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गज़ल - फिल बदीह -- सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी ( गिरिराज भंडारी )

122     122     122      122

पियादे से राजा की फिर मात होगी

सरे सुब्ह लगता है फिर रात होगी

 

दिशायें जहाँ पर समझ की अलग हैं

वहाँ अब ठिकाने की क्या बात होगी 

 

समझ कर ज़रा आप तस्लीम करिये

वो देते नहीं हक़ , ये ख़ैरात होगी

 

वही सुब्ह निकली , वही धूप पसरी

नया कुछ नहीं तो , वही रात होगी

 

यहाँ साजिशों में लगे सारे माहिर

सँभल के, यहाँ पीठ पर घात होगी

 

बड़ा ख़्वाब जिसका है, दिल भी बड़ा हो

कहीं बाँटनी भी तो ख़ैरात होगी

 

हरिक जा है फिसलन, गिरे तुम नहीं जो

नये युग की ख़ातिर ये सौगात होगी

 

वो रूठे हुये हैं , महज़ ख़्वाब है ये 

कि उनसे कभी अब मुलाकात होगी

 

क़याम उनका संभव महल में हुआ है

वो नेता है, साथ उसके , बारात होगी

अभी मंज़िलों की न सोच ऐ मेरे दिल

अभी तो सफर की महज़ बात होगी

**********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

 

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 14, 2015 at 3:54am

हार्दिक आभार आपका , आदरणीय सौरभ भाई ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 11:33pm

भाईजी मज़ा आ गया.. प्रस्तुति पर विलम्ब से हूँ. खेद है.

शुभकामनाएँ आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2015 at 4:51am

आदरणीय धर्मेंद्र भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2015 at 4:50am

आदरणीय राणा भाई , गज़ल पर आपकी उपस्थिति से बेहद प्रसन्नता हुई , सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।

शुरुवात वाला शे र या तो सुधार लूँगा या , निकाल दूँगा , आपका और वीनस अभारी का आभारी हूँ ॥

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 6, 2015 at 6:29pm

बहुत खूब आदरणीय गिरिराज जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है, दाद कुबूल कीजिए


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on July 6, 2015 at 5:43pm

आदरणीय गिरिराज जी बहुत खूब कमाल के अशार हुए हैं, सारे बेहतरीन, शुरुवात वाली बात पर मैं भी सहमत हूँ वीनस भाई से|


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 6, 2015 at 10:33am

आदरणीय कृश्णा भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत शुक्रिया ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 6, 2015 at 10:32am

आदरणीया डा. निरज जी , हौसला अफ्ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ।

अंतिम शे र के दोनो मिसरों मे अलिफ वस्ल लगा हुआ है , उसे मिला कर ही पढ़ना पड़ेगा , नही तो मिसरे मे लय भंग लगेगा ही ॥

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 5, 2015 at 3:22pm

समझ कर ज़रा आप तस्लीम करिये

वो देते नहीं हक़ , ये ख़ैरात होगी            लाजवाब सर!

बहुत सुन्दर गज़ल हुयी है आ० हार्दिक बधाई!

Comment by Dr. (Mrs) Niraj Sharma on July 5, 2015 at 12:56pm

बहुत खूब ग़ज़ल  है। अंतिम पंक्ति में हल्की सी लय ड्गमगाई है। बधाई सुन्दर गज़ल के लिए।

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