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नवगीत : नाच रहा पंखा

देखो कैसे

एक धुरी पर

नाच रहा पंखा

 

दिनोरात

चलता रहता है

नींद चैन त्यागे

फिर भी अब तक

नहीं बढ़ सका

एक इंच आगे

 

फेंक रहा है

फर फर फर फर

छत की गर्म हवा

 

इस भीषण

गर्मी में करता

है केवल बातें

दिन तो छोड़ो

मुश्किल से अब

कटती हैं रातें

 

घर से बाहर

लू चलती है

जाएँ भला कहाँ

 

लगा घूमने का

बचपन से ही

इसको…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 6:26pm — 6 Comments

गुमनाम होता बचपन (लघुकथा)

प्रकाशक को उपन्यास की पाण्डुलिपि थमाकर लौटी, तो आज उसका मन फूल सा हल्का हो गया। पूरे छः माह की मेहनत साकार हुई थी।पुस्तक विमोचन, सम्मान,रॉयल्टी प्रसिद्धि ये सब बारी -2 से उसकी आँखों में कौंध गए। घर पहुंची तो देखा पाँच वर्षीय बेटा बड़ी बहन की गोद में सो रहा था।उसकी आँखों में सूखे अश्रु चिन्ह,तप्त शरीर,तोड़े मरोड़े गए खिलौने,अधूरा होमवर्क,डायरी में टीचर की शिकायत ।



उफ़...ये क्या कर बैठी मैं ? अपनी महत्वाकांक्षा में अपने बच्चे के बचपन को ही गुमनामी के अंधेरों में धकेल दिया।…



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Added by jyotsna Kapil on July 2, 2015 at 6:00pm — 10 Comments

गुमनाम लखौड़ी पत्थर

अवध के नवाब ने बड़े चाव से अंग्रेजों के लिये रेजिडेसी बनाने के लिये पहला लखौड़ी का पत्थर रखा तो उसको शायद यह भान ही ना होगा कि यह इमारत आने वाली सदी में अपने खानदान के आखिरी वारिस के लिये कांटो का ताज बनवा रहा है ।

पूरा अवध प्रांत अंग्रेजों ने वापस हासिल कर लिया । बदले में उनको रेजीडेन्सी में क्रांतिकारियों द्वारा खेले खूनी खेल की गवाह वह खण्डर इमारत भी मिली।

असफल क्रान्ति ने नवाब को अंग्रेजों ने कलकत्ता फिर इंग्लैंड निर्वासित…

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Added by Pankaj Joshi on July 2, 2015 at 6:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
अभी जीने की हसरत मुझमें बाकी है

1222/ 1222/ 1222
मेरे दिल में अजब सी बेकरारी है
अभी जीने की हसरत मुझमें बाकी है

मैं मेरी हसरतों के साथ तन्हा हूँ
किसे परवाह मेरी चाहतों की है

वो बरसेगा कि मुझ पर टूट जायेगा
अभी बादल मेरे सर पर उठा ही है

अचानक शह्र क्यों जलने लगा कहिये
शरारों को किसी ने तो हवा दी है

हक़ीकत ही कही थी मैंने तो ऐ दोस्त
ये देखो जान पर मेरी बन आई है

मौलिक व अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on July 2, 2015 at 4:26pm — 14 Comments

ब्राँडेड मवाली ( लघुकथा ) कान्ता राॅय

ब्राँडेड मवाली ( लघुकथा )





" कितनी अचरज की बात थी कि वो बाई होकर ख्वाब देख रही है । "



" तुम्हें क्या लगता है कि बाई को स्वप्न नहीं देखना चाहिए ...!!"



