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ग़ज़ल -- बह्र-ए-शिकस्ता में एक प्रयास (मिथिलेश वामनकर)

फ़'इ'लात फ़ाइलातुन फ़'इ'लात फ़ाइलातुन (बह्र-ए-शिकस्ता)

1121 - 2122 - 1121 - 2122

 

मेरे नाम से न चाहे तू अगर तो मत सदा दे  

मुझे देख के मगर तू, कभी हाथ तो हिला दे…

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Added by मिथिलेश वामनकर on May 5, 2015 at 10:00pm — 25 Comments

मान

सात साल हो गये अत्याचार सहते सहते सोचा था कभी तो मनीष समझेगा उसे कभी तो उसके दिल मे उसके लिए प्यार जागेगा और कभी तो वो राधा को अपनी इस्तमाल की चीज़ के बजाय अपनी जीवन संगनी मानेगा!

पर नहीं अब भी वो वैसा ही था !!!! रोज़ दफ्तर से आकर वहाँ का गुस्सा राधा पर उतारना !आए दिन हर बात पे अपमानित करना गंदी गालियाँ देना !

पर आज तो हद ही हो गयी जब मनीष ने उसके चरित्र पर लांछन लगाया !

तडाक ****** एक ज़ोर का चाटा जडते हुए राधा ने उसका घर छोड़ने का एलान कर दिया।

राधा के जाने पर मनीष को…

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Added by Priya mishra on May 5, 2015 at 9:30pm — 8 Comments

गौमाता का दर्द

गौमाता का दर्द

कल जब देखा मैंने गौमाता की ओर मेरी ऑंखें भर आई

आंसू थे उनकी पलकों के नीचे , जैसे ही वह मेरे पास आई

गुम-सुम सी होकर देख रही थी मेरी ओर

रम्भा कर ही सही "मगर कह रही थी कुछ और"

हे मानव तुम चाहते क्या हो मुझ से ?

क्या संतुष्ट नहीं तुम इतने सुख से ?

धुप-छांव में दिन रात गुजारूं

बिना किसी ईंधन के वाहन की तरह रोज़ मैं चलती हूँ

खाने को जो भी मिले

ख़ुशी ख़ुशी चर लेती हूँ

कचरे की पेटी में पड़ा तुम्हारा झुटा भोजन खा लेती हूँ

घास में न…

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Added by Rohit Dubey "योद्धा " on May 5, 2015 at 9:02pm — 5 Comments

एक प्रयास

भरा विश्व सारा मेरे नयन में ,

गगन का विश्राम है मेरे नयन में .

तिरस्कार सामने है मैत्री की सगाई

करुणा सागर है मेरे नयन में

धनुष मेघ जीवन का है ऐसा रचा

सफल रंग लहराता मेरे नयन में

कर्तव्य वृक्ष है उपवन में उगे

खिले स्नेह पुष्प है मेरे नयन में

बदले थे पथ विभन्न जन्म में

नया एक पथ है मेरे नयन में

न करना न सहेना , रोना न खेलना

मुक्तीकी छाया है मेरे नयन में...................…

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Added by narendrasinh chauhan on May 5, 2015 at 3:00pm — 7 Comments

भटकन – कविता

कभी गलियारे मेँ यादोँ के

कभी बँजारे बन राहोँ पर

न जाने क्या ढूँढते हैँ हम

 

भूलाना था जिसे हमको

वही सब  याद करते हैँ

रेत के भँवर मेँ डूबते हैँ हम

 

कभी मौसम जो भाते थे

और मँजर जो लुभाते थे

उन्हीँ से आज ऊबते हैँ हम

 

न आने वाला है अब कोई

न मनाने वाला है अब कोई

खुद से जाने क्योँ रूठते हैँ हम

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Mohinder Kumar on May 5, 2015 at 3:00pm — 7 Comments

बढ़ते कदम....(लघुकथा)

“सुनो! कितनी अच्छी हो तुम, कितना प्रेम है तुम्हारे पास मेरे लिए. मेरा शादी-सुदा होना भी तुमने अपनी गहराइयों से स्वीकार लिया है. कुछ कहो न!, ऐसा क्या है मुझमे..?”

