन हो जाता है उस झील- सा

जो कब से बारिश के इंतजार मे  थम सी गई हो 

और उसकी लहरें भी उंघ रही हो किसी किनारे बैठ के

शाम भी तो धीरे से गुजरी है अभी कुछ फुसफूसाती हुई

उसे भी किसी की चुप्पी का खयाल था शायद।

 

मौलिक व अप्रकाशित

Added by MAHIMA SHREE on July 2, 2015 at 8:00pm — 9 Comments

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