" स्वप्न देखने का आधार भी तो होना चाहिए । आपने देखा नहीं कि वो दो बार दसवीं में फेल होकर बडी मुश्किल से बारहवीं में सप्लीमेंटरी से पास हुआ है और वो है कि बेटे को इंजीनियर बनाने की बात कर रही थी ।इधर बेटा सड़कों पर मवालीगिरी करता फिरता है और उधर माँ के स्वप्न.. हुँह !!! "



" यही मवाली तो पढ लिख कर… Continue

Added by kanta roy on July 2, 2015 at 2:30pm — 10 Comments

अनकहा सच

“माँ तू खुद ही तो कहती है वो दरोगा अच्छा आदमी नहीं हैं और हम दोनो बहनों को उस से दूर ही रखती है.. फिर तू खुद वहाँ क्यों जाती है.., बचपन से देखती चली आ रहीं हूँ बापू के गुजरने के बाद से  तू नियम से उसका खाना लेकर जाती है और देर रात वापस लौटती है. लोग कैसी कैसी बातें बनाते हैं.” बरसों से मन में घुमड़ते प्रश्न आज आखिर मदुरा ने माँ के सामने रख ही दिए..

“वो हमारा अन्नदाता है तो बदले में कुछ तो उसको भी देना ही होता है.” माँ ने बड़े शांत-भाव से उत्तर दिया और खाने का डिब्बा उठा कर गंतव्य की ओर…

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Added by Seema Singh on July 2, 2015 at 10:00am — 11 Comments

तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा

2 1 2 2 2 1 2 1 2 2 2

तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा

ये ज़मी तनहा वो' आसमाँ तन्हा



अब तेरी यादें यहाँ मचलती हैं

रह गया टूटा हुआ मकाँ तन्हा



हमने हर मौसम के' रंग देखें हैं

हम कभी तन्हा कभी समाँ तन्हा



चल दिए अरमां जला के' तिनकें सा

देर तक उठता रहा धुआँ तन्हा



हैं पड़ी ज़ंज़ीर दिल के पैरों में

हम अगर जाएँ तो अब कहाँ तन्हा



सोच कर ये रूह काँप जाती है

दिल में बस्ती बसे मकाँ तन्हा



जब न बंधन हो न ही रस्म… Continue

Added by Pari M Shlok on July 2, 2015 at 9:05am — 20 Comments

हिम्मत - लघुकथा

पलक झपकते ही वो सब हो गया जो उसकी कल्पना में भी नही था। तेज गति से चलते टैम्पो में पलटते ही आग लग गयी और रोड़ पर भगदड़ मच गयी। जलती आग की ओट में घिरे उस नन्हे बच्चे को देख एकबारगी उसकी सांसे भी थम गयी।वो निशक्त सा हो गया। लेकिन बच्चे को जीवन मृत्यु के बीच झूलते देख उसने अपने अंदर की सारी शक्ति को समेटा और आग में कूद पड़ा।......

शहर भर में उसकी हिम्मत की चर्चा होने लगी। हर कोई जानना चाहता था उसकी हिम्मत, उसके जज्बे का राज।

"क्या बताऊं मैं?" रो पड़ा फूट फूट कर वो। "मेरा दस बरस का बेटा… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on July 2, 2015 at 8:43am — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह -- घटी है दरमिय़ाँ दूरी , किसी के दूर जाने से ( गिरिराज भंडारी )

1222       1222       1222        1222

मुहब्बत कब छिपी है चिलमनों की ओट जाने से

नज़र की शर्म कह देगी तुम्हारा सच जमाने से 

 

अरूजी इल्म में उलझे नहीं, बस शादमाँ वो हैं

हमे फुरसत नहीं मिलती कभी मिसरे मिलाने से

 

उदासी किस क़दर दिल में बसी है क्या कहें यारों

बस अश्कों का बहा दर्या है दिल के आशियाने से 

 

अकड़ने से बढ़ा हो क़द , मिसाल ऐसी नहीं, लेकिन 

झुके हैं  बारहा  लेकिन किसी के  सर झुकाने से

 

कभी ये भी …

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Added by गिरिराज भंडारी on July 2, 2015 at 8:30am — 23 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -- ये न भूलो, ज़िन्दगी भी थी बुलाई दोस्तो ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122   2122     212

मुस्कुराकर मौत जितनी पास आयी दोस्तो

ये न भूलो, ज़िन्दगी भी थी बुलाई दोस्तो

बेवफाई जाने कैसे उन दिलों को भा गई

हमने मर मर के वफा जिनको सिखाई दोस्तो

धूप फिर से डर के पीछे हट गई है, पर यहाँ

जुगनुओं की अब भी जारी है लड़ाई दोस्तो

कल की तूफानी हवा में जो दुबक के थे छिपे

आज देते दिख रहे हैं वे सफाई दोस्तो

आईना सीरत हूँ मैं, जब उनपे ज़ाहिर हो गया

यक-ब-यक दिखने लगी मुझमें बुराई…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 2, 2015 at 8:30am — 28 Comments