“ मुझे, तुमसे सब कुछ मिल रहा है जो किसी से शादी के बाद जो मिलता. और मैं तुमसे अपनी मर्जी तक सम्बन्ध बनाये रख सकती हूँ, क्यूंकि तुम शादी-शुदा होने के कारण, समाज अपने परिवार और क़ानून के डर से मुझसे जबरदस्ती नहीं कर सकते. नहीं तो आजकल के बेचलर...तौबा-तौबा “

   जितेन्द्र पस्टारिया

(मौलिक व्…

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Added by जितेन्द्र पस्टारिया on May 5, 2015 at 12:01pm — 19 Comments

दामन

"शाह जी आज़ तीन-चार पूड़े (पुड़िया) वादु (अधिक) देना।" महिन्द्रा दबी आवाज में बोला।

"क्यों ज्यादा किस लिये?" सर्फुल्ला कुछ आशंकित हो गया।

"ओ शाहजी, पिंड दे कोलेज विच वी थोड़े मुन्डे होर सैट किते ने, नशे लई।"(गाँव के काॅलेज में भी कुछ लड़के और तैयार किये है नशे के लिये) महिन्द्रा इधर उधर देखकर बोला।

सर्फुल्ला हॅस कर बोला। "ओ लैजा।लैजा। बस धंधा चालु रख, किसी को छोड़ना नहीं।"

"हाँ शाहजी हाँ। पेला कंडा (पहला कांटा )ही स्टूडेंट युनियन दे प्रधान ते सुट्टया ऐ (फेका है)।" कहता हुआ… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on May 5, 2015 at 10:32am — 4 Comments

खुद से खफा हूँ......'जान' गोरखपुरी

2212    2212  2212  222

 

खुद से खफा हूँ जिन्दगी मक्तल हुयी जाती है

कोई खता गो आजकल पल पल हुयी जाती है

 

जबसे मुझे उसने छुआ है क्या कहूँ हाले दिल

शहनाई दुनिया धड़कने पायल हुयी जाती है

 

अब जबकि मै मानिन्द सहरा सा होता जाता हूँ

है क्या कयामत ये??जुल्फ वो बादल हुयी जाती है

 

शम्मा जलाकर मेरे दिल का दाग जिसने पारा

स्याही वही अब चश्म का काजल हुयी जाती है

 

सदके ख़ुदा को जाऊ मै क्या खूब रौशन है…

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Added by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 10:30am — 10 Comments

तोहफा

तोहफा

सुबह से घर की सफाई और किचन में जुटी नीना चौंक गई “बाप रे अतुल के आने सिर्फ दो घंटे बचे हैं और मैं भूत जैसी घूम रही हूँ. माँ आप ज़रा गैस बंद कर देना प्लीज मै नहाने जा रही हूँ.”अतुल की पसंद की पीली साड़ी में तैयार होकर आई तो माँ अर्थ पूर्ण ढंग से मुस्कुरा रही थी “वाह जी खाने से लेकर सजावट तक सब अतुल का मनपसंद, अब तो साड़ी भी.” माँ ने कहा तो नीना शरमा गई “क्या बात हुई थी वैसे तेरी? माँ ने उत्सुकता से पूछा. “आवाज़ कट रही थी माँ अतुल की. वो अमेरिका से पिछले ही सप्ताह लौटा है मुझसे मिलने तो… Continue

Added by Seema Singh on May 5, 2015 at 9:41am — 6 Comments

देशराज सिंह के बेटे ( लघु- कथा ) --- डॉo विजय शंकर

देशराज सिंह के चार बेटे हुए , उनमें से तीन के नाम हैं , ज्ञान सिंह, वचन सिंह ,करम सिंह ।

ये तीनों जब से अपने हाथ पाँव के हुए एक दूसरे दूर हो गए।

लोग समझते हैं कि वे एक दूसरे से बिलकुल अंजान हो गए जबकि असलियत यह है कि वे तीनों आपस में एक दूसरे की शक्ल ही नहीं देखना चाहते हैं , कभी-कभार का मिलना जुलना तो बहुत दूर की बात. तीनों एक दूसरे से बिलकुल उल्टी दिशा में चलते हैं।

और चौथा ?

