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भरा विश्व सारा मेरे नयन में ,

गगन का विश्राम है मेरे नयन में .

तिरस्कार सामने है मैत्री की सगाई

करुणा सागर है मेरे नयन में

धनुष मेघ जीवन का है ऐसा रचा

सफल रंग लहराता मेरे नयन में

कर्तव्य वृक्ष है उपवन में उगे

खिले स्नेह पुष्प है मेरे नयन में

बदले थे पथ विभन्न जन्म में

नया एक पथ है मेरे नयन में

न करना न सहेना , रोना न खेलना

मुक्तीकी छाया है मेरे नयन में................... नरेन्

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by vijay nikore on May 4, 2017 at 3:39pm

सुन्दर प्रस्तुति।

हार्दिक बधाई। सादर।

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on April 19, 2016 at 5:20pm

कर्तव्य वृक्ष है उपवन में उगे

खिले स्नेह पुष्प है मेरे नयन में..

नरेंद्र जी सचमुच बहुत कुछ है इन नयनो में ..अच्छी कल्पना ..सुन्दर रचना
भ्रमर ५

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 7, 2015 at 8:47pm

बहुत कुछ है  आदरणीय आपके नयन में . सादर .

Comment by narendrasinh chauhan on May 7, 2015 at 3:20pm

सभी सज्जनों को सुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 5, 2015 at 11:03pm

सुंदर प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई

सादर

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 5, 2015 at 6:59pm

सुन्दर रचना पर बधाई! आ० नरेन्द्र जी!

Comment by Shyam Narain Verma on May 5, 2015 at 4:58pm
इस सुंदर प्रस्तुति के लिए तहे दिल बधाई सादर

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