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लघुकथा : शातिर (गणेश जी बागी)

                      र्षिता क्लास की सबसे खुबसूरत लड़की थी, अधम, रंजित और उसकी मित्र मंडली, सभी उससे दोस्ती के लिए लालायित रहते थे किन्तु वह तो बस अपने काम से काम रखती थी. एक दिन हर्षिता को अकेला देख रंजित उससे बोला,
“हर्षिता मैं तुम्हे अपनी बहन बनाना चाहता हूँ क्या तुम मुझे अपना भाई होने का अधिकार दोगी ?”
माँ बाप की इकलौती बेटी हर्षिता रंजित को भाई के रूप में पाकर बहुत ख़ुश हो गयी. अब उसका उठना बैठना रंजित के साथ-साथ उसके दोस्तों के साथ भी होने लगी.
                   हर्षिता कब अधम के साथ प्यार कर बैठी उसे पता भी नहीं चला और एक दिन वह सभी वर्जनाओं को तोड़ बैठी.
क्लास में आज एक और खुबसूरत लड़की ने एडमिशन ली थी. रंजित मुस्कुराते हुए बोला,
“अबे साले अधम, इस बार भाई बनने की बारी तेरी है”

(मौलिक व अप्रकाशित)
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Comment by ASHISH KUMAAR TRIVEDI on August 11, 2016 at 10:51am

सुन्दर रचना

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 18, 2016 at 6:40pm
सुन्दरम्।बधाई आदरणीय सर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 13, 2015 at 11:40pm

इस रचना पर क्या कहूँ कुछ समझ में नहीं आ रहाहै गणेश भाई. यह किसी प्रस्तुति की सफलता भी है. लेखक के विचारों से पाठक के विचारों का एकाकार होना. ’जो है वह सही नहीं है’ को स्वर देती आम जीवन से उठायी गयी एक कुत्सित घटना को अच्छा आयाम मिला है.
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

Comment by shree suneel on July 7, 2015 at 9:33pm
लघु-कथा ने प्रभावित किया. शीर्षक को सार्थक करती है. बधाई आपको आदरणीय भाई गणेश जी.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 7, 2015 at 11:06am

आदरणीय बागी जी , आज कल की नयी सभ्यता मे कुछ भी संभव है , अच्छी लगी आपकी लघुकथा , आपको हार्दिक बधाइयाँ ।


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 6, 2015 at 2:55pm

आदरणीय विजय निकोर जी, आपकी टिप्पणी से यह लघुकथा और अधिक समृद्ध हुई, बहुत बहुत आभार, स्नेह बना रहे.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 6, 2015 at 2:53pm

उत्साहवर्धन करती सराहना युक्त टिप्पणी हेतु आभार आदरणीय जवाहर लाल जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 6, 2015 at 2:51pm

सराहना हेतु आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जी.

Comment by aman kumar on July 6, 2015 at 2:13pm

आपकी कथा से कोलिज समय की एक घटना याद आगयी उसे फिर कभी ,,,

परन्तु कथा सामाजिक जीवन से निकली है और बहुत मारक है आपको बधाई !


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 6, 2015 at 1:27pm

सराहना हेतु बहुत बहुत आभार आदरणीय ओमप्रकाश क्षत्रिय जी.

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