चौथा , विवेक सिंह , वो तो हर समय सोया ही रहता है, कभी जागा हो, किसी ने देखा ही नहीं।…



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Added by Dr. Vijai Shanker on May 5, 2015 at 9:30am — 16 Comments

ग़ज़ल-नूर : आसमां क्या ख़बर नहीं रखता

२१२२/१२१२/२२ (११२)



वह’म है वो नज़र नहीं रखता

आसमां क्या ख़बर नहीं रखता.  

.

वो मकीं सब के दिल में रहता है

आप कहते हैं घर नहीं रखता.

.

है मुअय्यन हर एक काम उसका

कुछ इधर का उधर नहीं रखता.



अपने दर पे बुलाना चाहे अगर

तब खुला कोई दर नहीं रखता.

.

ख़ामुशी अर्श तक पहुँचती है 

लफ्ज़ ऐसा असर नहीं रखता. 

.

तेरी हर साँस साँस मुखबिर है

तू ही ख़ुद पे नज़र नहीं रखता.

.

दिल ही दिल में हमेशा घुटता है…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2015 at 8:30am — 20 Comments

नसरी नज़्म :- तन्क़ीद निगार

तनक़ीद निगार

अच्छा भी,बुरा भी

अच्छा इसलिये कि वो

हमें हमारी ख़ामियाँ बताता है

हमें सही सम्त (दिशा) देता है

लेकिन जब यही तनक़ीद निगार

प्रोफ़ेश्नल,कारोबारी,हो जाता है

तब ये तख़लीक़ के

महासिन नहीं देखता

उस तख़लीक़ में

धड़कता दिल नहीं देखता

उसकी नज़र सिर्फ़ और सिर्फ़

ऐब तलाश करती है

उस तख़लीक़ में

जो शाईर की,कवि की,

लेखक की,मुसन्निफ़ की

अपनी जागीर है

वो इसमें ऐब निकालकर,कीड़े निकालकर

ख़त्म कर देता है

उस महल को जो ख़यालों… Continue

Added by Samar kabeer on May 4, 2015 at 11:12pm — 15 Comments


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अतुकांत -- लौटेंगे कर्म फल आप तक ज़रूर - ( गिरिराज भंडारी )

लौटेंगे कर्म फल आप तक ज़रूर

******************************

बातें हमेशा मुँह से ही बोली जायें तभी समझीं जायें ज़रूरी नहीं

कभी कभी परिस्थितियाँ जियादा मुखर होतीं हैं शब्दों से ,

और ईमानदार भी होतीं हैं

देखा है मैनें

जिसे परिवार में समदर्शी होना चाहिये

उनको छाँटते निमारते ,

अपनों में से भी और अपना  

 

वैसे गलत भी नहीं है ये

अधिकार है आपका , सबका  

देखा जाये तो मेरा भी है

 

तो, छाँटिये बेधड़क , बस ये…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 4, 2015 at 7:04pm — 16 Comments

आँखों में बेबस मोती है …

आँखों में बेबस मोती है …

रात बहुत लम्बी है

ज़िंदगी बहुत छोटी है

पत्थरों के बिछोने पे

लोरियों की रोटी है

अब वास्ता ही नहीं

हाथों की लकीरों से

भूख बिलखती है पेट में

मुफलिसी साथ सोती है

आते ही मौसम चुनाव का

होठों पे हँसी होती है

राजनीति की जीत हमेशा

हम जैसों से ही होती है

हर चुनाव के भाषण में

नाम हमारा ही होता है

कुर्सी मिलते ही फिर से

फुटपाथ पे तकदीर होती है

संग होते हैं श्वान वही

वही भूखी रात…

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Added by Sushil Sarna on May 4, 2015 at 4:00pm — 14 Comments

खारे पानी में भी मिठास होती है .....

दर्द के दरिया में सब कुछ खारा है

तुम ना जानो ...

क्यूंकि ये दर्द तो हमारा है

वो जो परिंदा इसमें डूबा है

इसे तुमने ही वहां उतारा है !

मगर समंदर के खारे पानी में

मछलियाँ ख़ुशी से तैर रही हैं

एक दूजे से खेल रही हैं

दुखी नज़र नहीं आतीं वो

यहाँ से निकलने का कोई

उतावलापन भी नहीं दिखता उन्हें

और अगले पल की फिक्र भी नहीं !