गुमनाम कर्म (लघु कथा)

"साहब ये देखिये लहलहाता खेत, दो साल पहले यहाँ बंजर जमीन थी, हम लोग जब इसे उपजाऊ बना सकते हैं तो आसपास की सारी ज़मीन क्यों नहीं?"

"बिलकुल ठीक है, इस गाँव के लिये जितने भी रुपयों का आपने प्रस्ताव भेजा है, वो मंजूर किया जाता है|"

खेत के एक कोने में हरी चुपचाप खड़ा था, उस अकेले की दो साल की मेहनत के बाद कम से कम चौधरी जी तो गुमनामी के अँधेरे से बाहर आये, जिनका पूरा परिवार अब…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 1, 2015 at 11:22pm — 13 Comments

अब जो जायेंगे......."जान" गोरखपुरी

 २१२२     २२१२      २१२२      २२

 

अब जो जायेंगे उस गली तो सबा छेड़ेगी

वारे उल्फ़त! मुझको मेरी ही वफ़ा छेड़ेगी

 ..

जिसको आँखों में भरके फिरते थे हम इतराते

हाय जालिम तेरी कसम वो अदा छेड़ेगी  

..

  जो गुजरते हर एक दर पे थी हमने मांगी  

राह में मिलके मुझसे वो हर दुआ छेड़ेगी

..

 वो जो बातें ख्यालों की ही रह गई बस होकर

बेसबब बेवख्त आ मुद्दा बारहा छेड़ेगी

..

 सुनते ही जिसको तुम चले आते थे दौड़े

हाँ…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 1, 2015 at 6:00pm — 25 Comments

एक कली मुस्काई ...

सोनाली हर बार यानि पिछले आठ वर्षों से अपना जन्म -दिन , घर के पास के पार्क में खेलने वालों बच्चों के साथ ही मनाती है। उनके लिए बहुत सारी  चोकलेट खरीद कर उनमे बाँट देती है।आज भी वह पार्क की और ही जा रही है।उसे देखते ही बच्चे दौड़ कर  पास आ गए।और वह ...! जितने बच्चे उसकी बाँहों में आ सकते थे , भर लिया। फिर खड़ी हो कर  चोकलेट का डिब्बा खोला और सब के आगे कर दिया।बच्चे जन्म-दिन की बधाई देते हुए चोकलेट लेकर खाने लगे।

 " एक बच्चा इधर भी है ,  उसे भी चोकलेट मिलेगी क्या ...?" सोनाली के पीछे से…

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Added by upasna siag on July 1, 2015 at 5:30pm — 9 Comments

तरही ग़ज़ल

तरही ग़ज़ल   

2122  1122  1122 22   

ये तबाही भरे मंजर नहीं देखे जाते

आँखों में गम के समंदर नहीं देखे जाते

फलसफा इश्क का मैं आज तुम्हे समझा दूं

इश्क में रहजन-ओ –रहवर नहीं देखे जाते

एक मुफलिस की ग़ज़ल सुनके बज्म झूम उठी

रुतवे महफ़िल में सुखनवर नहीं देखे जाते

इक सदी होने को आयी हमें आज़ाद हुए

मुझसे  हैं लोग जो बेघर नहीं देखे जाते

रिंद गर सच्चा तू होता तो खुद समझ लेता

खाली क्यूँ मुझसे ये सागर नहीं देखे जाते

खेलती थी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 1, 2015 at 4:44pm — 18 Comments

