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कभी किसी की चुप्पी

कितना उदास कर जाती है।

साँसे  भी भारी होती जाती है।

मन हो जाता है उस झील- सा

जो कब से बारिश के इंतजार मे  थम सी गई हो 

और उसकी लहरें भी उंघ रही हो किसी किनारे बैठ के

शाम भी तो धीरे से गुजरी है अभी कुछ फुसफूसाती हुई

उसे भी किसी की चुप्पी का खयाल था शायद।

 

मौलिक व अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 11:01pm

हम दुखी तो जग दुखी..  यह एक विशेष मनःस्थिति होती है. उससे गुजरती हुई दशा कविता के संयत शब्दों में अभिव्यक्त हुई है.  बधाई स्वीकारें महिमाजी..
शुभ-शुभ

Comment by maharshi tripathi on July 5, 2015 at 10:20pm

सुन्दर कविता ,,हार्दिक बधाई |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 5, 2015 at 3:00pm

बहुत सुन्दर बधाई! आ० महिमा जी!

Comment by kanta roy on July 4, 2015 at 11:38pm
बहुत खूब बात करती है चुप्पी आपकी चुपके से ... दिलों का राज खोलती आपकी चुप्पी जैसे चुपके से ......... बहुत ही शानदार लिखती है आप आदरणीया महिमा श्री जी ...... बधाई स्वीकार करें ।
Comment by shree suneel on July 4, 2015 at 5:48pm
व्वाहह!... क्या ख़ूब कल्पना है. इस सुन्दर कविता के लिए हार्दिक बधाइयाँ आपको आदरणीया महिमा श्री जी.
Comment by MAHIMA SHREE on July 3, 2015 at 8:53pm

आ. मिथिलेश जी..कविता आपको अच्छी लगी , जानकर खुशी हुई....सराहना के  लिए हृदय से आभारी हूँ..

Comment by MAHIMA SHREE on July 3, 2015 at 8:51pm

पसंद करने के लिए आपका बहुत आभार सलीम जी.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 3, 2015 at 2:00pm

बहुत सुन्दर भाव से सजी रचना है इस सुन्दर प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई ..... रचना के भाव और कहन इतने शानदार है कि मुग्ध हूँ. अभी रचना अतुकांत और नज्म के बीच कहीं ठहरी है...... रचना में गेयता आ जाए तो कमाल की नज्म बनकर निकलेगी.

Comment by saalim sheikh on July 3, 2015 at 12:59pm

बेहद उम्दा अंदाज़-ए-बयाँ ! 
लाजवाब नज़्म के लिए बधाई !

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