मैं भी तो मछली बन सकता हूँ

मुठ्ठी ढीली छोड़

ग़मों को आज़ाद कर सकता हूँ

और पकड़ सकता हूँ

कुछ…

Continue

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 4, 2015 at 9:51am — 12 Comments


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जानवर होने का नाटक , भूँक भूँक के -- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

जानवर होने का नाटक भूँक भूँक के

**********************************

जंगल में

जानवरों में फँसा हुआ मैं

जानवर ही लगता हूँ , व्यवहार से

पहनी नज़र में

ऐसा व्यवहार सीख लिया है मैनें

जिससे इंसानियत शर्मशार भी न हो

और जानवर भी लग जाऊँ थोड़ा बहुत

लगना ही पड़ता है , अल्पमत में हूँ न ,

 

और काम बाक़ी है , एक बड़ा काम

मुझे तलाश है इंसानों की

जो छुप गये लगते हैं , भय से ,

जानवरों में एकता जो है , बँटे हुये इंसान…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 4, 2015 at 9:00am — 17 Comments

सत्य.....

सत्य.....

पंच महाभूतों की आस्था

विज्ञान भी मानता- शोध में,

वेद-पुराणों, महाकाव्यों के आधार बिन्दु

जीवन के सेतु-बंध,

उपकृत करते-

क्षित, जल, पावक, गगन व समीर

एक दूसरे के पूरक

महाकाश से घटाकाश तक सर्वत्र व्यापी

तल-वितल, अतल भी

धारण करते पिण्ड स्वरूप.....अखण्ड ब्रह्म,

कण-कण रोमांच से भरपूर

क्षर कर भी सृजन के चंद्र-सूर्य

चक्राकार आवृत्ति के द्विगुण- सघन तम व तेज

विस्तारित करते रहस्य

आकार लेते, आभाष - अनुभव…

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Added by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 4, 2015 at 8:30am — 14 Comments

सामान

बार बार नुमाईश हुई

पर खरीदारों को सामान पसंद नहीं आया

सामान को काट छाँट कर दिखाया

सजा कर सँवारकर दिखाया

पर.......

फिर भी किसी खरीदार को सामान पसंद नहीं आया

बात कुछ और थी

बाजार सामान के साथ उपहार वाला बन गया है

उपहार भी दिये गए

पर खरीदारों की ज़रूरत पूरी नहीं हुई

सामान नोंचा कुचला गया

निचोड़ा गया और जलाया मिटा दिया गया

और फिर

एक खुदगर्ज ने कवि बनने की चाह में

एक मासूम लड़की को सामान कह… Continue

Added by मनोज अहसास on May 3, 2015 at 10:22pm — 10 Comments

क्या होगा तब

जब करूंगा अंतिम प्रयाण

ढहते हुए भवन को छोडकर

निकलूँगा जब बाहर

किस माध्यम से होकर गुज़रूँगा ?

वहाँ हवा होगी या निर्वात होगा?

होगी गहराई या ऊंचाई में उड़ूँगा

मुझे ऊंचाई से डर लगता है

तैरना भी नहीं आता

क्या यह डर तब भी होगा

मेरा हाथ थामे कोई ले चलेगा

या मैं अकेले ही जाऊंगा

चारो ओर होगा प्रकाश

या अंधेरे ने मुझे घेरा होगा

मुझे अकेलेपन और अंधकार से भी डर लगता है

क्या यह डर तब भी होगा?

भय तो विचारों से होते हैं उत्पन्न

क्या…

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Added by Neeraj Neer on May 3, 2015 at 6:47pm — 12 Comments

शब्दों को नापना नहीं आता

शब्दों को नापना नहीं आता

अक्षर गिनते कतराती हूँ

छोड़ मुझे दौडने लगते

पकडने में गिर जाती हूँ

शब्दों को नापना नहीं आता

अक्षर गिनते कतराती हूँ

तले मन गहन समंदर

तल समंदर में खो जाती हूँ

लहरे मेरी सखी सहचरी

लहरों संग खेल जाती हूँ

शब्दों को नापना नहीं आता

अक्षर गिनते कतराती हूँ

कर जाती हूँ कुछ भी कैसा

चढ जाती हूँ मै मीनार भी

घात बात सह नही पाती

दोहरे लोगों से घबराती हूँ

रोके कितना मुझे जमाना

मन पहाड़ चढ जाती…

Continue

Added by kanta roy on May 3, 2015 at 3:30pm — 20 Comments

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