गजल- दिलबर का दीदार जिन्दगी

२२ २२ २२ २२



कहीं पे' ठण्डी' बयार जिन्दगी ।

कहीं लगे अंगार जिन्दगी ।।



पतझड और बहार जिन्दगी ।

सुख दुख का व्यापार जिन्दगी ।।



जाने कितने रंग से' खेलें।

होली का त्यौहार जिन्दगी ।।



नानी माँ की गोद में' है तो।

इमली,आम,अचार जिन्दगी ।।



इश्क के' मारों से जो पूछा।

दिलबर का दीदार जिन्दगी ।।



उनके होंटों के साहिल पर।

फूलों सी रसदार जिन्दगी ।।



कौन समझ पाया है इसको।

उलझन का संसार जिन्दगी ।।…

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Added by Rahul Dangi Panchal on July 1, 2015 at 2:00pm — 18 Comments

मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल____Manoj kumar ahsaas

सुबह आयी

तेरे इंतज़ार की खुशबू लेकर

फिर तमाम दिन मुझे तेरा इंतज़ार रहा

शाम आयी

तेरे ना आने की मायूसी लेकर

फिर तमाम रात अंधेरो मे ढूढ़ा है तुझे

और बांधी है उम्मीद अगली सुबह से

मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल

तू कहाँ था?

आज आया है

तो मेरी आँखों में चमक ही नहीं

बुझ गया है तेरा इंतज़ार

जला कर खुद को

तुझको पाने को लगाया था खुद को दाँव पर

ऐसा लगता है

तुझ को पाया है खोकर खुद को

मेरी ज़िन्दगी के हसीन पल

तू कहाँ था?

साथ लेकर… Continue

Added by मनोज अहसास on July 1, 2015 at 1:45pm — 13 Comments

विश्वास की ख़ामोशी (लघु कथा)

समुद्र में मिलती नदी ने समुद्र से कहा, "बहुत खुश हूँ आज, सीमित असीम में समा रही है, कोई सीमा का बंधन नहीं..."

समुद्र चुप रहा|

उस चुप्पी को देख तट और तलहटी दोनों मुस्कुरा उठे|

(मौलिक और अप्रकाशित)

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 1, 2015 at 12:30pm — 12 Comments

वफ़ा ढूंढा करोगे लोगों में ( © परी ऍम. 'श्लोक' )

१ २ २ २ १ २ १ २ २ २
पुकारा तुम करोगे लोगों में
मुझे ना पा सकोगे लोगों में

चले जायेंगे जां तेरी लेकर
बने बुत से जियोगे लोगों में

कटेगा भी नहीं सफ़र तन्हा
बेहिस चलते रहोगे लोगों में

मेरे जाने के बाद मुद्दत तक
मेरा रास्ता तकोगे लोगों में

मिलेगी फिर नहीं कभी जानाँ
वफ़ा ढूंढा करोगे लोगों में

© परी ऍम. 'श्लोक'

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Pari M Shlok on July 1, 2015 at 12:16pm — 22 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
आरती उतारूँ क्या?(छोटी बह्र की ग़ज़ल 'राज')

२१२ १२२ २

गली गली बुहारूँ क्या?

नालियाँ निथारूँ क्या ?

काम छोड़ कर अब मैं 

रास्ता निहारूँ क्या?

 

आसमां से उतरे हो  

आरती उतारूँ क्या?

 

धूल लग गई शायद

पाँव  भी पखारूँ क्या?

 

देखना है  चेह्रा  अब     

आईना सँवारूँ क्या?

 

लाए कुछ नए जुमले   

शब्द मैं सुधारूँ क्या? 

 

धूप लग रही क्या जी

अब्र को पुकारूँ क्या?

 

वोट मांगने आये 

पांच…

Continue

Added by rajesh kumari on July 1, 2015 at 12:00pm — 27 Comments

बन्धन (लघु कथा)// शुभ्रांशु पाण्डेय

“दोनो पैरों के अँगूठों में बन्धी रस्सी भी खोल दो, चिता पर कोई भी गाँठ या बन्धन नहीं होता..”
“चिता पर सारे बन्धन खत्म हो जाते हैं” - किसी और ने कहा.

सुनते ही राकेश पत्नी प्रिया और उसके बीच के सबसे बडे़ बन्धन एक साल के बेटे को अपने सीने से लगाये प्रिया के निर्जीव शरीर को चुपचाप देखता हुआ फिर से फ़फ़क पड़ा.
*************************
(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Shubhranshu Pandey on July 1, 2015 at 12:00am — 22 Comments

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